E-Amzn

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05/22/2026

रात के ठीक 3:07 बजे…जब दुनिया की नींद सबसे गहरी होती है… और आत्माएँ सबसे ज्यादा जागती हैं…
कुमार अशोक की आँख अचानक खुली।कमरा बिल्कुल शांत था…लेकिन उस सन्नाटे में भी एक अजीब सी आवाज़ थी—“ठक… ठक… ठक…”जैसे कोई लकड़ी पर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।अशोक ने घड़ी की तरफ देखा—3:07हर रात… वही समय… वही आवाज़…“ये सपना नहीं है…” उसने खुद से कहा।
पहली दरारअशोक ने कमरे का दरवाज़ा खोला…गलियारा अंधेरे में डूबा था।
दीवार पर टंगी घड़ी उल्टी दिशा में घूम रही थी।टिक… टिक… टिक…लेकिन उल्टा…अचानक…ठक… ठक… ठक…इस बार आवाज़ नीचे से आ रही थी।जमीन के अंदर से।अशोक झुका… फर्श को छुआ…
ठंडी… बर्फ जैसी ठंडी…और तभी—फर्श के नीचे से एक फुसफुसाहट आई:“तुम देर से आए हो… कुमार अशोक…”उसका दिल जोर से धड़कने लगा।“कौन है?” उसने चिल्लाया।कोई जवाब नहीं…बस एक धीमी हँसी—“हीहीही…”दूसरा सचअगले दिन…अशोक ने पूरे घर की जांच की।पुराना मकान था…दादी की विरासत…लेकिन एक कमरा हमेशा बंद रहता था।ताले पर जंग लगी थी…जैसे सालों से किसी ने उसे छुआ ही न हो।अशोक ने ताला तोड़ा…दरवाज़ा खुलते ही एक बदबूदार हवा का झोंका आया।अंदर…

दीवारों पर सिर्फ एक ही नाम लिखा था—

“ASHOK… ASHOK… ASHOK…”

सैकड़ों बार…

हजारों बार…

और हर बार लिखावट अलग…

जैसे अलग-अलग लोगों ने लिखा हो।अचानक पीछे से आवाज़ आई—“तुम्हें याद नहीं?”अशोक ने मुड़कर देखा…कोई नहीं था।तीसरा दरवाज़ाउस रात फिर 3:07 बजे…इस बार आवाज़ सिर्फ फर्श से नहीं…दीवारों… छत… और उसके अंदर से भी आ रही थी।“ठक… ठक… ठक…”अशोक ने चीखते हुए कहा—“कौन हो तुम?!”अचानक…
कमरे के बीच में एक दरवाज़ा प्रकट हुआ…
जहाँ पहले कुछ नहीं था।पुराना… काला… आधा टूटा हुआ दरवाज़ा…धीरे-धीरे खुद खुलने लगा…
क्रीईईईक…अंदर… सिर्फ अंधेरा…लेकिन उस अंधेरे में कुछ हिल रहा था…कुछ… जो इंसान नहीं था…
---अंदर का सचअशोक ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा…
और तभी…

दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।

अब वो एक लंबे गलियारे में था…

दीवारों पर टंगे थे—

उसके ही फोटो।

लेकिन हर फोटो में वो मर चुका था।

कहीं खून में लथपथ…
कहीं फांसी पर…
कहीं बिना आँखों के…

अचानक…

एक फोटो हिलने लगा…

और उसमें से वही अशोक बाहर निकल आया…

मुस्कुराते हुए…

“तुम फिर आ गए…”

“हर बार की तरह…”असली अशोक पीछे हट गया—“ये क्या है?!”वो दूसरा अशोक बोला—“ये तुम्हारा घर नहीं है…ये तुम्हारा चक्र है…”
--अंत जो कभी नहीं आतातभी…फर्श फिर खुल गया…नीचे एक गहरा अंधेरा गड्ढा…उसमें से हजारों आवाज़ें—
“आ जाओ… कुमार अशोक…”“तुम पहले भी गिर चुके हो…”“हर बार गिरते हो…”
अशोक भागने लगा…लेकिन गलियारा खत्म ही नहीं हो रहा था…दरवाज़े बढ़ते जा रहे थे…हर दरवाज़े के पीछे—एक नई मौत…एक नया डर…एक नया “अशोक”…और हर बार…
जब वो मरता—वो फिर से जागता…रात 3:07 बजे…---और अब…अगर तुम ये कहानी पढ़ रहे हो…
तो ध्यान से सुनो…आज रात…ठीक 3:07 बजे…अगर तुम्हें भी कहीं से आवाज़ आए—“ठक… ठक… ठक…”तो दरवाज़ा मत खोलना…क्योंकि…हो सकता है…अगला कुमार अशोक… तुम ही हो।

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