SHREE RADHA
නුපුරුදු හැඟුමකි තෙරපෙන්නේ
💥 भोर से हीरक तक-[10]
उनके जाने के बाद घर में जो सन्नाटा पसरा, उसे माँ की आवाज़ ने घेर लिया। कहता है कि, खुशियाँ बाँटने से बढ़ती है और दुख बाँटने से कम होता है, इसलिए हमारी माँ सुबह से शाम तक, फिर शाम से सुबह तक दादाजी की मृत्यु तथा ज़िंदा रहते समय की यादों के बारे में ही बात करती थीं।
सुबह से शाम तक तो सभी जागते रहते हैं, लेकिन रात से सुबह तक कौन जागता रहता है भला? मगर दादाजी की हत्या के बाद, केवल हमारे घर के सदस्य ही नहीं, बल्कि हमारे गाँव के आधे से ज़्यादा लोग बिना नींद के रातें बिताने लगे थे।
जैसे-तैसे करके हम शाम तक का इंतज़ार कर रहे थे। आख़िरकार शाम ढल गई। दादी, बुआ, रमणी दीदी और विशाल फूफा वापस आ गए।
उनके आते ही सबसे पहले माँ ने दादी से पूछा,
"मामी, वो बाबा जी ने क्या कहा? उन्होंने कोई इशारा बताया क्या?"
माँ का सवाल सुनते ही दादी माँ के भीतर का बाँध टूट गया। वो अपने दिल में दबी हुई सारी बातें बिना रुके बताने लगीं—
"उन्होंने हमें अंदर बुलाया। उसके बाद वो कांपते हुए कड़े स्वर में बोले,
'बच्चा! तुम्हारे घर की मुख्य शहतीर को ही किसी ने काट दिया है... मैं सही कह रहा हूँ या नहीं?'
तब पियसेन ने आगे बढ़कर जवाब दिया,
'हाँ बाबा जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं!'
इस पर बाबा ने पियसेन की ओर देखा और गंभीर होकर कहा,
'तो फिर अब मुझसे क्या जानना चाहते हो?'
पियसेन ने हाथ जोड़कर कहा,
'बाबा जी! हमें बस यही जानना है कि... वह दुर्घटना कैसे हुई थी?'
बाबा ने आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस खींचकर बोले,—
'बच्चा! वह प्राणी सिर से पाँव तक चादर ओढ़कर सो रहा था... ओढ़ी हुई चादर के साथ ही वह पेशाब करने चला गया... उसने पिछला दरवाज़ा खोला... बाहर चला गया... अपना काम कर रहा था... ॐ... एक अनजान आदमी वहाँ छुपा हुआ था... वह घर की ओर बढ़ रहा था... मुख्य प्राणी अपनी चादर ठीक कर रहा था... चादर उस अनजान आदमी के सिर से छू गई! वह खुले हुए दरवाज़े से अंदर घुस गया... ॐ... एक बड़ी डफ़ली! वह उस बड़ी डफ़ली के पीछे छिप गया... ॐ... मुख्य प्राणी वापस आ रहा था... वह अंदर आया... दरवाज़ा बंद किए बिना ही वह फिर से सोने चला गया... वह सो रहा है... खर्राटों की आवाज़... गर् र्... अनजान आदमी बिस्तर के पास आया... उसने यहाँ-वहाँ देखा... बिस्तर के पास एक कुदाल थी... ॐ... उसने वह कुदाल उठा ली... और मुख्य प्राणी के सिर पर धड़ाम से मार दिया!... ॐ... वह खुले हुए दरवाज़े से भाग गया......'
"हा...?! कौन हो सकता है वह आदमी?"
माँ ने गहरी हैरानी और खौफ से पूछा।
"भले ही वह आदमी कोई भी हो... लेकिन मैं तो यह सोच रही हूँ कि... उसने हमारे ही घर के किसी सदस्य की मदद से इस घिनौने काम को अंजाम दिया है,"
बुआ ने फुसफुसाते हुए कहा।
"हमारा छोटा बेटा,... मेरा मतलब तुम्हारे भैया जी, ऐसा नीचा काम कभी नहीं कर सकते! ... और क्या मैं खुद अपने पति को मार डालने में किसी की मदद करूँगी भला? हाँ?! ... फिर रही बड़ी मालकिन, तो क्या वह अपने ही सगे मामाजी को मारने की साज़िश रचेगी? ... और कुसुमा? वह भला कैसे मदद कर सकती है, जो ठीक से दो शब्द भी नहीं बोल पाती! बाकी बचे पियसेन और हमारा छोटा लड़का। अगर मददगार पियसेन होता, तो क्या वह खुद हमारे साथ बाबा के पास जाता? ... मैंने सबके बारे में सोच लिया। मुझे तो छोटे लड़के पर ही शक है! ... हाय मेरे भगवान! अगर उस बेचारे को पुलिस ने पकड़ लिया, तो मैं क्या करूँगी? पापा तो हमें छोड़कर चले ही गए हैं..."
दादी माँ ने रोते हुए कहा। उनकी बातें सुनकर बुआ को गहरा गुस्सा आ गया।
"हूँ! आपकी बात तो बहुत अच्छी है ना माँ! अगर छोटे लड़के ने हत्यारे की मदद की है, तो उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाने का इंतज़ार क्यों करें? बल्कि हमें खुद उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर देना चाहिए!"
बुआ ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा।
"क्यूं छोटे बेटे, उन बाबा की बातों के बारे में तुम क्या सोचते हो?"
दादी ने पापा से पूछा।
"...सच ही कहूँगा तो मुझे भी उस नालायक पर शक है, क्योंकि उस रात वह घर पर नहीं था।...लेकिन अम्मा, हड़बड़ी में कुछ तय करना उतना अच्छा नहीं है,... क्योंकि बाबाओं की बातें पुलिस नहीं मानती।… लेकिन, उन बाबाजी की बात पर... मुझे तो थोड़ा यकीन भी हो रहा है, क्योंकि उन्होंने कहा था कि वहाँ एक बड़ी डफ़ली थी। वह बात सही है ना माँ?… नीचे घर के अंदर एक बड़ी डफ़ली है ना... हूँ...! वैसे पुलिस हत्यारे को पकड़ लेगी ना? तब सबकुछ सामने आ जाएगा, और इस बात का भी पर्दाफ़ाश हो जाएगा कि उसका मददगार कौन था।"
डर के साए में ऐसे ही दिन बीत रहे थे। हमारे गाँव में बिजली, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं थीं। घर के चारों तरफ बड़े-बड़े, घने पेड़ थे और पाँच एकड़ के इस सुनसान इलाके में हमारा इकलौता घर था।
मुझ पर तो डर की छाया तक पड़ने नहीं दी थी मेरे पिताजी ने। .. लेकिन उस वक्त इस माहौल के बीच, हम बच्चों को रात के समय अकेले घर से बाहर जाने नहीं दिया उन्होंने। डर के साए में ऐसे लगातार जीना बहुत मुश्किल हो रहा था, इसलिए दादी ने एक योजना बनाई। उन्होंने पापा से कहा,
"छोटे बेटे, इस तरह हमेशा डर से कांपते हुए जिया नहीं जा सकता।"
"तो हम क्या करेंगे अम्मा?" - पापा ने पूछा।
"क्या हम शरत को यहाँ बुला लें?"
"अरे माँ, वह अब शादीशुदा है... वह भला कैसे आ पाएगा? और वह भी यहाँ रहने के लिए?"
"अरे कोई बात नहीं छोटे बेटे, हम उससे कहेंगे कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को भी साथ ले आए।"
"हाँ, हाँ माँ... आप जो चाहें वो कीजिए। …पर शरत तो पापाजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद अभी-अभी ही वहाँ पहुँचा होगा, है ना?"
दादी ने उसी पल विशाल फूफा को बुलाया,
"पियसेन, तुम अभी के अभी जाकर शरत को एक टेलीग्राम भेज दो कि 'अपने परिवार के साथ जल्दी यहाँ आ जाओ'।"
चार दिन बाद शरत मामा—यानी मेरी माँ के छोटे भाई—अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ हमारे यहाँ आ गए।
उनके आने के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। हमारे मामाजी, यानी शरत मामा, एक बेहद निडर और साहसी व्यक्ति थे। इस कारण के अलावा घर की खामोशी भी दूर हो गई थी, क्योंकि उनके आने से हमारे घर में सदस्यों की संख्या भी बढ़ गई थी।
"शरत, तुमने अपनी नौकरी छोड़ दी है क्या?"
दादी ने शरत मामा से पूछा।
"हाँ मामीजी... वरना मैं इतनी जल्दी यहाँ कैसे आ पाता?"
"अरे... यह तो बहुत अफ़सोस की बात है... लेकिन इस मुश्किल वक़्त में तेरा आना हमारे लिए बहुत बड़ी मदद है।"
शरत मामा के आने से हमारे घर में कुल नौ बच्चे और नौ बड़े सदस्य हो गए थे। हम बच्चों में रमणी दीदी, मैं, चाचा के दो बच्चे, मेरी दो बहनें, मेरा भाई और शरत मामा के दो बच्चे शामिल थे। और बड़े सदस्यों में—दादी, मेरे माता-पिता, चाचा-चाची, फूफा-फूफी तथा मामा-मामी शामिल थे।
एक तरह से देखा जाए तो वह बहुत ही खूबसूरत परिवार था, क्योंकि खाना पकाते समय दादी, चाची और मामी हमारी माँ की मदद कर रही थीं।
ऐसे वक्त बुआ रसोईघर के आसपास भी नहीं जा रही थीं, वे कोई कपड़ा सिल रही थीं या फिर एक लेस गूँथ रही थीं।
शरत मामा हर शाम घूमने जाते थे, और सुबह से शाम तक बार-बार एक ही काम करते थे। अगर कहूँ कि वह काम क्या था... तो वह था लड़ाई करने का अभ्यास!!
एक दिन दादी ने शरत मामा से कहा,
"शरत, तुम आज भी शाम को घूमने जाओगे ना... तो थोड़ा जल्दी वापस आ जाना!"
"क्यों बड़ी मामीजी? बात क्या है? अभी भी मेरे पास कोई काम नहीं है ना, इसलिए मैं बाहर कोई लायक काम ढूँढने जाता हूँ। मैं फालतू में समय बर्बाद करने नहीं जा रहा हूँ। बताइए मामीजी, क्या काम है?"
"तुम्हारी गुणवती दीदी, मतलब हमारी छोटी बेटी... उसके पति पियसेन ने एक बेकरी खोली थी ना?… तुम्हारे बड़े मामाजी की हत्या के बाद से वह आज तक बंद है। पियसेन बुदबुदा रहा था,
'क्या करूँ, अकेले जा भी नहीं सकता, बहुत डर लगता है।'
…तो शरत, क्या तुम कल सुबह तक वहाँ रह सकोगे?"
"जी हाँ मामीजी, क्यों नहीं? ज़रूर जाऊँगा,"
शरत मामा ने कहा।
उसके बाद विशाल फूफा ने अपनी बेकरी फिर से खोली। लेकिन वे उस बेकरी में रात नहीं गुज़ारते थे।
दादाजी के कत्ल के बाद लगभग दो-तीन महीने बीत गए थे, लेकिन अकेले घर से बाहर जाने वाले केवल शरत मामा थे।
मुझे शरत मामा का एक काम बहुत अच्छा लगता था, और वह काम यह था।
हमारे घर के सामने मैंगोस्टीन का एक पेड़ था। उसके चारों ओर बड़ी-बड़ी शाखाएँ थीं। शरत मामा ने उन शाखाओं में से जो सबसे नीचे वाली शाखा थी, उस पर एक बड़ा बोरा लटकाया। उसके बाद उन्होंने उस बोरे को रेत से भर दिया।
उसी बीच, मैं ध्यान से उनका यह काम देख रही थी। उन्होंने उस बोरे का ऊपरी हिस्सा कसकर बाँध दिया। उसके बाद, वे एक शेर की तरह लपक-लपक कर उस बोरे पर वार करने लगे।
मुझे पता नहीं था कि शरत मामा ऐसा क्यों कर रहे थे। जब मैंने माँ से पूछा, तो उन्होंने कहा,
"तुम्हारे मामाजी बुरा करने वालों के लिए काल हैं और अच्छे इंसानों के लिए वे खुद एक बहुत अच्छे इंसान हैं।"
[अगले भाग से संबंधित]
भोर से हीरक तक-[8]
वैसे, जब मैं दूसरी कक्षा में थी, एक शाम लगभग छह बजे दादाजी ने हमारी माँ से कहा,
"बड़ी मालकिन, अब मैं नीचे घर जा रहा हूँ। वहाँ मुझे कुछ काम है। रात के खाने के लिए तुम मेरे लिए कुछ तैयार कर दो, क्योंकि मैं आज रात को वापस घर नहीं आऊँगा। वैसे बड़ी मालकिन, क्या घर पर खाना तैयार है या नहीं?"
"खाना तो मैं तैयार कर चुकी हूँ मामाजी! रुकिए, मैं अभी लेकर आती हूँ।" - माँ ने कहा।
दादाजी हमारी माँ को हमेशा 'बड़ी मालकिन' कहकर पुकारते थे। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था, हमारी माँ दरअसल दादाजी की छोटी बहन की बड़ी बेटी थीं। केवल दादाजी ही नहीं, बल्कि पापा के परिवार के सभी सदस्य उस पुराने रिश्ते और खून के मान को बनाए रखते हुए माँ को इसी आदर के साथ पुकारते थे, और माँ भी उसी गरिमा के साथ उस पूरे परिवार को संभालती थीं।
कुछ देर बाद माँ खाने का डिब्बा ले आईं और उसे दादाजी के हाथ में सौंप दिया। दादाजी चले गए।
उस वक्त हमारे घर के सामने की पगडंडी पर बहुत सारे लोग आ-जा रहे थे, क्योंकि उसी रात 'फोंसेका मिस' की शादी का जश्न होने वाला था।
हम उन शिक्षिका जी के लिए 'फॉंसेका मिस' कहने का कारण था कि उनका कुलनाम 'फॉंसेका' था। हमारे घर से उस घर तक की दूरी लगभग दो किलोमीटर थी। शाम से लेकर देर रात तक सामने रास्ते पर काफी गहमागहमी थी।
उस रात करीब दस बजे, जब हम सो रहे थे, तब माँ ने हमें जगाया और कहा,
"गीता, भाग्या, जल्दी आओ! तुम्हें कुछ दिखाना है।"
हम अपनी आँखें मलते हुए माँ के पीछे-पीछे चली गईं।
"वह देखो! वहाँ, वहाँ...! अरे भाग्या, यहाँ नहीं, वहाँ देखो... उन लालटेनों की रोशनी की तरफ देखो!"
"किधर है?"
भाग्या ने पूछा।
"अरे बुद्धू! उन पेड़ों के बीच में देखो!!"
"हाँ…............!! जी माँ, अब दिखा।"
"वे लोग इसी तरफ आ रहे हैं। आज मालिनी मिस दुल्हन बन गई हैं।" माँ ने बताया।
भाग्या और मैं कभी भी किसी की शादी के उत्सव में शामिल नहीं हुई थीं। इसका कारण यह था कि पिताजी हमें कहीं भी जाने नहीं देते थे। उनका हमेशा यही कहना था कि अगर बच्चों को बचपन में ही नहीं सुधारा गया, तो बड़े होने पर उन्हें कोई नहीं सुधार सकता। उनका मानना था कि अगर बच्चियों ने कोई गलत चीज़ देख ली, तो बाद में हमारे लिए ही दिक्कत हो सकती है।
"दुल्हन? वह क्या होती है माँ?"
भाग्या ने पूछा।
"मतलब आज उनकी शादी हो गई है।"
"किसकी?"
"अरे पगली!...फोंसेका मिस की ही तो! वरना क्या मेरी है?"
"वह तो एक जुलूस जैसा है ना, माँ?"
"हाँ, जुलूस ही है।"
"अरे वाह! शाबाश! क्या वहाँ हाथी, नर्तक और भेरी-वादक भी हैं?"
"मुझे भी नहीं पता, चलो देखते हैं।"
हमारी स्कूल की किताबों में जुलूस की तस्वीरें छपी थीं, इसलिए हम जानते थे कि जुलूस क्या होता है। कुछ ही देर में चाचीजी, स्वर्णा, दादीजी और पिताजी भी हमारे पास आ गए। उस दिन चाचाजी घर पर नहीं थे।
थोड़ी देर बाद हमारी गोरी बहन भी आँखें मलती हुई हमारे पास आ गई, जो सो रही थी। उस समय वह सिर्फ तीन साल की बच्ची थी।
हमारे घर के चारों ओर बहुत बड़े पेड़ थे। उन पेड़ों के पत्तों के बीच से, जगमगाते हुए जुगनुओं जैसे, लालटेनों की रोशनी जगह-जगह बिखर रही थी। उन दिनों हमारे गांव में पानी, बिजली और गाड़ियों जैसी सुविधाएं नहीं थीं। लेकिन रात्रि का वह मंगल उत्सव बहुत ही मनमोहक दृश्य था।
वैसे ही वह जोड़ी हमारे घर के सामने से पैदल जा रही थी। गोरी बहन ने दादी मां से पूछा,
"उस हाथी को क्यों गोरी साड़ी पहनाई है?"
वह सवाल सुनकर हमारी माँ की बत्तीसी खिल गई। यह देख गोरी बहन को गुस्सा आ गया और वह जोर से रोने लगी।
"ओहो... मेरी लाड़ली, तू रो मत। मैं तुझे बताती हूँ।... मेरी छोटी बिटिया, वह हाथी नहीं है, वह दुल्हन है। फॉंसेका मिस बहुत मोटी हैं ना... भला कौन नहीं सोचेगा कि जुलूस में जा रहा वह जीव एक हाथी है?"
दादी ने कहा।
"दादी माँ, दुल्हन किसे कहते हैं?"
गोरी ने पूछा।
"बहुत खूबसूरती से सजी हुई औरत को हम 'दुल्हन' कहते हैं।"
"औरतों को!... हूँ।.... दादी माँ, कहाँ जा रही थी वह दुल्हन?"
"वह अपने पति के घर रहने जा रही थी।"
"पति? कौन है वह?"
"शादी के दिन औरतों को उपहार के रूप में पति मिलता है।"
"क्या दादी माँ भी दुल्हन बनी थीं?"
"हाँ, मैं भी दुल्हन बनी थी।"
"हूँ...! तो वह पति कहाँ है, जो दादी माँ को शादी के दिन उपहार के रूप में मिला था?"
"वे तो तुम्हारे दादा जी हैं।"
उन दोनों का संभाषण सुनकर, हमारी माँ अपनी हँसी दबा रही थीं। गोरी ने माँ को देखा और सवाल पूछना बंद कर दिया। फिर उसने अपना मुँह लटका लिया, यह देखकर दादी ने माँ से कहा:
"बड़ी मालकिन, इतना हँसना अच्छा नहीं है। बहुत जल्द कोई मुसीबत आ सकती है।"
अगली सुबह लगभग साढ़े छह बजे दादी माँ ने चाय बनाई, क्योंकि पापा और मैं स्कूल जाने वाले थे। दादी ने माँ को बुलाया और कहा:
"बड़ी मालकिन, मैं उनके लिए चाय लेकर जा रही हूँ।.. जाते समय वे कह रहे थे कि सुबह-सुबह आऊँगा... पर अब तक सो रहे हैं। खैर,मैं फटाफट वापस आती हूँ।"
ऐसा कहकर दादी चाय की थाली लिए नीचे घर की तरफ चली गईं। कुछ समय बाद पिताजी स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे और माँ रसोईघर में थीं। तभी पापा ने माँ को बुलाया और बड़े कौतूहल से पूछा:
"बड़ी मालकिन,… तुम्हें भी कुछ अजीब चीखने की आवाज़ सुनाई दे रही है क्या?"
"जी हाँ, मैं भी आपसे यही पूछने वाली थी। किसी औरत के चिल्लाने की आवाज़ है। कौन है वह? आसपास से तो नहीं आ रही है वह आवाज़?"
माँ ने जवाब दिया।
"चलो देखते हैं कि कौन चिल्ला रही है।"
ऐसा कहते हुए पिताजी घर के सामने आए। माँ भी उनके पीछे-पीछे बाहर आ गईं। तभी एक आदमी हड़बड़ी में हमारे घर की ओर दौड़ता हुआ आया। वह आदमी तेजी-तेजी से साँस ले रहा था। उसने कहा:
"बड़े गुरु जी, बड़े गुरु जी! अरे हे भगवान...! सत्यानाश! सत्यानाश! स...सब खत्म, सब खत्म!! ..."
"क्यों? क्या हुआ?"
"अरे गुरु जी... मैं र... र... रास्ते से जा रहा था। तभी मुझे एक औरत के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। मैं रुक गया और आवाज़ आने की दिशा ढूँढने लगा। उस वक्त मैंने देखा कि आपकी माँ मदद माँगती हुई चिल्ला रही थीं…।"
"क्या..? हमारी माँ..? वे कहाँ हैं?"
"वह.. वह... नीचे वाले घर के सामने..."
"बयानबाज़ी बंद करो और सीधे बताओ कि क्या हुआ है?"
"अ... अ... अरे बड़े गुरु जी!.. न... न... नहीं, नहीं! मैं तो कभी नहीं बताऊँगा। आप खुद ही जाकर देख लीजिए... जल्दी, जल्दी!"
हमारे पिताजी कभी नहीं दौड़ते थे। वे तेज़ी से नीचे वाले घर की तरफ पैदल चलने लगे। उस वक्त हमारी गोरी बहन सो रही थी और भाग्या बहन भी, इसलिए माँ बड़ी बेचैनी से घर पर ही रुकी रहीं।
"मैं ... जल्दी... वापस आ..ऊँगी। तब तक ज़रा... हमारे... छोटे बेटे की तरफ नज़र रखना..., वह सो... रहा है,"
कहती हुई चाची भी नीचे वाले घर की ओर चली गईं।
माँ बार-बार दहलीज़ पर जातीं और फिर वापस कमरे के अंदर आ जाती थीं। बीच-बीच में वे अकेले ही फुसफुसा रही थीं:
"काश!... मैं कैसे जाऊँ...? मेरे वहाँ जाने का कोई रास्ता नहीं है ना... ऊपर से कुसुमा भी चली गई। मामाजी तो मेरे हैं। सब लोग जा रहे हैं। बस मुझे इतना जानना है कि मामाजी को क्या हुआ है..."
माँ दहलीज़ पर खड़ी थीं। तभी उन्होंने देखा कि चाची वापस आ रही हैं।
"मामाजी को क्या हुआ है?"
माँ ने चाची से पूछा।
[अगले भाग से संबंधित]
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