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31/07/2024

आज मैंने महाराजा देखी, वैसे फ़िल्म देखना मुझे बहुत पसंद है और जब उसमे अच्छे ऐक्टर्स हो तो और भी ज़्यादा, मगर इस फ़िल्म ने अपनी कहानी के वजह से मुझे अंदर तक हिला दिया, यह कहानी किसी सैलून चलाने वाले की नहीं है, पर समाज के नंगे सच की है। जहाँ आज हर कोई किसी ना किसी तरह से अगले को काट के खाने में लगा है, आदमी अपनी हवस के लिए राह चलती हर लड़की पर नज़र डाल रहा है, वहाँ यह कहानी आपको आपके किए कर्मों का आईना दिखाती है।

मैं इसकी कहानी नहीं बताना चाहता, क्योंकि वो इस फ़िल्म के निर्माताओं के साथ और उद्देश्य के साथ खिलवाड़ होगा, लेकिन फिर भी मैं आपको एक कहानी बताऊँगा जिसक विचार तो मेरे चाचा दीपक भारतवासी ने दिया था और मैंने उसे अपने शब्दों में बहुत पहले एक ओपन माइक के कार्यक्रम में पढ़ा भी था।

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एक लड़की, जिसने जीवन में अपने कई सपने देखे और पूरा करने के लिए पूरे लगन और मेहनत से काम करती है, सुबह समय से उठना, अपने मन और तन की सुंदरता पर ध्यान देना, बड़ों का सम्मान करना, समाज के बताये नियमों के हिसाब से कपड़े पहनना, नारीत्व के सबसे बड़े सूचकों में से एक, माथे पर बिंदी लगाना।

यह सभी उसके नित्य कार्य थे, तैयार होकर अपने ऑफिस के लिए निकलना, शाम को अंधेरा होने से पहले घर आना। उसे पता है कि उसे कौन सी निगाहें और उसके ढके तन को कहाँ तक देखती है, फिर भी वो अपने लक्ष्य के लिए इन सभी चीज़ों को नज़रअंदाज़ करती है।

पर एक दिन उसे घर वापस आने मे थोड़ी देर होती है, ऑटो से उतर कर क़रीब डेढ़ किलोमीटर उसे पैदल जाना होता है, जो वो ख़ुद से बातें करते आराम से तय कर लेती है, लेकिन आज अंधेरा भी ज़्यादा है, उसकी गति भी ज़्यादा है, और शायद रास्ता भी। उसे आभास होता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है, एक आदमी पैंट शर्ट पहने अच्छे घर का लग रहा है, पर उसके इरादे नहीं।

अंधेरेपन और अकेलेपन का फ़ायदा उठा कर बिना डरे वो लड़की के पीछे पीछे चलता रहता है, आदमी का फ़ोन भी बार बार बज रहा है, पर उसके दिमाग़ पर हवस सवार है, वो पीछा करता रहता है, और एक मोड़ पर लड़की का हाथ पकड़ लेता है, उसे एक खंडहर जैसे घर की तरफ़ खींचने लगता है, लड़की चिल्लाती है पर कोई भी उसे वहाँ सुनने वाला नहीं है, वो लड़की का पल्लू खींच लेता है, लड़की अपना एक हाथ अपने अंग को छुपाने में लगाती है और ज़ोर से हाथ झटक देती है, इससे उसका हाथ तो छूट जाता है लेकिन वो ज़मीन पर गिर जाती है।

तभी वहाँ एक आदमी बाइक पर आता है और एकदम उसी हवसी के सामने खड़ा कर देता है, और उससे कहता है, की जल्दी चलो तुम्हारी लड़की के साथ किसी ने रेप कर दिया है, भाभी अस्पताल में है और तुम्हें कबसे कॉल कर रही है, उस आदमी के हाथ से पल्लू गिर जाता है, उसकी आँख में हवस की आग नहीं आत्मग्लानि के आंसू दिखने लगते हैं, लड़की अपना पल्लू उठाती है, और वहाँ से ज़ोरो से भागती है।

आपका किया - आप पर पलट के आता है, मेरी कहानी का नाम मैंने "आयना" रखा था।

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महाराजा इस कहानी को बहुत आगे ले जाती है, यू तो आप फिर भी महाराजा देखते वक्त नहीं समझ पायेंगे कि मैं यह कहानी क्यों सुना रहा हूँ, और फ़िल्म में डूबे रहेंगे, लेकिन जब आप मेरी कहानी और महाराजा की कहानी जोड़ पायेंगे, तब भले फ़िल्म का अंत आ गया होगा, पर आपके विचारों में शुद्धता शायद नयी या पुनर्जीवित अवश्य होगी।

महाराजा ज़रूर देखे-

Lekhanbaji

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