TreeMan Devender Sura
13/07/2026
पर्यावरण मित्र डां संदिप मलिक बेटे के साथ जनता नर्सरी में #ट्री
15/11/2025
भगवान माता जी आत्मा को शांति दे🙏
114 साल की पर्यावरणविद् थिमक्का, यानी हम सबकी प्यारी ‘वृक्षमाता’, हमें हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं।
अपने पीछे वो अपने लगाए हुए हज़ारों वृक्षों की विरासत छोड़ गई हैं—जो आने वाले कई दशकों तक उन्हें याद दिलाते रहेंगे और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। कर्नाटक के तुमकुरु ज़िले में जन्मी थिमक्का की शादी केवल 12 साल की उम्र में हो गई थी। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने शुरुआती दौर में खदान में मज़दूर के रूप में काम किया और शिक्षा का अवसर नहीं मिल पाया।
उनके कोई बच्चे नहीं थे, लेकिन पौधों से गहरा लगाव था।
पेड़ लगाना ही उन्हें सुकून देता था। इसी प्यार की वजह से उन्होंने 80 वर्षों में 8,000 से ज़्यादा पेड़ लगाए और उनकी देखभाल की। उन्होंने अपने पति चिक्कैया के साथ मिलकर बरगद के पेड़ लगाने की शुरुआत की—पहले 10 पौधे, फिर हर साल यह संख्या बढ़ती गई। धीरे-धीरे उनका पौधारोपण अभियान अन्य गाँवों तक फैल गया।
सूखे क्षेत्र में रहने के बावजूद यह दंपती दिन-रात मेहनत करते रहे—चिक्कैया गड्ढे खोदते और थिमक्का पौधों को पानी देतीं। इसी समर्पण के कारण उन्हें ‘वृक्षमाता’ यानी Mother of Trees कहा जाने लगा। दोनों ने मिलकर करीब 400 पेड़ों को बच्चों की तरह पाला।
1991 में पति के निधन के बाद भी थिमक्का का पर्यावरण संरक्षण का सफर नहीं रुका। उनके काम को पहली बार 1995 में राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार के साथ सम्मान मिला।
2019 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और 2020 में केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्नाटक ने उन्हें मानद डॉक्टरेट उपाधि प्रदान की।
थिमक्का की उपलब्धियाँ अनगिनत हैं, लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने पूरे देश—खासतौर पर युवाओं—को सिखाया कि हमारा भविष्य, हमारे पर्यावरण की रक्षा में छिपा है।
आज भले ही थिमक्का हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका लगाया हर पौधा, उनकी विरासत, उनका प्रेम और धरती के प्रति उनका कर्तव्य हमेशा हरियाली की तरह फलता-फूलता रहे
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