Satyapath
07/07/2018
1.८ धर्म से सम्बन्धित (द्धितीय) :
जारी ......................
बल‚ शक्ति‚ धन व ज्ञान इन गुणों में धन प्राप्ति किस प्रकार की होनी चाहिए ऋग्वेद के ऋषि इस बारे में स्पष्ट करते हैं‚ इस प्रकार के वेदों में कई प्रकार के श्लोक हैं परंतु सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद का मण्डल १‚ सूक्त १८५ का १९३३ वाँ संलग्न श्लोक अर्थ सहित देखिए कि ऋषि किस प्रकार के धन वैभव की कामना कर रहे हैं –
1.७ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
पूर्व के लेख में हमने जाना कि कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषि वाणी के माध्यम से ईश्वर ने बताया है कि मनुष्यों में जन्म के अनुसार दो जातियाँ स्त्री व पुरूष हैं व गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार सभी मनुष्य ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र चार भागों अर्थात् वरणों में विभक्त हैं व इन सभी को धर्म का आचरण करना अनिवार्य है। धर्म क्या है इसको लेकर अति महान ऋषियों के विचारों से अवगत हुए।
आइए अब जानते हैं कि धर्म को लेकर वेदों की मनुष्यों को और क्या आज्ञाएँ हैं। पवित्र वेद मनुष्यों से धर्म के पालन व उसकी स्थापना दोनों की बात कहते हैं न कि मात्र धर्म के पालन को और इसके लिए वेदों में ऋषियों ने अनेक प्रकार की प्रार्थनाएँ भी कि हैं जिनका सार है कि हे ईश्वर हमें बलशाली‚ शक्तिशाली‚ धनवान व ज्ञानवान बनाओ। क्योंकि इस पृथ्वी पर बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान व ज्ञानवान व्यक्ति ही कुछ भी कर सकता है क्योंकि मात्र इन्ही चार प्रकार के मनुष्यों का प्रभाव होता है। इसलिए वेदों की शिक्षा के अनुसार धर्म के पालन व उसकी स्थापना के लिए प्रत्येक मनुष्य का बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान व ज्ञानवान बनना अति आवश्यक है क्योंकि इन चारों गुणों से क्षीण एक कमजोर व्यक्ति धर्म का पालन तो कर सकता है परंतु धर्म की स्थापना कदापि नही अतः वह पवित्र वेदों के ईश्वरीय वाणी के अनुसार ईश्वरीय व धर्म पथ पर पूणरूपेण अग्रसर नही हो सकता। और ऋषियों के अनुसार धर्म पालन श्रेष्ठ है परंतु इसके साथ ही धर्म की स्थापना का कार्य कई गुणा श्रेष्ठ कार्य है‚ यही कारण है कि हमारी सनातन संस्कृति में श्री राम‚ परशुराम व श्री कृष्ण आदि को भगवान तक का दर्जा दिया गया परंतु शायद ही किसी ऋषि को यह दर्जा दिया गया है।
वस्तुतः ये चारों गुण किसी एक व्यक्ति में मिलना अत्यंत कठिन है परंतु एक – एक गुण कोई भी मनुष्य प्राप्त कर सकता है जो वेदों के ऋषियों के अनुसार पृथ्वी के प्रत्येक आर्य (श्रेष्ठ अर्थात् सज्जन व विनम्र) मनुष्य के लिए अति आवश्यक है अन्यथा धर्म की स्थापना सम्भव ही नही। बलवान व शक्तिवान बनना‚ धनवान व ज्ञानवान बनने की अपेक्षा सहज है।
जैसे यदि कोई दुर्जन व्यक्ति कोई अधर्म का कार्य कर रहा है जिसके कारण अधर्म की महत्ता बढ रही है तो धर्म की स्थापना हेतु उसका प्रतिकार उपर्युक्त चारों गुणों वाला ही कोई कर सकता है‚ कमजोर नही।
जारी ............
20/06/2018
1.४ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
पूर्व के लेख में हमने सनातन धर्म के सरवोच्च पवित्र ग्रथ वेदों के बारें बारें में जाना‚ लेख को संक्षिप्त करने के लिए वेदों व सनातन धर्म के अन्य पवित्र ज्ञान के प्रमाणिक ग्रंथों की जानकारी व उनके प्राप्तकर्ता व अन्य ग्रंथों के रचनाकारों की जानकारी के लिए इस लेख के साथ एक चित्र संलग्न है कृपया उसे भी देखें।
सर्वप्रथम आपको जानना चाहिए कि वेदों की भाषा संस्कृत है व उसकी लिपि ब्राह्मी है जबकि वर्तमान संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। कभी कभार अापने सुना होगा कि वेदों को स्वयं न पढकर किसी प्रमाणिक विद्वान से सुनना चाहिए व उन्ही के लिखित बातों को मानना चाहिए‚ न कि बिना ज्ञान के स्वयं उनका अर्थ निकालना चाहिए जैसे पूर्व में कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने बिना किसी नियम के इन पवित्र वेदों के अकाट्य ज्ञान का स्वयं के अनुसार अर्थ कर लोगों को भ्रमित किया जैसे – मैक्समूलर व सायण आदि। धन्य हो विरजानंद महाराज व उनके शिष्य दयानंद सरस्वती महाराज जी की जो आधुनिक काल मेें उन पवित्र वेदों की शिक्षाओं को नियमानुसार पढ उनके प्रमाणिक भाष्य का आगे बढाया। आइए जानते हैं कि वेदों में उल्लिखित ज्ञान को समझने के लिए क्या नियम हैं।
प्रमाणिक विद्वानों के अनुसार वेदों को स्वयं से पढकर समझने के लिए ये निम्न ग्रंथों का ज्ञान परम आवश्यक है‚ इन ग्रंथों के पढे बिना जो वेदों के श्लोकों का स्वयं भाष्य करते हैं वे अनुचित व पापयुक्त कार्य करते हैं।
वेदों के श्लोकों को स्वयं से समझने के लिए ये छः गंथों का ज्ञान होना परम आवश्यक है –
वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों के अंग। वेदांग हिन्दू धर्म ग्रंथ हैं, इनकी संख्या 6 है।
• शिक्षा
• व्याकरण
• ज्योतिष
• निरुक्त
• छंद
• कल्प
शिक्षा-
वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये इसकी रचना हुई। इससे संबंधित प्राचीनतम ग्रन्थ – प्रतिशाख्य है।
व्याकरण-
वेदों में प्रयुक्त की गई संस्कृत – व्याकरण का सरलीकरण इसमें मिलता है। संबंधित ग्रंथ – पाणिनि का अष्टाध्यायी(5 वी. शता. ई.पू.)।
ज्योतिष-
शुभ – अशुभ तथा वैदिक यज्ञों में कर्मकांडों के शुभ- अशुभ फलों के प्रभाव को जानने के लिये ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता है। इससे संबंधित ग्रंथ – मागध मुनि का वेदांग ज्योतिष।
निरुक्त –
इसमें वैदिक साहित्य में प्रयुक्त कठिन शब्दों की व्युत्पत्ति मिलती है। इससे संबंधित ग्रंथ – निगंठु । इस ग्रंथ में वैदिक साहित्य के कठिन शब्द मिलते हैं।
छंद-
वैदिक साहित्य के मंत्रों के लिये प्रयुक्त किये गये विभिन्न छंदों का उल्लेख छंद नामक वेदांग में हुआ है। इससे संबंधित ग्रंथ-पिंगलमुनि का छंद सूत्र।
कल्प –
वैदिक साहित्य में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के कर्म – कांडों को कल्प सूत्र में लिखा गया है।
इसके 4 भाग हैं(कल्प को ही सूत्र साहित्य कहा गया है)-
1. धर्म सूत्र-
वैदिक समाज के सामाजिक नियम – कानून सूत्र रूप में मिलते हैं । इसमें
एक – एक पंक्ति में
श्लोक मिलते हैं। इसी धर्म सूत्र पर आगे स्मृति ग्रंथ लिखे गये।
2. गृह्य सूत्र-
व्यक्ति और परिवार से संबंधित व्यक्तियों और कर्म – कांडों का उल्लेख
है।
3. श्रौत सूत्र-
इस सूत्र में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये विविध प्रकार के
कर्मकांड दिये हुये हैं।
4. शुल्व सूत्र-
शुल्व का शाब्दिक अर्थ होता है-रस्सी । इसमें वैदिक यज्ञों के निर्माण की
विधि (हवन कुण्ड को बनाने की विधि) बताई गई है। यज्ञ वेदियों का
प्रकार कैसा होगा , वो सब इसमें बताया गया
है। इसे भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ कहा गया है।
वेदों को समझने के लिए इन परम आवश्यक ग्रंथों को पढने व इनके ज्ञानार्जन के बाद ब्राह्मण, आरण्यक, संहिता आदि ग्रथों को पढना भी आवश्यक है ताकि वेदों को लेकर पूर्व ऋषियों के ज्ञान से भी अवगत हुआ जा सके ताकि पवित्र वेदों को लेकर भूल व त्रुटि की संभावना नगण्य हो सके।
अब बताइए अभी तक जिन दुष्ट प्रकृति के लोगों ने पवत्रि वेदों के भाष्य बिना इन ग्रंथों को पढे कर दिया उन्हे क्या कहा जाय। जबकि प्राचीन काल में इन ग्रंथों कों पढते हुए वेदों तक पहुचने की अवस्था ८ वर्ष से प्रारम्भ होकर २५ वर्ष की अवस्था निरधारति की गयी थी‚ परंतु इन मैक्समूलर व सायण आदि दुष्टों ने बिना नियम के स्वयं के अनुसार जो मन आया वो बकवास करते गए। ये धन्य हो उन महापुरूष विरजानंद महाराज जी का जिन्होने पहले से ज्ञान की अग्नि में जल रहे स्वामी दयानंद सरस्वती को परिश्रम की पराकाष्टा कराते हुए तपाकर खरा सोना तैयार किया व आधुनिक काल में लोग वेदों के अकाट्य ज्ञान से परिचित हो पा रहे हैं।
ओउम् .......।
1.2 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
पूव में हमने, मनुष्य जन्मावस्था से लेकर युवावस्था तक प्राप्त विचारों अर्थात् दर्शन के अनुसार अपना जीवन जीने वाला एक प्राणी है, जिसमें कुछ एक मनुष्य इस चक्र को तोड़ भी देते हैं, इस पर चर्चा की थी अब ............
इस संसार में सदैव से बहुत से मनुष्य स्वयं के या प्राप्त विचारों अर्थात दर्शन के अनुसार अन्य मनुष्यों को स्वयं के अनुसार प्रेरित करने का प्रयास करते चले आ रहे हैं जो आज भी अनवरत जारी है ..... जिसमें कुछ एक मनुष्यों को इस कार्य में अत्यधिक सफलता प्राप्त हुई और कुछ को नही। वैश्विक परिदृश्य में देखें तो हम पाएंगे कि इसाइयत व इस्लाम विचारधाराओं के प्रवर्तक जीसस और मोहम्मद ने बहुत हद तक लोगों को स्वयं के अनुसार परिवर्तित किया तथा संख्या अधिक होकर समूह बन जाने पर संगठित रखने के उद्देश्य से इसाई और इस्लाम नाम दिए। इसी तरह हमारे भारत देश की धरती से भी बहुत से लोग हैं जैसे - महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, गुरूनानक, कबीरदास, रविदास, स्वामी दयानंद आदि। इनमें बहुतों ने अपने से प्रभावित लोगों को कोई समूह रूप में रखने के लिए कोई सांगठनिक नाम आदि नही दिया परंतु बाद में लोगों ने पहचान स्थापित रखने के उद्देश्य से स्वयं ही कोई न कोई नाम स्थापित कर लिया।
भारत देश में इनके अतिरिक्त भी कुछ एक दर्शन हैं जिनकी स्थापना नही की गयी परंतु वे प्रभावित हो उसी के अनुसार अपना जीवन जीने का प्रयास करने लगे और सम्भवतः स्वयं ही नाम भी धारण किया जैसे - वैष्णव, शाक्त और शैव जिसमें वैष्णव लोग वैदिक दर्शन के ग्रंथ वेदों को सरवोच्च ग्रंथ मानते हैं। चूंकि आज के समय में वैष्णव, शाक्त एवं शैव लगभग एक हो चुके हैं और सभी एक दूसरे की परम्पराओं मे रच बस गए हैं तो लगभग सभी वेदों को सरवोच्च मानते हैं।
क्रमशः ..............
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