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18/03/2022

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को लक्ष्मी जयंती का पावन पर्व मनाया जाता है। लक्ष्मी जयंती के दिन फाल्गुन पूर्णिमा होने के कारण उत्तरा फाल्गुन नक्षत्र होता है, खासकर ये तिथि दक्षिण भारत में मनाई जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। धार्मिक ग्रंथों की मानें तो राक्षस और देवताओं के बीच समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी अवतरित हुई थी। इस दिन विधि विधान से धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना करने से माता लक्ष्मी का आशीर्वाद अपने भक्तों पर सदैव बना रहता है। तथा आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और धन प्राप्ति के मार्ग में वृद्धि होती है।

Lakshmi Jayanti is the birth anniversary of Goddess Lakshmi. Goddess Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity. It is believed that Goddess Lakshmi was born on Phalguna Purnima during the great churning of milky ocean which is popularly known as Samudra Manthan.

It is significant to note that day of Phalguna Purnima mostly coincides with Uttara Phalguni Nakshatra. Hence the day of Uttara Phalguni is also associated with Lakshmi Jayanti.
Lakshmi Jayanti is observed mainly in SOUTH INDIA and it is less known in North Indian states.

WISHING YOU AND YOUR FAMILY VERY AUSPICIOUS LAKSHMI JAYANTI AND HAPPY COLOURFUL HOLI!
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15/06/2021

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29/03/2021

🔯 ॐ उग्रवीरं महा विष्णुं ज्वलन्तं सर्वतो मुखम्।
नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥"

हिरण्यकश्यप मदिरा पान में तन्मय हो सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी क्रूरता से प्रताड़ित करने लगा,नर नारी, नाग, किन्नर, गंधर्व और स्वयं इन्द्र आदि देवतागण भी उससे भयभीत रहने लगे| इधर भक्त प्रह्लाद गुरुकुल में श्री हरि का नाम निरंतर जपते रहे ! अपने राक्षस सखाओ को भी श्री हरि विष्णु के नाम संकीर्तन महत्व समझाया और जिससे प्रभावित हो उनके सभी सखा और गुरुजनों को भी श्री हरि विष्णु के श्री चरणों में अनुराग हो गया ! जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, उसे शरीर नहीं दिखता, केवल परमात्मा ही दिखते हैं ! यह सुन हिरण्यकश्यप की आँखे क्रोध से लाल लाल हो गयी ! उसकी भृकुटी तन गयी और उसनें प्रह्लाद से कहा- अरे मुर्ख !! और कहाँ-कहाँ दिखता है तुझे तेरा परमात्मा ? प्रह्लााद ने कहा- प्रत्येक वस्तु में आकाश में, धरती में, वायु में, आप में, मुझ में, सारे संतो में, और इन दैत्य सैनिको में भी आप विश्वास कीजिये पिताश्री वे सृष्टीके कण-कण में विद्यमान हैं | हिरण्यकश्यप ने कहा- यहाँ के हर वस्तु में भी ,प्रह्लाद ने हाथ जोड़ कर कहा- जी पिताश्री ! हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा : इस महल में भी ? प्रह्लाद ने कहा - जी पिताश्री !! मैं तो उन्हें इस महल की हर वस्तु में देख रहा हूँ ! हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा- तो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे में भी दिखता है,तुझे तेरा परमात्मा...? प्रह्लाद ने कहा- जी पिताश्री ,वे उस खम्बे में भी हैं ! हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा- अरे मूढ़ !! यदि वो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे में भी अगर तेरा वो विष्णु है तो जा आलिंगन कर उसका !! यह सुन प्रह्लाद उस दहकते हुए खम्बे की ओर श्री हरि विष्णु नारायण का ध्यान करते हुए बढे | अपने प्रिय भक्त का अटूट विश्वास और हिरण्यकश्यप के पाप का घड़ा भरा हुआ देख स्वयं भगवान "श्री हरि विष्णु नारायण- श्रीनृसिंहजी" के रूप में सिंह की सी गर्जना करते हुए उस खम्बे को फाड़कर प्रकट हुए !भगवान श्री हरि विष्णु नारायण का वो रौद्र रूप बहुत ही भयंकर था ! उनका मुख सिंह का था उनका शरीर मनुष्य का था हाथों में सिंह के से बड़े बड़े नाख़ून थे श्री भगवान का वह रूप देख वहां उपस्थित सभी लोग डरने लगे यहा तक स्वयं प्रह्लाद भी एक क्षण के लिए डर गए !
हिरण्यकश्यप ने श्री भगवान का यह रूप देखा तो वो भी डर से कांपने लगा ! फिर हिरण्यकश्यप कुछ संभलकर भगवान नृसिंहजी पर प्रहार करने लगा परन्तु भगवान के प्रहार का वेग वो सहन न कर सका और कुछ ही समय में थक गया और श्री हरि विष्णु नारायण जिन्होंने नृसिंह देवजी के रूप में अवतार लिया था वे उसी क्रोधित मुद्रा में सिंह की सी गर्जना करते हुए हिरण्यकश्यप के समीप गए और उसे अपने नाखून वाले हाथो से पकड़ के बीच सभा में घसीटते हुए उस सभा के द्वार की देहली पर ले गए और हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में उठा कर लिटा लिया श्री भगवान का ये रूप देख हिरण्यकश्यप के मुख से एक भी स्वर नहीं निकला और फिर भगवान नृसिंह देव यह देख उससे इस प्रकार कहने लगे -
हे असुरवंशी हिरण्यकश्यप ! तुझे ब्रह्मा जी का वरदान था की तू किसी ब्रह्मा की सृष्टि से नहीं मरेगा तो देख मैं स्वयं ब्रह्मा की सृष्टि में नहीं हूँ..न मैं नर हूँ न पशु.न देवता न दैत्य हूं !
इस समय न दिन हैं न रात्रि हैं.इस समय सायंकाल हैं.तुझे न अस्त्र से मारा जा रहा है न शस्त्र से... तुझे स्वयं मैं अपने इन नाखूनों से मारूंगा.तू न धरती में है न आकाश में.देख तू मेरी गोद में हैं. तू उन बारह महीनो ,में भी नहीं मारा जा रहा,

केवल तेरे लिए ही मैंने इस अधिक {पुरषोतम} मास की रचना की हैं...
न तू अन्दर हैं न बाहर.तुझे मैं घर की द्वार की देहली पर मार रहा हूँ !ऐसा कह श्री हरि नृसिंहजी सिंह की सी तेज गर्जना करते हुए... अपने नुकीले लंबे लंबे नाखूनों से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ देते हैं.और हिरण्यकश्यप का वध कर पाप का अंत कर देते हैं !भगवान नृसिंह जी हिरण्यकश्यप के शव को दूर फेंक खड़े हो...

जोर जोर से सिंह के समान गर्जना करने लगते हैं !यह दृश्य देख प्रह्लाद के आँखों से अश्रु धाराएं बहने लगती हैं और वे अपने हाथो में श्रीनृसिंहजी के लिए फूलो की माला लिए श्री हरि विष्णु का ध्यान करने लगते हैं.!
वहां पर उपस्थि समस्त असुर, दैत्य सैनिक अदि नतमस्तक हो भगवान नृसिंहजी से हाथ जोड़ क्षमा प्रार्थना करने लगते हैं ! तत्पश्चात उस सभा में भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा , इन्द्र आदि देवतागण प्रकट हो, भगवान श्री नृसिंह देवजी की करबद्ध स्तुति करने लगे ! भगवान श्री नृसिंहजी का रौद्र रूप किसी प्रकार से शांत होता न देख.तत्क्षण श्री प्रह्लाद अपने अश्रु पूर्ण नेत्रो के साथ अपने आराध्य देव श्री नृसिंहजी की स्तुति व प्रार्थना करते हैं ! श्री प्रह्लाद हाथ जोड़ इस प्रकार श्री हरि नृसिंहदेवजी की स्तुति करते है |
नृसिंह रूप हरे... प्रभु नृसिंह रूप हरे शांत शांत जग्वर, कृपा करो परमेश्वर...
श्री प्रह्लाद को श्री हरि नृसिंह नारायण अपनी गोद में बैठा लेते हैं, और श्री हरि नृसिंहजी अपने हाथो से, श्री प्रह्लाद के बालो को संवारते हैं... और अपनी जीभ से उनको चाटने लगते हैं...
ऐसे श्री नृसिंह भगवान की सदा ही जय हो।

Narasimha Kavacha Stotra | Abhisheka 29/03/2021

नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।। 🔱

Narasimha Kavacha Stotra | Abhisheka This Narasimha Kavacha Stotra is recited by Sri Prahlada Maharaja. It is most pious, vanquishes all kinds of impediments, and provides one all protection. ...

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