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15/03/2020
15/02/2020

श्रीमद्भगवद्गीता क्रम.. गहरी अनुभूति के लिए सुझाव 15

तभी तो शुरू हो सकेगी आपकी यात्रा, अपनेआप को साक्षात साकार करने की, नहीं तो अपने बारे में अपनी मनघडंत छवि को ही सही मान कर, कि मैं तो यह हूँ, साकार करने की कोशिश में लगे दुःखों, पीड़ाओं और अनावश्यक विरोधों से छटपटाते हुए, कहीं ना पहुँचने वाला चिन्तन करते रहते हैं कि भूल कहाँ लग रही है ? अपनी मनघडंत छवि से भ्रमित अपना ही और नुकसान करते रहते है।
अपने बारे में इसी मनघडंत अवधारणा को श्रीमद्भगवद्गीता १८.५९ में भगवान अहंकार कहते है । अहम् + कार अर्थात् मैं ये करने वाला हूँ, परन्तु आप जो हो ही नहीं वो साकार कैसे करोगे? जो हो वह साकार होगा ही और ‘ आपके बस में भी वही साकार करना है ‘२.४७|
जब अपने बारे में कोईभ्रमित होता है तभी दुःखों, पीड़ाओं और विरोधों का सामना करता है | श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान यही स्पष्ट करते है और रणभूमि में लड़ाई के ऐन मौके पर, इसी भ्रमित स्थिति के कारण मन गिराए अर्जुन को, इसी में से निकाल कर उसे उसके स्व भाव में पुनः स्थापित कर देते है |

क्रमशः

नमन - परम - श्रद्धेय गुरुदेव तत्वदर्शी
गुरुसखा डॉ. श्री खुशदीप बंसल

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