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दिल लगा लिया मैंने तुमसे प्यार कर के - Rashtriya Khabar 25/12/2022

दिल लगा लिया मैंने तुमसे प्यार कर के - Rashtriya Khabar दिल लगा कर क्या मिला, यह बड़ा सवाल है। तवांग से प्रारंभ करता हूं। पंडित नेहरू के हिंदी चीनी भाई भाई

16/09/2022

मधुमेह की आर्युवैदिक दवा का पेटेंट कराया

1. मुरादाबाद के प्रोफसर दंपती का शोध सफल
2. चूहों पर किया गया परीक्षण सफल साबित
3. अनुमति के बाद होगा क्लीनिकल ट्रायल
4. पास हुआ तो बदल जाएगी ईलाज पद्धति
राष्ट्रीय खबर
रांचीः निरंतर शोध के बाद एक प्रोफसर दंपती ने मधुमेह का स्थायी उपचार करने वाली दवा खोज लेने का दावा किया है। प्रारंभिक शोध के आधार पर ही उन्होंने इस दवा का पेटेंट कराया है। मुरादाबाद के इस दंपती की कहना है कि यह मधुमेह की आयुर्वैदिक दवा है और चूहों पर इसका प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है।
वहां के आइएफटीएम विवि ने इसका पेटेंट कराया है और पेटेंट के बाद दवा बनाने के लिए कंपनी से अनुबंध करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद ही इसका इंसानों पर परीक्षण का दौर प्रारंभ होगा, जिसे ह्युमैन क्लीनिकल ट्रायल कहा जाता है। काफी अधिक संख्या में मरीजों पर इसके उपयोग और उसके प्रभाव को देख समझ लेने के बाद ही वैज्ञानिक प्रक्रिया में किसी दवा के प्रयोग की मंजूरी दी जाती है। इसके पहले क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया जाता है और यह देखा जाता है कि इस दवा का कोई साइड एफेक्ट तो नहीं है। इस परीक्षा में पास होने के बाद ही इसे मरीजों के लिए उपलब्ध कराने की अनुमति मिलती है और दवा व्यापारिक तौर पर बाजार में उपलब्ध हो पाती है। प्रोफसर दंपती ने औषधीय गुणों वाले पौधे पत्थरचट्टा का उपयोग डायबिटीज नियंत्रण में पहली बार करने की बात कही है। प्रोफेसर डॉ अभिषेक तिवारी व वर्षा तिवारी को शोध के दौरान पता लगा कि इसमें मधुमेह को नियंत्रित करने का भी गुण है। वैसे हम सभी ने प्रचलित ग्रामीण परिवेश में इस पत्थरचट्टा का नाम सुन रखा है। इस पौधे की पत्तियों का आयुर्वेदिक उपयोग अभी तक पथरी सहित कई रोगों के इलाज में होता रहा है। अब यह मधुमेह जैसे बीमारियों में भी कारगर होगा। आइएफटीएम विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग के प्रोफेसर दंपती ने पत्थरचट्टा व जिंक सल्फेट से मधुमेह (डायबिटीज) को नियंत्रित करने की दवा खोज निकाली है। शोध में बनाई गई दवा का चूहों पर उपयोग सफल होने पर पेटेंट करा दिया गया है। इसके बाद पत्थर चटा पौधे व जिंक सल्फेट का मिक्चर तैयार करके चूहो पर उपयोग किया गया। शोध जून 2022 में पूरा हुआ। पांच जुलाई को पेटेंट हो गया है। डा.अभिषेक तिवारी बताते हैं कि इस शोध पर करीब तीन लाख रुपये खर्च हुए हैं। चूहों पर शोध के लिए सबसे पहले उन्हें मधुमेह का रोगी बनाया गया। इसके लिए इंसुलिन को खत्म करने के लिए स्ट्रेप्टो जोटोसिन को चूहों में इंजेक्ट किया गया। इससे चूहों में बीटा सेल कमजोर पड़े तो चूहों में इंसुलिन बनना बंद हो गयी। इसके बाद पत्थर चट्टा के पौधे के पत्ते को सुखाया गया। इन्हें पीसने के बाद जिंक सल्फेट मिलाकर चूहों के मुंह में कैनुला लगाकर दिया गया।
जिससे बीटा सेल विकसित होने से इंसुलिन बनना शुरू हो गई और चूहों में मधुमेह रोग नियंत्रित पाया गया। शोध में 21 दिन का समय लगा। शोध के दौरान समय-समय पर चूहों का वजन भी किया गया। मधुमेह नियंत्रित होने पर चूहों का वजन सामान्य हो गया। आयुर्वेद प्रणाली की इस दवा से कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं। शोध पूरा करने के बाद वैज्ञानिक स्वीकृति के लिए इससे दस्तावेज तैयार किए गए। फिर शोध भारत सरकार के पेटेंट आफिस यानि भारतीय पेटेंट विभाग नई दिल्ली भेजा गया। यहां से पेटेंट प्रकाशित हुआ।
इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में इस बीमारी से पीड़ित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वर्ष 2019 में हुई मौतों में से मधुमेह से होने वाली मौतों का नंबर नौंवा था। इसी वजह से इसकी रोकथाम के लिए एलोपैथिक दवाइयों का बाजार भी बहुत बड़ा हो गया है। अगर ऐसी आयुर्वैदिक दवा क्लीनिकल ट्रायल में पास हो जाती है तो चिकित्सा जगत में इस मधुमेह की बीमारी के ईलाज की पूरी पद्धति ही बदल जाने की उम्मीद है।

28/08/2022

बिना प्राकृतिक पद्धति के ही फिर से भ्रूण पैदा करने में सफलता मिली

1. इस भूण में दिमाग और धड़क रहा दिल भी है
2. तीन स्टेम सेलों की मदद से हुआ काम
3. जेनेटिक विज्ञान की तरक्की का नया काम
4. भविष्य में इंसानी अंग भी ऐसे तैयार हो सकेंगे
राष्ट्रीय खबर
रांचीः चूहों पर निरंतर जारी प्रयोग में एक और कामयाबी मिली है। इस बार इस कामयाबी का सेहरा यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के शोध दल के सर पर बंधा है। इस दल ने भी निरंतर कोशिशों के बाद अंततः प्रयोगशाला में एक चूहे का भ्रूण पैदा किया है, जिसे बनाने के लिए किसी भी प्राकृतिक पद्धति का सहारा नहीं लिया गया था।
यानी इसके विकसित होने में नर और मादा के संपर्क अथवा किसी किस्म गर्भ का उपयोग नहीं किया गया है। यह पूरी तरह कृत्रिम है और सब कुछ कृत्रिम तरीके से प्रयोगशाला में ही तैयार किया गया है। इस प्रयोग से अब चूहे का जो भ्रूण पैदा हुआ है, उसमें दिमाग और एक दिल भी है। इस दिल को धड़कता हुआ भी वैज्ञानिक देख रहे हैं। इस शोध दल का नेतृत्व प्रोफसर मैगडालेना जेरनिका गोइट्ज ने किया है। अब तक यह भ्रूण पूरी तरह सही ढंग से विकसित हो रहा है और अगर उसे यूं ही विकसित किया गया तो वह अपने किस्म का पहला जीवित प्राणी होगा, जिसके पैदा होने में किसी माता पिता की भूमिका नहीं होगी।
इस काम को अंजाम देने के लिए वैज्ञानिकों ने स्टेम सेलों का ही सहारा लिया। जेनेटिक विज्ञान के विकसित होने की वजह से यह काम दिनोंदिन आसान होता चला जा रहा है। इस प्रयोग के सफल होने की वजह से फिर से यह दावा मजबूत हुआ है कि शरीर के किसी भी अंग को इस पद्धति से तैयार किया जा सकता है। दरअसल सारे वैज्ञानिक इंसानी अंगों को प्रयोगशाला में उगाने के बाद उन्हें किसी बीमार के शरीर में प्रत्यारोपित करने की योजना पर ही काम कर रहे हैं। इसके पीछे की सोच यह है कि इस प्रयोग के सफल होने पर दुनिया के अरबों लोगों को फायदा होगा, जो किसी न किसी अंग के खराब होने की वजह से परेशान है। इसमें स्टेम सेल की सबसे प्रमुख भूमिका है, जिसे अब किसी भी शरीर का आधार माना जाने लगा है। इसके विकसित होने के कारण ही धीरे धीरे पूरा शरीर विकसित होता है।
जेनेटिक एडिटिंग का सहारा लेते हुए शोध दल ने तीन किस्म के स्टेम सेलों से यह काम प्रारंभ किया था। इस दल ने पहले इन स्टेम सेलों को आपस में संपर्क स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ाया। इनके बीच संवाद स्थापित होने के बाद इन्होंने आपसी सहयोग से कई जीन पैदा किये और विकास की प्रक्रिया को और विस्तार दिया। इनके विकास के लिए प्रयोगशाला में सारा माहौल बिल्कुल वैसा ही रखा गया था, जैसा प्राकृतिक तौर पर होता है। धीरे धीरे इस भ्रूण के दिल और दिमाग को विकसित होते हुए भी देखा गया। इस आधार पर शोधदल इस नतीजे पर पहुंचा है कि तीन किस्म के स्टेम सेल ही आपस में संवाद स्थापित कर लेने के बाद आपस में रासायनिक और विद्युतीय संकेतों का आदान प्रदान कर आगे का काम पूरा करते हैं। लिहाजा इस पद्धति को और अधिक विकसित किये जाने की तमाम बारिकियों को समझ लेने के बाद किसी खास अंग को भी प्रयोगशाला में तैयार कर पाना संभव होगा। अभी यह परीक्षण चूहों पर चल रहा है। यह तकनीक पूरी तरह विकसित और सुरक्षित साबित होने के बाद जाहिर तौर पर इंसानी स्टेम सेलों की मदद से इंसानी भ्रूण के जरिए अंग उगाने की तकनीक पर काम होगा।

13/07/2022

श्रीलंका के राष्ट्रपति आवास की अलमारी में था सुरंग का दरवाजा

कोलंबोः श्रीलंका के राष्ट्रपति आवास के तमाम गोपनीय तथ्य अब सार्वजनिक होने लगे हैं। वहां से मिले लाखों रुपयों की गिनती भी हो चुकी है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति आवास यानी टेंपल ट्री में आंदोलनकारियों ने भोजन भी पकाया है। पूरे राष्ट्रपति भवन की जांच करने के क्रम में लोगों ने पाया है कि एक कमरे में बनी आलमारी के अंदर ही गुप्त सुरंग का रास्ता था। बाहर से देखने पर यह अलमारी का पल्ला ही दिखता है। जब इसे खोला गया तो लोगों ने देखा कि वहां से सीढ़ियां नीचे गयी है। इस सीढ़ी से नीचे उतरने वालों ने नीचे एक लोहा का दरवाजा पाया था, जो बंद था। समझा जाता है कि इसी लोहे के दरवाजे के पीछे वह गुप्त सुरंग है, जिससे राष्ट्रपति चुपके से भाग निकले हैं। इस बीच श्रीलंका के स्पीकर ने अपना बयान बदलते हुए कहा है कि राष्ट्रपति अब भी देश में ही है। पूर्व में उन्होंने राष्ट्रपति के देश से चले जाने का बयान दिया था। वैसे राष्ट्रपति गोतावाया राजपक्षे के बारे में अनुमान लगाया जा रहा है कि वह नौसेना के जहाज पर हैं। राष्ट्रपति भवन से जो रुपये मिले थे, उनकी गिनती हो चुकी है। वहां से करीब एक करोड़ 78 लाख 50 हजार रुपये पाय गये हैं। पुलिस ने इसे अदालत में जमा करा दिया है। इस राष्ट्रपति भवन में पुलिस के विरोध को नजरअंदाज कर प्रवेश करने वाले आंदोलनकारियों ने वहां के बगीचे में भोजन भी पकाया है। इसके पहले स्वीमिंग पुल के भीतर भी लोगों को देखा गया था। लोगों ने कहा था कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का इस्तीफा होने तक वे यहां पर बने रहेंगे। दोनों का इस्तीफा होने के बाद लोग यहां से चले जाएंगे। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ने इस्तीफा देने का एलान कर रखा है। समझा जाता है कि आगामी 13 जुलाई को वे पदत्याग करेंगे। इस बीच सभी राजनीतिक दल आपस में मिलकर एक काम चलाऊ सरकार के गठन के मुद्दे पर बात कर रहे हैं। इधर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार ही नहीं होने की वजह से वह कुछ भी आयात नहीं कर पा रहे हैं। इससे देश में हर जरूरी सामान की जबर्दस्त किल्लत हो गयी है।

13/07/2022

जेनेटिक संशोधित विधि से गेहूं का उत्पादन होगा दोगुणा

1. भारत जैसे देश के किसानों को होगा लाभ
2. गरीब दुनिया को सस्ते दर पर भोजन मिलेगा
3. किसानों को बहुआयामी फायदा होगा इस विधि से
राष्ट्रीय खबर
रांचीः दुनिया में रोटी की समस्या को दूर करने में भी जेनेटिक विज्ञान एक कारगर हथियार बनकर उभरा है। इसके जरिए पहले भी कई किस्म के बदलाव और सुधार किये गये हैं। अब कृषि वैज्ञानिक मान रहे हैं कि गेंहू की फसल में भी अगर जेनेटिक संशोधन कर दिया जाए तो उसकी उपज अभी के मुकाबले दोगुणी हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया में जहां कहीं भी भूखमरी है, वहां के लोगों को बेहतर तरीके से दो वक्त का भोजन तो मिल पायेगा। जेनेटिक्स से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके लिए गेहूं की जिनोम श्रृंखला में आवश्यक सुधार करने होंगे। भारत जैसे कई देशों में अब गेहूं का उत्पादन किसानों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। अनेक स्तरों पर प्रयास तथा सिंचाई एवं उर्वरक के अधिक इस्तेमाल की वजह से भी खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो गयी है। इस वजह से किसानों को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इन तमाम विषयों को जानने वाले कृषि वैज्ञानिक इसी सोच की वजह से अब गेंहू की जिनोम श्रृंखला में सुधार कर उसकी उपज बढ़ाने की सोच पर काम कर रहे हैं। यह भी समझा गया है कि अगर गेंहू की उपज को दोगुणा किया जा सका तो किसानों को इससे बहुआयामी लाभ होगा। इससे वे कम इलाके में इसकी खेती करेंगे तो बाकी खेतों को लगातार हो रहे दोहन से उबरने का मौका मिल जाएगा। दूसरी तरफ कम जमीन पर अधिक अनाज उगाने की लागत कम होने से किसानों की आर्थिक आमदनी भी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ पूरी दुनिया में जब इसका उत्पादन बहुत अधिक हो जाएगा तो गरीबों को भी यह सस्ते दर पर मिल पायेगा क्योंकि मांग और आपूर्ति की कमी बहुत कम रह जाएगी। यह जान लें कि किसी भी सामान की कीमत तभी बढ़ती है जब उसकी मांग अधिक हो और आपूर्ति कम हो। इसके अलावा सिंचाई के लिए कम पानी और कम उर्वरक की जरूरत से भी उत्पादन लागत कम हो जाएगी।
सिर्फ भारत की बात करें तो वर्ष 2021-22 में गेंहू का उत्पादन का लक्ष्य 106.41 मिलियन टन तय किया गया था। वास्तव में यह उत्पादन 3.8 मिलियन टन कम हो पाया। इसके कई कारण भी थे, जिनमें पानी की कमी एक बड़ी वजह थी। अब अगर ऐसी फसल तैयार हो जो कम पानी में भी अधिक उत्पादन दे सकें तो देश के साथ साथ पूरी दुनिया में गेंहू उत्पादन की पूरी तस्वीर ही बदल जाएगी। शोध वैज्ञानिक गेंहू के जिनोम में आवश्यक संशोधन करने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सैद्धांतिक तौर पर जो बातें सही लगी है, वे परीक्षण मे भी सही प्रमाणित होगी। यानी तकनीकी जांच में इस विधि को पारित कर दिये जाने के बाद शीघ्र ही पूरी दुनिया में इस विधि से गेंहू का उत्पादन होने लगेगा। अब समझा जा सकता है कि अगर एक मौसम में भारत में गेहूं का उत्पादन दो सौ मिलियन टन से ऊपर पहुंच जाए और कम जमीन पर इसकी खेती हो तो इसके कितने लाभ होंगे। किसानों को भी खाली जमीन पर दूसरा अनाज अथवा सब्जी उगान का अवसर मिलेगा। सब्जी की खेती से भी किसानो को त्वरित लाभ भी होता है। इससे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी आमूलचूल परिवर्तन होगा।

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