Sukant Ranjan
12/05/2024
मातृ दिवस की सबको शुभकामनाएं। एक पुरानी कविता फिर से साझा कर रहा हूँ। 🙏
याद नहीं वे पल मुझे...
आज जब मैं पिता बन चुका हूँ... आज जब मेरे जिगर का टुकड़ा मेरे हाथों में है... आज जब मैं देख पा रहा हूँ कि मेरे बेटे का जीवन उसकी माँ से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है, एक कल्पना मेरे मन को अनायास ही घेरने लगी है कि कभी मैं भी तो अपनी माँ के इतना ही करीब था कि उनके होने पर ही मेरा भी होना था...
वे पल तो कोई याद नहीं कर सकता, मगर माता या पिता बनने के बाद एहसास कर सकता है...
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जब तन तेरा मेरा डेरा था,
मन तेरा मेरा घेरा था,
उर में तेरे था मैं ही समाया,
माँ, जब मैं पूरा का पूरा तेरा था।
तेरी साँसे मेरी हो चली थी,
मेरी किलकारी तेरी धड़कन बनी थी।
मेरी रातें बनी थी तेरी रातें,
मेरा सवेरा तेरा सवेरा बना था।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जो तेरे लहू से मेरा लहू बना था,
तेरे तन से था मेरा भोजन,
तेरी गोद में मुझको जो नींद पड़ा था,
मेरा पूरा होना जब तुझसे ही जुड़ा था।
मैं कमजोर सा तेरी गोद में पड़ा था,
तेरी आँचल की छाँव में पला था,
मेरी आँखों में तब चमक तो होगी माँ,
तेरे चेहरे का जब तस्वीर बना था।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जो मेरी एक छींक पर जब तू दौड़े आती,
घर सर पर उठाती, तू इतना घबराती,
मेरे तन को लगे जो, तू वही थी खाती।
तेरी अपनी पसंद, तेरा अपना स्वाद,
बस मेरे वास्ते, तूने सब थी भूला दी।
मेरी छीछी-सुसु पे तेरा कहना,
आराम से कर ले, तुझे जितना करना।
तू अपनी माँ के पास है,
कैसी शर्म और कैसा डरना।
उठकर मैंने बैठना सीखा,
चलना सीखा, दौड़ना सीखा,
हाथ-पाँव फेंक-फेंक कर,
खेलना-कूदना सीखा।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
मेरे कोमल जीवन को,
जब तेरा सहारा मिला था।
तिनका सा बहा था,
तेरा किनारा मिला था।
जीवन दिया, जीवंतता दी,
जिगर दिया, जीवटता दी,
जीवन का हर सुर, हर ताल मिला,
मुझे तेरा पूरा संसार मिला।
तेरा पूरा-पूरा प्यार मिला।
माँ, मैं तेरा टुकड़ा, मैं तेरा प्राण,
मेरे रोम-रोम को तूने लाड़ा था,
मेरे रूप में, माँ तूने ही तो
एक नया जीवन धारा था।
मैं जो भी लिखूँ तेरे बारे में माँ,
मेरा लिखा तो सब तेरा है।
गर, तूने मुझे लिखा न होता,
इस दुनिया में कहाँ कुछ मेरा होता।
पर, धीरे-धीरे मैं तुझसे कुछ अलग होने लगता हूँ...
धीरे-धीरे मुझमें पूरा परिवार समाता है,
धीरे-धीरे मुझमें समाज भी आता-जाता है,
धीरे-धीरे समय मेरा दरवाजा खटखटाता है,
और, धीरे-धीरे तेरा साया सरकते जाता है।
धीरे-धीरे मुझे भी दुनिया की चाहत सताती है,
धीरे-धीरे मेरे अंदर वो अपना घर बनाती है।
धीरे-धीरे माँ तू पीछे हटते जाती है,
तू माँ है, तू तनिक भी न मुझपर जोर चलाती है।
धीरे-धीरे मैं तुझसे अलग कुछ और बनता जाता हूँ
तेरा ही तो टुकड़ा था, ये बिसराते जाता हूँ।
भूली तो तू कुछ न होगी, याद तुझे सब आता होगा,
मुझको ख़ुद से अलग देखना तुझे बड़ा तड़पाता होगा।
आज मुझमें तेरा जो बचा है,
उसे बचाना है माँ मुझको।
तेरी कोमलता, वो तेरा प्रेम,
उस गहन भाव में डूब जाना है मुझको।
मैं भी तुझसा कुछ जी पाऊँ,
उस प्रेम में पूरा हो जाऊँ,
त्याग मेरा धर्म बनें,
यज्ञ सा जीवन बनें।
हे प्रभु! तेरा जगत ये सुंदर कहाया है,
जो माँ-सा तन और माँ-सा हृदय-मन तूने बनाया है।
तृष्णा (तृ) जहाँ तिरोहित (मा) हो जाती है,
वो पूर्ण कृति मातृ कहलाती है।
शब्दार्थ:
बिसरना: भूलना। तिरोहित: ओझल हो जाना।
माँ ।Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Emotional poem। मां के लिए कविता माँ ।Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Emotional poem। मां के लिए कविताLatest PoemLatest Poem in HindiPoem in Hindi 2023 poem #मां के लिए क...
14/04/2024
बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती (अर्थात आज) की पूर्व संध्या पर मुझे पश्चिमांचल हिंदी प्रचार समिति की ओर से अपना वक्तव्य रखने का अवसर मिला। ये वक्तव्य लिखित था जो आप सबके साथ साझा करता हूँ। जरूर पढ़ें। कुछ आवश्यक विचार-बिंदु संविष्ट हैं।
माननीय मुख्य अतिथि वीर नर्मद विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ रमेश कोठारी जी, पश्चिमांचल हिंदी प्रचार समिति अध्यक्ष डॉ माणिक मृगेश जी, मंच संचालिका तथा समिति उपाध्यक्षा डॉ मीरा सक्सेना जी एवं सभी गणमान्य साहित्य जनों को मेरा प्रणाम।
बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर मैं जो अपना वक्तव्य रखने जा रहा हूँ, इसका उद्देश्य वही है जो मैं मानता हूँ कि बाबासाहेब के जीवन का भी एक प्रमुख उद्देश्य था- हिन्दू समाज को जातिगत असमानता से मुक्त कराना।
बात जब भी आती है असमानता की, तो हम कई आधारों पर असमानता की बात करते हैं। जाति, पंथ, नस्ल, रंग, लिंग आदि। इन आधारों पर भेदभाव को सामान्यतः हम नकारते हैं, विशेषकर तब जब इन आधारों पर कमजोरों के शोषण की व्यवस्थाएं बनाई जाती है। ऐसे समाज में कोई न कोई वर्ग या समूह अक्सर कमजोर होता ही है। ये बड़ा ही स्वाभाविक है। अतः ये मैं बहुत स्पष्ट कर दूँ कि समस्या किसी का कमजोर होना नहीं है। समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब कोई ऐसी सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक व्यवस्था बन जाती है जो कमजोरों को उन साधनों से वंचित करने लगता है जो उन्हें पुनः सशक्त बना सकता है। कमजोरों को सशक्तिकरण के साधनों से वंचित करने वाली ऐसी शोषण की व्यवस्थायें ही वास्तविक समस्या है। ऐसी व्यवस्थाएं शोषक वर्ग को थोड़े समय के लिए तो अच्छी लगती हैं, परंतु पूरे समाज अथवा संस्कृति अथवा राष्ट्र पर ये कभी न कभी बहुत भारी पड़ती हैं।
भारत में जाति के नाम पर ऐसी व्यवस्था सदियों तक चलायी गई और आज भी सामाजिक स्तर पर इसका प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है। जाति के नाम पर हमने ये खेल खेला कि अपने ही लोगों को शिक्षा जैसे सशक्तिकरण के सबसे बड़े साधन से सदियों तक वंचित रखा। उनके पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए उन्हें उचित अवसर न दिया। शोषक वर्ग को ये उनके लिए उचित लगा और आज भी ये मानसिकता जिंदा है। परंतु, उसका ये घोर परिणाम हुआ कि हमने राष्ट्र के रूप में, एक सभ्यता के रूप में अपनी स्वतंत्रता ही गँवा दी और फिर हमने भारत के इतिहास के सबसे काले दिन देखे, भयंकर त्रासदी देखी। मुगलों, अंग्रेजों एवं अन्य आक्रमणकारियों के हाथों हमने अपना लगभग सबकुछ ही गँवा दिया। मुगलों ने तो सीधे-सीधे हमें सांस्कृतिक आघात पहुँचाया। पर, अंग्रेजों ने तो हमारे साथ वही खेल खेला जो हम अपने लोगों के साथ खेल रहे थे। उन्होंने हमारे पूरे समाज को ही, जिसमें पूर्व शोषक-वर्ग भी शामिल था, शिक्षा एवं उचित अवसर से वंचित कर दिया और पूरे भारतीय समाज को ही इस धरा का सबसे पिछड़ा समाज बना दिया। इंडियन होने का अर्थ ही पूरी दुनिया में पिछड़ा होना हो गया। इसमें वो तथाकथित बड़ी जातियाँ भी थी। या कहे कि बड़ी जातियों का ही ये विशेष रूप से उपहास था। आपस में ही खुद को अगड़ा और अपने ही किसी दूसरे को पिछड़ा बताते-बताते खुद ही पूरी दुनिया में हम पिछड़ गए। ये कोई समझदारी नहीं हुई। अतः हमें ये ध्यान रखना होगा यदि परिवार के अन्दर ही कोई शोषण की व्यवस्था हम बनायेंगे तो इसका परिणाम यही होगा कि पूरा परिवार ही कमजोर हो जायेगा और फिर हम स्वयं किसी और के शोषण के लिए उपलब्ध रहेंगे। यही भारत के साथ हुआ और ये आगे भी हो सकता है।
अंत में मैं चिंतन के लिए एक विषय छोड़ जाता हूँ क्योंकि समय की सीमा है। शोषण की व्यवस्था का आधार है- भेदबुद्धि, अनावश्यक असमानता का भाव। और, भेदबुद्धि का कारण है अहंकार। अहंकार का अर्थ है - मैं; मैं का भाव। ये मैं ही है जो किसी भी तुच्छ आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की जुगत में लगा रहता है। जाति, पंथ, नस्ल, रंग, लिंग आदि श्रेष्ठता का आधार नहीं है। यहाँ तक कि स्वार्थ के पराभूत होकर किये गए तुच्छ कर्मों के आधार पर भी श्रेष्ठता का उन्माद भरना गलत है। श्रेष्ठता का एक ही आधार है- वो है त्याग; वो भी छोटा-मोटा त्याग नहीं; अहंकार का त्याग।
27/09/2023
जीवन तब तक द्वंद्वों से भरा होता है जब तक हम कमजोर होते हैं। इस गहरे-भाव वाले कविता को पढ़िये या सुनिये और अपना राय दीजिये। 🙏
शीर्षक: जुनून...
जीने की ज़िद्द क्यों है हमें?
जब जी लेने का जुनून नहीं।
सालों की खबर क्यों रखते हैं हम,
जब इस पल को पी लेने का जुनून नहीं।
हिसाब के बड़े पक्के हैं हम,
हर पल की मौत का खूब हिसाब लगाते हैं,
जब कभी जिंदगी का हिसाब लगाते हैं,
तो हिसाबन ख़ुद को कच्चा ही पाते हैं।
सबने कहा कि जिंदगी एक जंग है
तो, इस जंग में ख़ुद को खूब लड़ाते हैं,
कतरा-कतरा लहू लगाते हैं,
और जिंदगी को ही घायल पाते हैं।
बड़े देर से समझ आया कि...
गलत रास्ते पर हम चले जा रहे थे,
गलत समर में लहू दिए जा रहे थे,
डरते थे हम जिंदगी से शायद,
इसलिए, मौत की घूँट खुशी से पिये जा रहें थे।
जीवन तो एक कलरव है,
हमने कोलाहल बना रखा है।
अमृत का अर्णव मिला हमें पर,
बोतलों में हलाहल सजा रखा है।
जीने वाले तो जी गये ऐसे...
जो मर कर भी जैसे
हजार बार जी उठे।
जो एक शरीर छूटा उनका,
वे हजार दिलों में खिल उठे।
क्योंकि,
उन्हें जीने की जिद्द नहीं थी,
जी लेने का जुनून था।
सालों की खबर नहीं थी उन्हें,
बस, इस पल को पी लेने का जुनून था।
जुनून...।Sukant Poetry।Hindi Kavita।Bhagat Singh Jayanti। Motivational Poem। जुनून...।Sukant Poetry।Hindi Kavita।Bhagat Singh Jayanti। Motivational Poem।Hindi poem Motivational hindi poemMotivational poem in hindiBest motivational poe...
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