Dr Rajeev Singh

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07/10/2025

युद्ध की जीत सैनिकों की संख्या पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि वह तो उनके हौसले एवं दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। जो सच्चे उसूलों के लिए लड़ता है, वह धर्म योद्धा होता है तथा ईश्वर उसे हमेशा विजयी बनाता है। अत: उनके बारे में यह कहा जा सकता हैं कि गुरु गोविंद सिंह जी जैसा महान पिता कोई नहीं, जिन्होंने खुद अपने बेटों को शस्त्र दिए और कहा, 'जाओ मैदान में दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पिओ। जब आप अपने अन्दर से अहंकार मिटा देंगे, तभी आपको वास्तविक शांति प्राप्त होगी;
पुण्यतिथि पर सादर नमन।

सड़कों के हाल पर क्या बोले डॉ राजीव सिंह रायबरेली के विनाश का जिम्मेदार कौन ? | The Sach India | 07/10/2025

समिधा

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं।

आइये राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

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02/10/2025

विजयादशमी पर्व की शुभकामनाएं

यह सब उसके सामने है, उसके अंदर है,
जहाँ अब प्रेम और प्रतिष्ठा के बीच

संशय और निष्ठा के बीच
एक टूटता हुआ पुरुष है।

वही जानता है।
उसके भीतर कितना अवसाद है :

आग और रक्त के निर्णय को ठुकराता
अंतर के शून्य को गुंजाता

वही दुर्दम भय—लोकापवाद है।
क्यों वह भूल गया है,

कि वह, जो उसके इस नाटक की
विडंबना झेलती रही है

वही, छाया की तरह,
उसके साथ-सारे दुखों को झेलती रही है

दुख ही आमुख
दुख ही उसके जीवन का उपसंहार है

लंका हो या अवध
उसके लिए एक-सा कारागार है।

वर्ष-दर-वर्ष, अपने प्रतिशोध की तृप्ति के लिए
वह टालता आया है हर्ष

वह जो बनना चाहता है युग का आदर्श :
अंदर से एक साधारण आदमी निकल आया है

उसे महसूस होता है,
इतनी कीमत चुका कर

उसने जिस सत्य को पाया है,
वह सत्य नहीं, महज़ उसकी छाया है।

लेकिन अब उसे मालूम है,
यह यात्रा के अंत की शुरुआत है

नवरात्र ईश्वर की स्त्री प्रकृति को समर्पित है। भिन्न-भिन्न स्थानों पर यह विभिन्न देवियों को समर्पित है लेकिन यह पर्व मुख्य रूप से देवी या देवत्व के स्त्रैण रूप को ही समर्पित है। भारतीय संस्कृति ने सदा नारी को जीवन के सबसे शक्तिशाली आयाम के रूप में प्रस्तुत किया है। पौरुष तब तक शव है जब तक कि उसे स्त्री से शक्ति नहीं मिलती। शक्ति का अर्थ है ऊर्जा और यही ऊर्जा ब्रह्माण्ड से कार्य कराती है और इस ऊर्जा को हमेशा स्त्रैण रूप में पहचाना गया है। जब हम स्त्रैण की बात करते हैं तो इसका महिला होने से सम्बन्ध नहीं है। स्त्रैण होना शरीर नहीं उससे अधिक है।
आज समाज ने स्त्रैण प्रकृति को कमजोरी समझ लिया है। इसलिए स्त्रियां पुरुषों की तरह होने की कोशिश कर रही हैं। हर चीज आज जंगलराज की तरह हो गयी है इसमें ताकतवर ही जिन्दा रह पता है। जब ऐसा होता है तो पुरुषत्व हावी ही रहेगा। हमने प्रेम, करुणा, और कोमल गुणों के बजाय जितने की ताकत को ही चुन लिया है। आप देखेंगे कि यदि आपके पास सिर्फ पुरुषत्व है तो आपके पास हर वस्तु होते हुए भी कुछ नहीं होगा। पौरुष के स्त्रैण प्रकृति से अधिक महत्वपूर्ण होने का कारण यह है हमारा पूरा ध्यान जीवन संरक्षण पर रहा है। जीवन संरक्षण के प्रति अपना ध्यान थोड़ा करने से स्तन स्वाभाविक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हो जायेगा। अगर स्त्रैण को बेहतर अभिव्यक्ति मिलती है तो लोग थोड़ा ज्यादा मुस्कुरायेंगे, अधिक प्रसन्न रहेंगे और अधिक प्रेमपूर्ण होने। जीवन अधिक सुन्दर होगा जो हम वास्तव में चाहते है।
एक समज में नवरात्र के माध्यम से देवत्व की स्त्रैण रूप का उत्सव मनाना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा नहीं होता तो दुनिया में स्त्रैण भावों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। अगर स्त्रैण खो जाता है जो जीवन में हर वह चीज जो सुन्दर, कोमल प्रतिस्पर्धा-रहित और पोषण देने वाली है वह लुप्त हो जाएँगी। इस नवरात्रि के विजयादशमी पर्व पर स्त्रैण के उत्सव को पूरी भागीदारी, आनंद और प्रेम से मनाएं। केवल तभी आप जीवन की सुंदरता को जाएं सकते हैं।

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