Vachak Mitra
26/05/2016
Vachak mitra update...
19/05/2016
किताबें..... प्रफुल्ल शिलेदार
किताबें
मुझे ढूंढती चली आती है
भीतर से आस रहती हैं उन्हें
मुझसे मिलने की
पुराने दोस्त की तरह
मुझे ढूँढने की
बहुत कोशिश करती रहती है
किसी पल आखिरकर मेरा पता पाकर
सामने आकर खड़ी होकर
इत्मीनान से ताकती रहती है
मैं उन्हें कब पढूंगा
इसकी राह देखती है
उन्हें पढ़े जाने की
कोई जल्दी नहीं होती
कभी –कभार मैं
हैरानी से
उनकी ओर देखता हूँ
बस यही काफी होता है उनके लिए
हाथ में लेता हूँ
तो दिल धड़कने लगता है किताबों का
आँखों में चमक सी छा जाती है
पढ़ने लगता हूँ तो
सांसे थाम लेती हैं
मेरी एकाग्रता
भंग होने नहीं देती
आधा पढ़कर रख देता हूँ
फिर भी मायूस न होकर
मैं उन्हें फिर से कब उठा लूँगा
इसकी राह देखती है
पूरी पढ़े जाने के बाद
किताबें थक जाती हैं
भीतर ही भीतर सिमटकर
सोचती रहती हैं
मुझ पर
क्या असर हुआ होगा
प्रस्तुति :> अशोक शर्मा " भारती "
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