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26/05/2023

राजदंड #सेंगोल

हर किसी को जो सवाल पूछना चाहिए वह है,

1947 से इसे क्यों छुपाया गया?

बाद में परंपरा का पालन क्यों नहीं किया जाता है?

इसे गायब किसने किया?

क्या यह विशेष पंथों को खुश करने के लिए है?

ऐसी और कितनी बातें छिपी हैं? और क्यों?

सेंगोल को एक पवित्र हिंदू समारोह में नेहरू को सौंप दिया गया था। सेंगोल पर खुदा तमिल में यह कविता है: यह हमारा आदेश है कि भगवान (शिव) के अनुयायी, राजा, स्वर्ग में शासन करेंगे। इस प्रकार, 15 अगस्त 1947 को सत्ता एक हिंदू 'राजा' को स्थानांतरित कर दी गई, जिसे एक जैसा शासन करने का आदेश दिया गया था।

तमिल में कविता अब सनातन सभ्यता में वापस आ रही है

यह सनातन सभ्यता की पुनर्स्थापना नहीं तो और क्या है ?

अब आप समझ गए होंगे कि सभी इस्लामिक पार्टियां उद्घाटन समारोह का बहिष्कार क्यों कर रही हैं।

ब्रिटिश शासन द्वारा भारत को सत्ता हस्तांतरित करने के प्रतीक स्वरूप प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिए गए ऐतिहासिक सेंगोल को नये संसद भवन में स्थापित किया जाएगा। यह राजदंड (सेंगोल)अभी इलाहाबाद के एक संग्रहालय में रखा हुआ है।

1947 में मूल सेंगोल बनाने में शामिल रहे दो लोगों, 96 वर्षीय वुम्मिदी एथिराजुलु और 88 वर्षीय वुम्मिदी सुधाकर के नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने की उम्मीद है।

तमिल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एस. राजावेलु ने कहा कि राजाओं के राज्याभिषेक का नेतृत्व करने और सत्ता के हस्तांतरण को पवित्र करने के लिए समयाचार्यों (आध्यात्मिक गुरुओं) के लिए यह एक पारंपरिक चोल प्रथा थी, जिसे शासक को मान्यता देने के तौर पर देखा जाता था।

उन्होंने कहा, ''तमिल राजाओं के पास यह सेंगोल (राजदंड के लिए तमिल शब्द) था, जो न्याय और सुशासन का प्रतीक है। दो महाकाव्यों – सिलपथिकारम और मणिमेकलई – में सेंगोल के महत्व का उल्लेख किया गया है।''

राजावेलु ने कहा कि संगम काल से ही 'राजदंड' का उपयोग खासा प्रसिद्ध रहा है। उन्होंने कहा कि तमिल काव्य 'तिरुक्कुरल' में सेंगोल को लेकर एक पूरा अध्याय है।

राजावेलु ने पीटीआई-भाषा को बताया कि प्राचीन शैव मठ थिरुववदुथुराई आदिनम मठ के प्रमुख ने नेहरू को 1947 में सेंगोल भेंट किया था।

प्रमुख शैव मठों से जुड़े पी.टी. चोकलिंगम ने कहा, ''यह हमारे राजाजी (सी राजगोपालाचारी, भारत के अंतिम गवर्नर जनरल) थे जिन्होंने नेहरू को आश्वस्त किया कि इस तरह के समारोह की आवश्यकता है क्योंकि भारत की अपनी परंपराएं हैं और संप्रभु सत्ता के हस्तांतरण की अगुवाई एक आध्यात्मिक गुरु द्वारा की जानी चाहिए।''

14 अगस्त, 1947 को सत्ता के हस्तांतरण के समय, तीन लोगों को विशेष रूप से तमिलनाडु से लाया गया था – अधीनम के उप मुख्य पुजारी, नादस्वरम वादक राजरथिनम पिल्लई और ओथुवर (गायक) – जो सेंगोल लेकर आए थे और कार्यवाही का संचालन किया था।

तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के 2021-22 नीति नोट के अनुसार: ''सिंहासन के समय, पारंपरिक गुरु या राजा के उपदेशक नए शासक को औपचारिक राजदंड सौंप देंगे।''

इस परंपरा का पालन करते हुए, जब ओथुवमूर्तियों ने कोलारू पाथिगम-थेवारम से 11वें छंद की अंतिम पंक्ति का गायन पूरा किया, तो थिरुववदुथुरै अदीनम थंबीरन स्वामीगल ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को सोने की परत चढ़ा चांदी का राजदंड सौंप दिया।

25/05/2023

दिशाशूल क्या होता है ?

क्यों बड़े बुजुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक टोक करते हैं ? आज की युवा पीढ़ी भले हि उन्हें आउटडेटेड कहे दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है

हम सबने पढ़ा है कि दिशाएं ४ होती हैं
१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण

परन्तु जब हम उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं तो ज्ञात होता है कि वास्तव में दिशाएँ दस होती हैं |

१) पूर्व
२) पश्चिम
३) उत्तर
४) दक्षिण
५) उत्तर - पूर्व
६) उत्तर - पश्चिम
७) दक्षिण – पूर्व
८) दक्षिण – पश्चिम
९) आकाश
१०) पाताल

हमारे सनातन धर्म के ग्रंथो में सदैव १० दिशाओं का ही वर्णन किया गया है,
जैसे हनुमान जी ने युद्ध में इतनी आवाजे की उनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाई दी।
हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं |

अब बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की |
ज्योतिष शब्द “ज्योति” से बना है जिसका भावार्थ होता है “प्रकाश” वैदिक ज्योतिष में अत्यंत विस्तृत रूप में मनुष्य के जीवन की हर परिस्तिथियों से सम्बन्धित विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य यदि इसको तनिक भी समझ ले तो वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली बहुत सी समस्याओं से बच सकता है और अपना जीवन सुखी बना सकता है |
दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करना
चाहिए। हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है |

१) सोमवार और शनिवार को पूर्व
२) रविवार और शुक्रवार को पश्चिम
३) मंगलवार और बुधवार को उत्तर
४) गुरूवार को दक्षिण
५) सोमवार और गुरूवार को दक्षिण-पूर्व
६) रविवार और शुक्रवार को दक्षिण-पश्चिम
७) मंगलवार को उत्तर-पश्चिम
८) बुधवार और शनिवार को उत्तर-पूर्व

परन्तु यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशा में दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है
परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य
हो ओर उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी पड़े, जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो यह उपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए –
रविवार – दलिया और घी खाकर
सोमवार – दर्पण देख कर
मंगलवार – गुड़ खा कर
बुधवार – तिल, धनिया खा कर
गुरूवार – दही खा कर
शुक्रवार – जौ खा कर
शनिवार – अदरक अथवा उड़द की दाल खा कर

साधारणतया दिशाशूल का इतना विचार नहीं किया जाता परन्तु यदि व्यक्ति के जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्ति मार्ग में आने वाली बाधाओं से बच सकता है ।

06/05/2022

🚩 सनातनधर्मोद्धारक शिवावतार आद्यजगद्गुरु शङ्कराचार्य भगवत्पाद की जय हो।

श्रीमदाद्यशङ्कराचार्य भागवत्पाद के जयन्ती महोत्वस की आप सभी को अनन्तानन्त बधाइयां एवं शुभकामनाएं।

श्रीमदाद्यशङ्कराचार्य भागवत्पाद का जन्म- वैशाख शुक्ल ५, २६३१ युधिष्ठिर शक, कल्यब्द २५९३, ५-४-५०९ ई.पू.

महानिर्वाण- कार्त्तिक पूर्णिमा युधिष्ठिर शक २६६२= ४७७ ई.पू.।

वैशाख शुद्ध पंचमी - श्रीमदाद्यशंकराचार्य जयंती

🚩 आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।

🚩 स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा।

🚩 वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया और भारत में चार कोनों पर चार मठों की स्थापना की।

🚩 भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है।आचार्य शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं।

🚩 दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे।

🚩 आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना,

🚩 सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना - इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है।

🚩 चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त की।

#श्रीमदाद्यशंकराचार्यके_लिखित_साहित्य—

अष्टोत्तरसहस्रनामावलिः
उपदेशसहस्री
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम्‌
तत्त्वविवेकाख्यम्
दत्तात्रेयस्तोत्रम्‌
द्वादशपंजरिकास्तोत्रम्‌
पंचदशी कूटस्थदीप.
चित्रदीप
तत्त्वविवेक
तृप्तिदीप
द्वैतविवेक
ध्यानदीप
नाटक दीप
पञ्चकोशविवेक
पञ्चमहाभूतविवेक
पञ्चकोशविवेक
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्द
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्द
ब्रह्मानन्दे योगानन्द
महावाक्यविवेक
विद्यानन्द
विषयानन्द

परापूजास्तोत्रम्‌
प्रपंचसार
भवान्यष्टकम्‌
लघुवाक्यवृत्ती
विवेकचूडामणि
सर्व वेदान्त सिद्धान्त सार संग्रह
साधनपंचकम
भाष्ये अध्यात्म पटल भाष्य
ईशोपनिषद भाष्य
ऐतरोपनिषद भाष्य
कठोपनिषद भाष्य
केनोपनिषद भाष्य
छांदोग्योपनिषद भाष्य
तैत्तिरीयोपनिषद भाष्य
नृसिंह पूर्वतपन्युपनिषद भाष्य
प्रश्नोपनिषद भाष्य
बृहदारण्यकोपनिषद भाष्य
ब्रह्मसूत्र भाष्य
भगवद्गीता भाष्य
ललिता त्रिशती भाष्य
हस्तामलकीय भाष्य
मंडूकोपनिषद कारिका भाष्य
मुंडकोपनिषद भाष्य
विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र भाष्य
सनत्‌सुजातीय भाष्य

छोट्या तत्त्वज्ञानविषक रचना (कंसात श्लोकसंख्या/ओवीसंख्या)
अद्वैत अनुभूति (८४)
अद्वैत पंचकम्‌ (५)
अनात्मा श्रीविगर्हण (१८)
अपरोक्षानुभूति (१४४)
उपदेश पंचकम्‌ किंवा साधन पंचकम्‌ (५)
एकश्लोकी (१)
कौपीनपंचकम्‌ (५)
जीवनमुक्त आनंदलहरी (१७)
तत्त्वोपदेश(८७)
धन्याष्टकम्‌ (८)
निर्वाण मंजरी (१२)
निर्वाणशतकम्‌ (६)
पंचीकरणम्‌ (गद्य)
प्रबोध सुधाकर (२५७)
प्रश्नोत्तर रत्‍नमालिका (६७)
प्रौढ अनुभूति (१७)
यति पंचकम्‌ (५)
योग तरावली(?) (२९)
वाक्यवृत्ति (५३)
शतश्लोकी (१००)
सदाचार अनुसंधानम्‌ (५५)
साधन पंचकम्‌ किंवा उपदेश पंचकम्‌ (५)
स्वरूपानुसंधान अष्टकम्‌ (९)
स्वात्म निरूपणम्‌ (१५३)
स्वात्मप्रकाशिका (६८)
गणेश स्तुतिपरगणेश पंचरत्‍नम्‌ (५)
गणेश भुजांगम्‌ (९)
शिवस्तुतिपरकालभैरव अष्टकम्‌ (१०)
दशश्लोकी स्तुति (१०)
दक्षिणमूर्ति अष्टकम्‌ (१०)
दक्षिणमूर्ति स्तोत्रम्‌ (१९)
दक्षिणमूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम्‌ (१३)
मृत्युंजय मानसिक पूजा (४६)
वेदसार शिव स्तोत्रम्‌ (११)
शिव अपराधक्षमापन स्तोत्रम्‌ (१७)
शिव आनंदलहरी (१००)
शिव केशादिपादान्तवर्णन स्तोत्रम्‌ (२९)
शिव नामावलि अष्टकम्‌ (९)
शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्‌ (६)
शिव पंचाक्षरा नक्षत्रमालास्तोत्रम्‌ (२८)
शिव पादादिकेशान्तवर्णनस्तोत्रम्‌ (४१)
शिव भुजांगम्‌ (४)
शिव मानस पूजा(५)
सुवर्णमाला स्तुति (५०)
शक्तिस्तुतिपरअन्‍नपूर्णा अष्टकम्‌ (८)
आनंदलहरी
कनकधारा स्तोत्रम्‌ (१८)
कल्याण वृष्टिस्तव (१६)
गौरी दशकम्‌ (११)
त्रिपुरसुंदरी अष्टकम्‌ (८)
त्रिपुरसुंदरी मानस पूजा (१२७)
त्रिपुरसुंदरी वेद पाद स्तोत्रम्‌ (१०)
देवी चतु:षष्ठी उपचार पूजा स्तोत्रम्‌ (७२)
देवी भुजांगम्‌ (२८)
नवरत्‍न मालिका (१०)
भवानी भुजांगम्‌ (१७)
भ्रमरांबा अष्टकम्‌ (९)
मंत्रमातृका पुष्पमालास्तव (१७)
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्‌
ललिता पंचरत्नम्‌ (६)
शारदा भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (८)
सौंदर्यलहरी (१००)
विष्णू आणि त्याच्या अवतारांच्या स्तुतिपरअच्युताष्टकम्‌ (९)
कृष्णाष्टकम्‌ (८)
गोविंदाष्टकम्‌ (९)
जगन्‍नाथाष्टकम्‌ (८)
पांडुरंगाष्टकम्‌ (९)
भगवन्‌ मानस पूजा (१०)
मोहमुद्‌गार (भज गोविंदम्‌) (३१)
राम भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (२९)
लक्ष्मीनृसिंह करावलंब (करुणरस) स्तोत्रम्‌ (१७)
लक्ष्मीनरसिंह पंचरत्‍नम्‌ (५)
विष्णुपादादिकेशान्त स्तोत्रम्‌ (५२)
विष्णु भुजंगप्रयात स्तोत्रम्‌ (१४)
षट्‌पदीस्तोत्रम्‌ (७)
इतर देवतांच्या आणि तीर्थांच्या स्तुतिपरअर्धनारीश्वरस्तोत्रम्‌ (९)
उमा महेश्वर स्तोत्रम्‌ (१३)
काशी पंचकम्‌ (५)
गंगाष्टकम्‌ (९)
गुरु अष्टकम्‌ (१०)
नर्मदाष्टकम्‌ ९)
निर्गुण मानस पूजा (३३)
मनकर्णिका अष्टकम्‌ (९)
यमुनाष्टकम्‌ (८)
यमुनाष्टकम्‌-२ (९)

#अष्टशंकरोद्घोष-

(१) श्री आद्य शंकराचार्य इस कलिकाल में सनातन हिन्दू धर्म के सर्वोच्च तथा प्रामाणिक जगद्गुरु हैं - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(२) श्री आद्य शंकराचार्य ने जो कहा है उसी के अनुकूल किसी भी वर्त्तमान संन्यासी अथवा अन्य धर्मोपदेशक का कथन मान्य है तद्विपरीत नही - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(३) श्री आद्य शंकराचार्य का विरचित शांकर भाष्य ही सनातन धर्म का यथार्थ अभिप्राय व्यक्तकरता है , यह भाष्य सनातन वैदिक धर्म का प्रामाणिक सार -सर्वस्व है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(४) श्री आद्य शंकराचार्य के विरचित साहित्य का एक -एक वाक्य सनातन हिन्दू धर्म का सम्पोषक अमृतरस है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(५) श्री आद्य शंकराचार्य का ध्यान , उनकी धारणा , उन पर दृढ विश्वास , उनके दर्शाए मार्ग का अनुगमन - ये हमारा धर्म है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(६) श्री आद्य शंकराचार्य ब्राह्मणत्व के आदर्श , हिन्दुत्व के गौरव तथा कैवल्य के नायक हैं - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(७) श्री आद्य शंकराचार्य के कथन के अनुकूल श्रुत्यर्थ उचित है तथा प्रतिकूल श्रुत्यर्थ अनुचित है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो !

(८) श्री आद्य शंकराचार्य के सन्देश का प्रवर्तन , प्रवर्धन अथवा प्रचार -प्रसार ये प्रत्येक ब्राह्मण का कर्त्तव्य है और इसका अनुशीलन वा समर्थन प्रत्येक हिन्दू का कर्त्तव्य है - ये धारणा प्रत्येक हिन्दू के हृदय मे सुदृढ हो

धर्मकी— जय हो !
अधर्मका— नाश हो !
प्राणियोंमें— सद्भावना हो !
विश्वका— कल्याण हो !
गोहत्या— बंद हो !
गोमाताकी— जय हो !

🚩🚩 नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव !

19/03/2022

#शुभहोली

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