Anuj Ranjan
हो गये हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें हम।
टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम।
आ गया स्वातंत्र्य फिर भी चेतना आने न पाई।
प्रगति के ही नाम श्रध्दा और श्रम को दी विदाई।
इस भयंकर मौज को पतवार कैसे मान लें हम
हो गये हैं .....
देश सारा घिर रहा है सैन्य के घन बादलों से।
घिर रही प्रिय मातृभू है चतुर्दिक खल अरिदलों से।
इस अमा के तिमिर को ही अरुणिमा क्या मान लें हम
हो गये हैं........
राष्ट्र को सब लोग भूले स्वार्थ है युग मंत्र सारा।
प्रान्त भाषा भेद की है बह रही नित कलुष धारा।
इस पराये तन्त्र को निज तन्त्र कैसे मान लें हम
हो गये हैं........
वेष वाणी तत्त्व-दर्शन दूसरों का यह सभी ले।
विकृतियों को ग्रहण करते निज प्रकृति को आज भूले।
दूसरों की यह नकल है अस्मिता क्या मान लें हम
हो गये हैं....
अलस तज कर उद्यमी बन लें ह्रदय में ध्येय निष्ठा।
हम सभी का एक व्रत हो विश्व में माँ की प्रतिष्ठा।
देश के भवितव्य को ही अब चुनौती मान लें हम।
हो गये हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें हम।
टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम।
मोह और अहंकार
कलयुग
का सबसे बड़ा दोष है
राज्य संविधान में काव्य शून्य होता है। राज्य संविधान में किसी भी तरह के साहित्यिक गुण नहीं होते। इसलिए वह साहित्यिक कृति नहीं होता। वह साहित्यिक कृति न होने से सामान्य लोग राज्य संविधान पढ़ने की झंझट में नहीं पड़ते। लेकिन, दिलचस्प बात यह है कि राज्य संविधान पर असंख्य राजनीतिक नेता बोलते रहते हैं। राजनीति के लिए उसका उपयोग करते हैं। उनके भाषण सुनने पर मेरे जैसे व्यक्ति के मन में ये प्रश्न उभरे बिना नहीं रहते कि क्या इन लोगों ने वाकई राज्य संविधान पढ़ा है? क्या उसका अध्ययन किया है? क्या उसे समझने की कोशिश की है?
अतः राज्य संविधान समझने के लिए राज्य संविधान पर विशेषज्ञ लेखकों की पुस्तकें पढ़नी होती हैं। वे भी समझने के लिए बहुत आसान होती हैं, ऐसा नहीं है। उसका एक कारण यह है कि राज्य संविधान की भाषा कानूनी भाषा होती है और कानूनी भाषा उसकी प्रकृति के हिसाब से जटिल होती है। सामान्य लोग रोजमर्रे के व्यवहार में इस भाषा का उपयोग नहीं करते। ऐसे शब्दों का उपयोग हो तब भी, उनके व्यावहारिक अर्थ अलग होते हैं और कानूनी अर्थ अलग होते हैं। इस विषय के अध्येता लेखक यथासंभव सरल भाषा में राज्य संविधान पर भाष्य करते रहते हैं। भारत के राज्य संविधान पर इस तरह के भाष्य करनेवाली अनेक पुस्तकें हैं। संविधान पर बात करने वाले ऐसे नेता इन सभी विषयों पर आधारित पुस्तक पढ़ते भी है क्या
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