Mainpura devi asthan

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10/05/2024
16/04/2024

पावन - पर्व श्रीरामनवमी के शुभ अवसर पर

प्रभु श्रीराम विश्वव्यापी हैं। विश्व की कोई ऐसी भाषा नहीं , जिसने प्रभु श्रीराम के गान से अपने को पवित्र न किया हो। विश्व में रामकथा पर जितने भी ग्रंथ लिखे गए हैं , उतने ग्रंथ किसी एक कथा पर आज तक नहीं लिखे गए हैं। अब तक संसार की विभिन्न भाषाओं में प्रायः 500 अलग-अलग प्रकार की रामायण प्रकाशित की जा चुकी हैं।

हॉलैण्ड स्थित महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय की शोध से पता चलता है कि सारे संसार में लगभग 1000 नगर ऐसे हैं , जिनका नाम " राम " से प्रारंभ होता है। विश्व के प्रत्येक महाद्वीप (महादेश) से कुछ उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है -
एशिया - रामहमोज (ईरान) , रामाल्लाह (इराक) , रामगढ़ (बांग्लादेश)।
यूरोप - रामकस्टहट (स्पेन) , रामटेन (डेनमार्क) , रामसेल (बेल्जियम)।
अफ्रीका - रामे (दक्षिण अफ्रीका)।
उत्तरी अमेरिका - रामपार्ट (कनाडा) , रामसिटो (अमेरिका)।
दक्षिण अमेरिका - रामोज (ब्राज़ील) , रामोन (अर्जेंटीना)।
ऑस्ट्रेलिया - रामसे।

भारत के जनमानस को " राम " ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। अपने देश के हर छठवें व्यक्ति के नाम में " राम " शब्द लगा हुआ है। आंध्र प्रदेश में रामाराव , तमिलनाडु में रामचंद्रन , कर्नाटक में रमैया , महाराष्ट्र में रामनायक , गुजरात में रामभाऊ , पंजाब में रामसिंह , बंगाल में रामप्रसाद तो हिंदी-भाषी क्षेत्रों में रामचंद्र के रूप में राम जन-जन में लोकप्रिय हैं।

भारतीय संविधान निर्मात्री समिति द्वारा संविधान में कतिपय चित्र समाविष्ट किए गए , जिनमें से प्रमुख है - लंका विजय के पश्चात् प्रभु श्रीराम के स्वदेश वापसी का चित्र।

भगवान श्रीराम में आदर्श लोकनायक के सभी गुण मौजूद थे। इसीलिए वे सदियों से जन-जन के आराध्य बने हुए हैं।

अब हम ' राम ' को निम्नलिखित उदाहरण से जानें। एक बड़े पात्र में रस रहता है तथा उसमें रसगुल्ले रहते हैं। रस में रसगुल्ला रहता है तथा रसगुल्ला में रस रहता है। इसी प्रकार जो प्रभु-सत्ता हम सभी में रम रही है और हम सभी जिस प्रभु-सत्ता में ही रम रहे हैं , उसी परम सत्ता को ' राम ' शब्द से विभूषित किया गया है। ऐसी प्रभुसत्ता का प्रकटीकरण त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी को पावन अयोध्या में हुआ था।

प्रभु श्रीराम का स्मरण - मात्र भी कितना विलक्षण प्रभाव डालता है ? इसका सबसे बड़ा प्रमाण रावण के ही जीवन से जुड़ा हुआ है।
अपने दल के लगभग संपूर्ण योद्धाओं के विनष्ट हो जाने पर रावण ने कुंभकरण को जगाया। रावण की बातों को सुनकर कुंभकरण ने कहा - क्या सीता तुम्हारे वश में हुई ? रावण ने कहा - नहीं। तब कुंभकर्ण ने कहा - तुम तो मायावी हो। क्या तुम राम बनकर कभी उसके सम्मुख गए ? तो रावण ने जो उत्तर दिया , वह बहुत ही अद्भुत है।
रावण ने कहा -
राम: किं नु भवान् भून्न तच्छृणु सखे लीलातलश्यामलम्।
रामांग भजतो ममापि कलुषो भावों न सज्जायते।।
अर्थ - जब मैं राम का रूप धारण करने के लिए दूर्वादल श्याम राघवेंद्र के अंगो का ध्यान करने लगा , तब एक-एक करके मेरे हृदय के सारे कालुष्य समाप्त होने लगे। फिर तो सीता को वश में करने का प्रश्न ही समाप्त हो गया।

अब हम समझ गए होंगे कि भक्त तुलसीदास ने " राम " के स्मरण पर जोर क्यों दिया ? केवल नाम - स्मरण से ही मन में निर्मलता एवं पवित्रता आने लगती है।

अनेक विदेशी गैर - हिंदुओं को भी प्रभु श्रीराम ने अपनी ओर आकृष्ट किया है। केवल दो दृष्टांत देना ही पर्याप्त होगा।
बेल्जियम के फादर बुल्के तो भारत में आकर " राम " के ही होकर रह गए। उनका शोधपरक ग्रंथ - ' राम कथा - उद्भव एवं विकास ' विश्व प्रसिद्ध है।
इस आलेख का समापन स्व० शायर शम्सी मीनाई के नज्म से करता हूं -
मैं राम पर लिखूं , मेरी हिम्मत नहीं है कुछ ,
तुलसी व वाल्मीकि ने , छोड़ा नहीं है कुछ।
वह राम , जिसका नाम है जादू लिए हुए ,
लीला है जिसकी ओम् की खुशबू लिए हुए।।

आप सभी को श्रीरामनवमी की हार्दिक बधाई।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

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