The Success System

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17/04/2026

महेश हमेशा समय को अपनी मुट्ठी में क़ैद समझता था घड़ी की सुइयाँ, मोबाइल का टाइमर, दफ़्तर की फाइलें, सब कुछ उसके इशारों पर चलता हुआ सा लगता था। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उसे एहसास हुआ कि समय किसी का नहीं होता, और न ही किसी की पकड़ में आता है।

सुबह की धूप में बैठकर वह अक्सर सोचता “उम्र बढ़ रही है, समय घटता जा रहा है… पर अभी भी समय है, बस वह नहीं है जिसके साथ समय का पता नहीं चलता।”

महेश एक दिन स्टेशन पर बैठा लोगों को आते-जाते देख रहा था। किसी की ट्रेन छूट रही थी, कोई भागकर चढ़ रहा था, कोई उतरकर किसी को गले लगा रहा था। उसे लगा जैसे ज़िंदगी भी एक स्टेशन ही है जहाँ मन, क़दम, रेल, गाड़ी और हवाई जहाज़ सब अलग-अलग रास्तों पर निकलते हैं। कोई लौट रहा है, कोई जा रहा है… लेकिन कोई भी उस तरह नहीं लौटता, जैसी उम्मीद में हम खड़े रहते हैं।

महेश की ज़िंदगी में भी कोई था अनुपमा। दोनों साथ चलते-चलते कहीं रुक गए थे। रुकना शायद उनके रिश्ते का हिस्सा था, और चलना ज़िंदगी की मजबूरी। वे रुके भी एक-दूसरे के साथ थे और चले भी एक-दूसरे से दूर होकर।
यही तो अजीब बात है—हम किसी के साथ चलते भी हैं और किसी के साथ रुकते भी… पर यह तय नहीं कर पाते कि कौन हमारे साथ रहेगा, और किसके साथ बस यादों की दूरी ही रह जाएगी।

साल बीत गए। महेश ने अपनी दौड़ जारी रखी। नौकरी, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ सब कुछ चलता रहा। लेकिन उसकी रफ़्तार के भीतर एक धीमी सी कमी महसूस होती थी, जैसे सांसें तो चल रही हों पर मंज़िल का पता न हो।

एक शाम वह पुराने शहर गया जहाँ हर गली में उसकी और अनुपमा की यादें थीं। वहाँ खड़े होकर उसने महसूस किया—हम सब धीरे-धीरे याद होने की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
जीवन का हर कदम एक निशान छोड़ता है। कुछ गहरे, कुछ हल्के, कुछ मिट जाने वाले।

महेश ने उस दिन ये समझा कि इंसान उम्र से नहीं, यादों से बूढ़ा होता है। उम्र तो बस शरीर की रफ़्तार धीमी करती है, लेकिन यादें मन को समय से बहुत आगे ले जाती हैं।

वह घर लौटा, अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—
“किसी दिन हम सब एक तस्वीर बनकर रह जाएंगे। लोग हमें याद करेंगे, फिर धीरे-धीरे हमारी याद भी धुंधली हो जाएगी। पर जब तक समय है, हमें किसी के साथ चलने और किसी के लिए रुकने का फ़न ज़रूर सीख लेना चाहिए।”

महेश ने घड़ी उतारी और मेज़ पर रख दी।
अब वह समय को नहीं, पलों को जीना चाहता था।
क्योंकि उसे पता चल चुका था—
समय कभी घटता नहीं, बस इंसान उससे दूर होता जाता है।

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