Divya vats
06/11/2024
छठ और शारदा सिन्हा जी
दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं।
दिवाली के बाद से ही हर दिन लगभग शारदा सिन्हा जी के गीत ही सुने और सुनाए जाते रहे हैं हमारे यन्हा।
भाई दूज का गीत हो….. सामा चकेवा हो या फिर छठ। या विवाह के हर रस्मो के लिए विशेष गीत।
हर एक गीत में वो मिट्टी की खुशबू, संस्कृति की मिठास…..।
हर एक गीत एक दूसरे से अलग और भाव ऐसा कि लग रहा हो की हम खुद गा रहे हो।
इतनी जल्दी नहीं चुप होना चाहिए था।
शून्यता में नहीं समाना चाहिए था इतनी जल्दी…….
अभी तो और भी बहुत चीज़े बाकि थी अपनी संस्कृति, लोक गीत के लिए।
आप नए जमाने के साथ चल रही थी….. बहुत अच्छा लगता था।
आपके शुरुआती दिनों की कुछेक कहानियां सहरसा में सुनती रही हूं, बड़ी मम्मी और पापा से। छोटू भैया के जन्म के बाद आपका गाया हुआ एक सोहर की बात हमेशा मम्मी कहती थीं। बड़ी मम्मी आपको ऊपर मिलेंगी…... एक बार फिर महफिल सजेगी ऊपर।
मन मे मलाल रह गया कि आप से मिलना नही हो पाया ।
आपके गाए गीत हमेशा गुंजायमान रहेगा। हर बेटी/बेटे की शादी में गाए जायेंगे…... हल्दी मे गाए जायेंगे। समधियों को खूब गाली दी जाएगी……. बस आप अब नहीं दिखेंगी।
आपकी कमी हमेशा रहेगी…... क्योंकि आपके जैसी कोई दूसरी "शारदा सिन्हा" नहीं होगी।
एक प्रशंसक
दिव्या_वत्स
21/03/2024
#मेरीकाविता पाठकों के आग्रह पर नई तस्वीर में
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