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16/12/2024
18/08/2024
26/07/2024
22/05/2024

आखिर ऐसे कैसे किसी को परिवार के बीच में बैठ कर पोर्न देखने को मजबूर किया जा सकता है ????

अब तो घर में बच्चों के बीच बैठकर न्यूज देखना भी बहुत बड़ी शर्मिदगी का काम हो गया है ! वैसे तो मैं और कोई चैनल देखती ही नही हूँ सिवाय आजतक न्यूज के

आजकल सभी न्यूज़ चैनलों पर हर ब्रेक में एक कन्डोम का प्रचार आता है और इस प्रचार में आती है एक अन्तरराष्ट्रीय वेश्या जिनका नाम है सनी लियोनी !
इस एडवर्टाईजमेंट में गाना चलता है "मन क्यों बहका रे बहका आधी रात में " और इतने अश्लिल ढंग से कपड़ा उतारते और बेड पर लेटते दिखाया जाता है कि परिवार व बच्चों के बीच बैठे एक सभ्य परिवार के व्यक्ति का सर शर्म से झुक जाता है !

आखिर ऐसे कैसे किसी को परिवार के बीच में बैठ कर पोर्न देखने को मजबूर किया जा सकता है ?

क्या हम किसी भी वस्तु के प्रचार को सभ्य ढंग से नही दिखा सकते ?

क्या हर सामान को बेचने के लिए (चाहे वह एक पानी का बोतल हो या अंडरवेयर और बनियान, चाहे वह परफ्यूम हो या शेविंग ब्लेड) इनके विज्ञापनों में अधनंगी लड़कियों, किसिंग सीन का होना, भद्दे तरीके से लिपटा लिपटी दिखाना आवश्यक है ?

हद तो तब हो गयी जब एक बच्चा कमरे में बैठा कार्टून चैनल देख रहा होता है और बच्चों के उस कार्टून चैलन पर व्हिस्पर का ऐड आ जाता है...

अब सात साल के बच्चे को खेलने कूदने की उम्र में व्हीस्पर और कंडोम का प्रचार दिखाकर यह मीडिया और कम्पनियाँ क्या हासिल करना चाहती है यह मेरे तो समझ में नही आया लेकिन दुख बहुत हुआ !

न जाने कितने साल बीत गए इसी नंगेपन के कारण मुझे अपने घर में बैठ कर किसी म्यूजिक चैनल पर फिल्मों के गाने सुने और बच्चों के सामने टीवी पर फिल्म देखे हुए...

क्या ये मेरे राइट टू वॉच में सेंध नही है..?
मैं क्या देखूँ क्या नही...
ये कोई और ही तय करेगा क्या...?

क्या इस जंगली और अश्लील मीडिया और विज्ञापनों पर कोई कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है या नही...?
क्या समाज में उन लोगों को जीने का कोई हक नही है जो अपने परिवार को इस गंदगी से दूर रखना चाहते हैं..?

मैं अपने मीडियातंत्र सरकार, समाजविद्, सभी से यह सवाल पूछना चाहती हूँ कि.. क्या ये मेरी अकेले की समस्या है...? क्या उनके घरों में टीवी नही चलता, क्या उनको भी शर्म आती है ?

सरकार से मैं आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करती हूं कि कृपया हमें इस पोर्न की विभिषिका से बचाइए !

भारतीय संस्कारी समाज की जड़े कफी हद तक खोखली हो चुकी है लेकिन जो बची है उन्हें बचाने की कृपा करिए !

ये सिर्फ स्त्री की कहानी ही नही पुरुष का दर्द भी है वो भी परिवार को बचाना चाहते हैं इस अभिशाप से ।

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