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पता है, मेरे भाई को लगता था कि भगवान हमें जन्म देने से पहले हमसे एक क़सम दिलवाते हैं कि, "तुम्हें अपने पिछले जन्म की यादें किसी को नहीं बतानी, ख़ुद को भी नहीं। और जिस दिन तुमने किसी को बताया, उस दिन, उस क्षण ही तुम्हें वापस बुला लिया जाएगा।" ऐसा सच में हो सकता है क्या? पता नहीं।
पर अगर ऐसा सच में होता भी होगा न, तो मैं क़सम खाऊंगा ही नहीं। दोबारा जन्म हो या न हो, इस जन्म की यादें मेरे लिये बहुत क़ीमती हैं। हाहाहा, भगवान से ही सौदा कर लूँगा (इंसान होने के नाते इतना तो सीख ही लिया है)।
पता है, नानी के किस्सों में न ढेर सारे "बुझउअल"(बूझो तो जाने) हुआ करते थे, जैसे कि..."रानी सोनवन्ति ने एक क़ैदी के बेटे से उसके बाप को छोड़ने के बदले 7 बुझउअल बुझाने को कहा, जिसमे से एक था.. "एका जे हरियर रामा, केलवा के पतवा जी, दोसर बुझउअल बुझाओ जी" (कुछ इस तरीक़े से, साफ़ साफ़ पूरा याद नहीं)। आज वो सारे बुझउअल ग़ायब हो गए हैं। अब कोई अपनी बातों में उसे इस्तेमाल नहीं करता। शायद सारे बुझउअल लोगों ने अपनी ज़िंदगी में ही उतार लिए, इसीलिए आजकल लोगों को समझना थोड़ा मुश्किल हो गया है (या शायद ज़्यादा उलझन के कारण लोग सुलझाने की कोशिश ही नहीं करते)।
और तब आता है परिवार। Dry fruits वाले icecream की तरह होता है परिवार, इसमें सबकी अलग अलग एक पहचान तो है (मुहँ में डालते ही काजू, किशमिश, अखरोट, सबके स्वाग अलग अलग आने लगते हैं) पर सब के सब एक ही क्रीम में सने होते हैं।
माँ की गोद, बाप की उंगली, भाई का कंधा और बहन के हाँथ, ये एक अलग ही feeling है बॉस।
और छठ जो है न, वो सिर्फ एक त्योहार तक सीमित नहीं है, वो परिवार का एक हिस्सा है। परिवार चलाने का एक तरीक़ा है।
छठ में जब परवैती(जो लोग छठ करते हैं) के आगे जल, दूध अर्पित करने की बारी आती है न, तो लोटा एक के हाथ में ही क्यों न हों, उस हाथ से सारे हाथ अपने आप जुड़ जाते हैं, एक अटूट जोड़ की तरह (ये बात, जिन्होंने छठ देखा हो, उन्हें ही समझ आएगी)।
पता है, जब मैं कहता था कि, "माँ, डलिया बहुत भारी है, हम इनती दूर नहीं लेके जाएंगे।" इस पर माँ कहती थी,
"ये डलिया नहीं सम्भलता तुमसे, परिवार कैसे संभालोगे? कोशिश तो करो, बहुत लोग हैं तुम्हारी मदद करने के लिए, तुम्हारे साथ चलने के लिए"।

इसीलिए कहता हूँ, दोबारा जन्म हो न हो, इस जन्म की यादें बहुत क़ीमती हैं मेरे लिए। आपका क्या कहना है?

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