Pradeep Kumar
28/06/2026
. *श्रीकृष्ण लीलामृतम्- भाग २*
आनन्द के अवतार की वेला
कौन जानता था कि नन्द जी युवा से प्रौढ़ और प्रौढ़ावस्था से वृद्धत्व की और बढ़ चले थे.......पर सन्तान सुख इनके जीवन में अभी तक नही आया........ भगवान श्री नारायण से प्रार्थना कर करके बृजवासी भी अब थक चुके थे ....... किन्तु इन नन्द दम्पति को कोई चिन्ता नही थी कि हमारे सन्तान नही हैं ।
हे तात विदुर जी ! निष्काम थे ये दोनों...... नन्द जी और उनकी भार्या यशोदा जी.......दान पुण्य, अतिथि सेवा , गौ पालन, समस्त बृज को सुख देंने का प्रयास करते ही रहना..... पर अपनें लिये कुछ नही चाहिये।
"आपको भगवान सन्तान दे"
कोई वृद्ध बृजवासी हृदय से कह देता ।
तो नन्द जी हँसते ......और कहते ....... भगवान जो करते हैं मंगल के लिये ही करते हैं........मुझे सन्तान नही दीं ये भी उनका कोई मंगल विधान ही होगा ।.......फिर हँसते हुए बृजेश्वरी कहतीं - भगवन् ! क्या बृज के गोप बालक हमारे बालक नही हैं ? मैं तो सबको अपना ही बालक मानती हूँ ।
ये मात्र कहना नही था यशोदा जी का .......... उनके हृदय से वात्सल्य निरन्तर झरता रहता था समस्त बालकों के लिये ।
पर बृजवासी दुःखी थे .......कि उनके मुखिया के कोई सन्तान नही है ।
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मैं आपका कुलपुरोहित शाण्डिल्य हूँ ..........किन्तु ! मेरा श्रेष्ठ ज्योतिर्विद होना भी आपके किसी काम नही आरहा इस बात का हे ब्रजेश ! मुझे दुःख है .............
आज महर्षि शाण्डिल्य पधारे थे नन्दालय में ।
महर्षि के चरणों में अपना शीश रख दिया था नन्द जी नें ..........और यही कहा ........आप मेरे पुरोहित नही हैं .....आप मेरे पिता हैं ........आप मेरे सर्वस्व हैं महर्षि ! क्षमा करें ! मेरे नारायण भगवान नें मुझे जो दिया है मैं उस पर सन्तुष्ट हूँ.......पूर्ण सन्तुष्ट हूँ ।
क्या श्रेष्ठ, निष्काम हो जाना नही है ? महर्षि के मुखारविन्द की ओर देखकर ये प्रश्न किया था नन्द जी नें ।
आहा ! आनन्द से भर गए थे महर्षि शाण्डिल्य । कितनी ऊँची स्थिति को पा चुके हैं ये ब्रजपति ..........
आप मेरे कहनें से एक अनुष्ठान क्यों नही करते !
कैसा अनुष्ठान गुरुदेव ! नन्द जी नें पूछा ।
सन्तान गोपाल मन्त्र का अनुष्ठान .........
हँसे नन्दराय......."आप की जो आज्ञा हो ......दास को स्वीकार है" ।
विनम्रता की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं नन्द राय तो ।
तो मैं समस्त बृज के ब्राह्मणों को निमन्त्रण भेजूँ ?
जी ! मुस्कुराते हुये ब्रजपति नें महर्षि से कहा ।
गणना की महर्षी नें ................. फिर आँखें बन्द करके कुछ बुदबुदानें लगे थे ...........कुछ देर में नेत्रों को खोल लिया था ........"पता नही मेरी ग्रह गणना किसी काम में नही आरही.......न मेरी भविष्य दृष्टि ही कुछ देख पा रही है .......ये क्या हो रहा है ........कुछ समझ नही आरहा ।
हे तात विदुर जी ! ग्रह गणना क्या बता पायेंगें इस अद्भुत जन्म के बारे में ........... न भविष्य दृष्टि ही .......... क्यों की ये तो "अजन्मा के जन्म" की अद्भुत घटना है ........... इसको कोई नही समझ पायेगा ।
उद्धव नें विदुर जी को ये बात बताई।
ब्राह्मणों का अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया गया था ................
बड़े बड़े ब्राह्मण आये थे .............. यमुना जी के पावन तट पर ये अनुष्ठान प्रारम्भ करवा दिया था महर्षि नें ............
मध्य में सजे धजे, स्वर्णाभूषण धारण कर यजमान की गद्दी में नन्द जी विराजमान होते .......और दाहिनें भाग में उनकी अर्धांगिनी यशोदा जी बैठतीं ।
बस.....नन्द यशोदा बैठते थे ........ब्राह्मणों के प्रति उनकी पूरी श्रद्धा थी ........पर संकल्प के समय वे "पुत्र प्रापत्यर्थम्" कभी नही बोलते .........वे अपनें समस्त अनुष्ठानादि कर्मों को भगवान नारायण के चरणों में समर्पित कर देते।
किन्तु बृज के गोपों की यही कामना थी कि हमारे मुखिया के बालक होना चाहिये ........ये अनुष्ठान छ मास का था ।
अनुष्ठान से दम्पति अत्यन्त प्रसन्न......... यज्ञ हो रहा है........ दान पुण्य किया जा रहा है ..... बड़े बड़े ब्रह्मर्षि पधारे हैं हमारे यज्ञ में .... नन्द दम्पति के आल्हाद का कोई ठिकाना नही ।
पर महर्षि का कहना ये था कि यजमान जब तक अपनी कामना का मन में संकल्प न करे तब तक कामना पूरी कैसे होगी ?
नन्द राय का कहना था.......जीवन में क्या कमी है ये बात क्या मेरे भगवान नारायण नही जानते ? वे तो अन्तर्यामी हैं भगवन् !
अब इसका उत्तर क्या देते महर्षि शाण्डिल्य ....और शाण्डिल्य स्वयं भी तो निष्काम भक्ति के आचार्य हैं............उन्होंने दुनिया को यही तो सिखाया है अपनें "शाण्डिल्य भक्ति सूत्र" में ।
अब जो करेंगें भगवान नारायण ही करेंगें ..............
तात विदुर जी ! छ मास के लिये समस्त बृज के गोपों नें भी अनुष्ठान शुरू कर दिया था ...........वे जप करते .......और उसका फल अपनें मुखिया नन्द जी को अर्पण कर देते .......पर साथ में ये भी कहते कि हमारे मुखिया जी को लाला हो ..........दान करते .....तो "मुखिया के लाला हो".........अतिथि सत्कार भी करते तो कहते ........ अतिथि से कहते ........हमारे बृज के राजा नन्द जी के लाला हो ...हे अतिथि देवता ! ये आशीर्वाद दो ..........यमुना स्नान भी करते तो यही मांगते ।
गोपियाँ व्रत करनें लगी थीं ...... "हमारी बृजेश्वरी के लाला हो".........
प्रार्थना हर गोकुल के घर से यही निकल रहा था ..........हमारे नन्द राय को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो ।
सज धज करके प्रातः ही बैठ जाते नन्द जी यशोदा जी के साथ ...... नित्य गौ दान करते ..........सुवर्ण दान करते ...... भूमि दान करते .... विप्रों को भोजन कराते ............. और उनके चरणों की धूल माथे से लगाते ......पर नही माँगा नन्द राय नें कि हमारे पुत्र हो ।
पर आस्तित्व में कुछ घटनाएँ घटनें लगी थीं.........जो अद्भुत थीं ।
क्रमशः
*जय श्री कृष्ण*
. *श्री राधा लीलामृतम् भाग १* *श्रीराधा कृष्ण चरित्र - भाग १*
ओह ! ये क्या ! ये बृज है ? ये मेरे भगवान श्रीकृष्ण का बृज ?
करील के काँटे ! ये भी सूख गए हैं......यहाँ कोई भी तो नही है ।
*क्या क्या सोचकर चले थे द्वारिका से ये वज्रनाभ ..बृज की ओर ।*
*ये वज्रनाभ श्रीकृष्ण के प्रपौत्र हैं* .....हाँ हाँ द्वारकेश श्रीकृष्ण के ।
सब नष्ट हो गया द्वारिका में तो ........यदुवंशी आपस में ही लड़ भिड़ कर मर रहे थे ........जब उनके पास कोई अस्त्र न बचा तो उठा लिया था सबों नें उस नुकीले घास को .......जो समुद्र के किनारे थे ।
ओह ! कितना भीषण युद्ध था आपस में ही .......सब मर रहे थे ....और उधर समुद्र में सुनामी आरही थी .....द्वारिका टेढ़ा हो रहा था।
चारों ओर मृत शरीर पड़े थे यदुवंशियों के .........*पर उसी समय ये बात जब सुनी श्रीकृष्ण की रानियों नें.........कि श्रीकृष्ण के चरणों में किसी व्याध नें बाण मार दिया और श्रीकृष्ण चले गए अपनें धाम ....।*
*_महारानी रुक्मणि सहित अष्टपटरानियों नें अपनें देह तुरन्त त्याग दिए ।_*
सौ रानियों के प्राण विरह से निकल गए ...............
अब बची थीं ............सोलह हजार रानियाँ ।
_द्वारिका डूब रही थी .........*द्वारकेश कृष्ण* नें ही जब अपनी लीला समेट ली तो द्वारिका का अधिदैव भी अब क्यों रहनें लगा यहाँ ।_
उस समुद्र की महाभीषण सुनामी में द्वारिका डूब गयी ।
पर *अनिरुद्ध पुत्र वज्रनाभ* बच गए ...................
क्यों बचे ? कारण क्या था ?
कारण ये था ?..............
*कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ था श्रीराधा रानी का श्रीकृष्ण से ..........*
सौ वर्ष के बाद दोनों मिले थे ...........ओह ! सौ वर्ष का वियोग !
पर आज जब मिले ......तब श्रीकृष्ण के नेत्रों से अश्रु रुक ही नही रहे थे .....अपने मुकुट को रख दिया था श्रीराधिका के चरणों में ...........
उठाना चाहा उन प्रेममयी श्रीराधा नें ..........पर श्रीकृष्ण उठे नही ।
प्यारे ! क्या चाहते हो ? बोलो तो !
ये राधा सब कुछ सह सकती है पर तुम्हारा इस तरह रोना, व्याकुल होना ........फिर श्री कृष्ण के आँसू पोंछते हुये श्रीराधा नें कहा ......
"इन पर राधा का हक़ है .......इन आँसुओं को बहानें का हक़ सिर्फ राधा को है तुम्हे नही .......कम से कम मुझसे ये हक़ तो मत छीनों ।
*अच्छा ! बताओ........क्या दे सकती हूँ मैं तुम्हे ? ये बरसानें वाली क्या दे सकती है एक द्वारिकाधीश को ?*
"अपनें इन चरणों को एक बार द्वारिका में रख दो"।
*झोली के रूप में .अपनी पीताम्बरी फैला दी थी कृष्ण नें।*
नही ......नही प्यारे ! ऐसा मत कहो ........कुरुक्षेत्र में भी मैं सिर्फ तुम्हें देखनें आयी हूँ .....नही तो - बृज छोड़नें कि अब इच्छा नही होती ।
तो मेरे कहनें से कुछ दिन मेरी द्वारिका में वास करो ना राधे !
जिद्द न करो प्यारे !
बस कुछ दिन ! अनुनय विनय पर उतर आये थे श्री कृष्ण भी ।
*"ठीक है"..........राधा की अपनी इच्छा ही कहाँ है ..........तेरी इच्छा में ही तो राधा नें अपनी समस्त इच्छाएं मिटा दी हैं ।*
श्रीराधा कुरुक्षेत्र से ही अपनी अष्टसखियों के साथ द्वारिका चली गयीं .........पर नही रहीं ये महल में .........कृष्ण की पटरानियों नें सुन्दर भवन में व्यवस्था की थी श्रीराधारानी की ......पर ये महल में ?
"हम तो वन में रहनें वाली हैं ..........हमें महल में क्यों ?
हम तो कुटिया में रहेंगी " ।
नही स्वीकारा श्रीराधा नें द्वारिकाधीश का वो सुवर्ण महल .......और कुछ दिन रहीं कुटिया में........दूर कुटिया में .........अपनें प्रियतम के गृहस्थ जीवन से दूर......उनके "द्वारकेश जीवन" की चकाचौंध से दूर ।
उस समय कृष्ण की महारानी जाम्बवती नें बहुत सेवा की श्रीराधा रानी की.......वैसे ये संकोच की मूर्ति श्रीराधा किसी से सेवा क्या लेंगीं .....पर हर समय ख्याल रखना......ये सब जाम्बवती नें ही किया .....उस समय जाम्बवती के साथ ये बालक ........वज्रनाभ आता था ....इसी *बालक वज्रनाभ नें श्रीराधा रानी के चरणों में वही चिन्ह देखे थे ......जो श्रीकृष्ण के चरणों में भी थे।*
ये *बालक वज्रनाभ .............वहीं बैठे " श्रीराधा राधा राधा राधा" ......यही जपना आरम्भ कर देता* ............
अरे ! वत्स ! क्यों मेरा नाम लेते हो ........अपनें "द्वारकेश" का नाम लो ।
पर बालक वही नाम जपता था ...............एक दिन बड़े प्रेम से अपनी गोद में बिठाकर श्रीराधा रानी नें पूछा ......अच्छा ! क्या चाहते हो ?
*आपका बृजमण्डल ........ आपका श्रीधाम वृन्दावन* ......
बालक नें यही मांगा था ।
मुस्कुराईं श्रीराधिका ........ठीक है तुम आजाओ मेरे बृजमण्डल ।
*वृन्दावनेश्वरी की आज्ञा ........... उनका वरदान प्राप्त हो गया था ...... इसीलिए तो बच गए थे ये वज्रनाभ।*
और आज जब समुद्र में समा गयी द्वारिका तब कुछेक के साथ वज्रनाभ ......और उनकी माताएँ ......सोलह हजार ओह !
चल पड़े थे बृज मण्डल की ओर द्वारिका से , साथ में अपनी उन माताओं को लेकर ........आ पहुँचे बृजमण्डल में .........पर यहाँ तो कुछ नही था ।...…............
सोलह हजार कृष्ण पत्नियाँ साथ में हैं .............. वज्रनाभ नें उनके लिये कुछ व्यवस्था की ....... कुछ सुन्दर भवन बनवाये.. ...पास में ही हस्तिनापुर राज्य था ( दिल्ली) जहाँ से सेवकों कि भरमार आ गयी थी ....... अब सब व्यवस्थित हो गया था ....।
ओह ! ऐसा हो गया ये बृज मण्डल ! ..........मनुष्य तो दिखाई दे ही नही रहे ......... पर पशु पक्षी भी नही हैं यहाँ तो .............
*वज्रनाभ* !
अत्यन्त मधुर पुकार पीछे से किसी नें लगाई ।
जैसे ही पीछे मुड़कर देखा वज्रनाभ नें ...........तात परीक्षित ! तुरन्त झुक कर वज्रनाभ ने प्रणाम किया।
*अपनें हृदय से लगा लिया था वज्रनाभ को राजा परीक्षित नें ।*
कोई नही हैं तात ! इस बृजमण्डल में ?
मानव की कौन कहे, कोई खग जीव भी दिखाई नही देते ........
अत्यन्त दुखित स्वर में हस्तिनापुर नरेश परीक्षित से वज्रनाभ नें कहा ।
*_सन्ध्या का समय हो रहा था ............ तभी दूर, बहुत दूर एक दीया टिमटिमाता हुआ दिखाई दिया ............_*..
कुटी थी कोई......... उस कुटी में एक ऋषि बैठे तप कर रहे थे ।
ऋषि तेजस्वी थे......... सफेद दाढ़ी उनके मुख मण्डल की शोभा और बढ़ा रही थी ......... श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा .........।
*ब्रजेश्वरी श्रीराधा का नाम उनके रोम रोम से निकल रहा था* ...........
वज्रनाभ और परीक्षित नें ऋषि के चरणों में जाकर जैसे ही प्रणाम किया .........ऋषि नें नेत्र खोले ...........मुस्कुराये ।
क्रमशः
*श्री राधे राधे*
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