Shri Ganpati Math
आत्मलिंगम सन्निधि और सलंग्न श्री उच्चिष्ठ गणपति साधना पीठ :
प्राचीन गणपति संप्रदाय और उसके अधिपति श्री गणपति के विविध रूपों की साधना और उससे संलग्न तंत्र , मंत्र और यंत्र के प्राचीन ज्ञान को संजोने प्रचार और प्रसार करने के लिए उभारा गया एक स्थान ।
श्री कामाख्या अम्बुबाची प्रवृत्त और निवृत्त काल समय की सूचना दी जा चुकी है। साधकों और देवी साधना में लिप्त सभी को यह समय में अनुष्ठान प्रारंभ करने चाहिए। महाविद्या साधना करने वाले साधकों को यह समय के दौरान अखंड या पांच अनुष्ठानों को करना चाहिए, अन्य साधकों के अपनी साधना का एक लघु पुरश्चरण करना चाहिए।
जय गणपति 🚩 #कामाख्या
18/06/2026
श्री शेषात्मज विनायक चतुर्थी
यदा यदा हि धर्मस्य.... गणेशवतार 🚩
प्रणाम, आप सभी ने गीता ने भगवान श्री कृष्ण द्वारा पार्थ को दिए गए उपदेश में यह श्लोक तो सुना ही होगा...समान रूप में गणेश पुराण वर्णन करता है के....
"जब-जब आसुरी शक्तियोंके प्रबल होनेसे जन-जीवन कण्टकाकीर्ण हो जाता है, निर्दय दैत्य सत्त्वगुण-सम्पन्न सुर-समुदायका सर्वस्व हरणकर निरन्तर उन्हें पीड़ित करते हैं, धराधामपर सर्वत्र अनीति, अनाचार और दुराचारका साम्राज्य स्थापित हो जाता है, धर्मका ह्रास एवं अधर्मकी वृद्धि होने लगती है, तब-तब मंगल-मोद-निधान श्रीगणेशजी भू-भार-हरणार्थ अवतार ग्रहण करते हैं। वे गुणतत्त्वविवेचक आदिदेव गजमुख दैत्योंका विनाश कर देवताओंका अपहृत अधिकार उन्हें लौटाते हैं तथा प्रत्येक रीतिसे सद्धर्मकी स्थापना करते हैं, जिससे समस्त प्राणियोंको सुख-शान्तिकी अनुभूति होती है।"
प्रत्येक युगमें उन महामहिम प्रभुके नाम, वाहन, गुण, लीला और कर्म आदि पृथक् पृथक् होते हैं तथा उनके द्वारा जिन दैत्योंका संहार होता है, वे भी भिन्न-भिन्न ही होते हैं।
कृतयुगमें ये परमप्रभु गजानन सिंहारूढ 'महोत्कट विनायक' के नामसे प्रख्यात हुए, उन महातेजस्वी प्रभुके दस भुजाएँ थीं; त्रेतामें ये मंगल-मोद-प्रदाता गणेश मयूरारूढ 'मयूरेश्वर' के नामसे प्रसिद्ध हुए; उनकी कान्ति शुभ्र और भुजाएँ छः थीं; द्वापरमें मूषकवाहन शिवपुत्रकी 'गजानन' या 'गौरीपुत्र' के नामसे ख्याति हुई; उनकी अंग-कान्ति अरुण थी एवं उनके चार भुजाएँ थीं तथा कलिके अन्तमें ये धर्मरक्षक गजानन अश्वारोही 'धूम्रकेतु' के नामसे प्रसिद्ध होंगे, उनके दो भुजाएँ होंगी तथा उनकी अंग-कान्ति धूम्रवर्णकी होगी।
श्री गणेश पुराण के आधार पर श्री गणेश के विभिन्न अवतारों पे लिखा गया भाष्य। जय गणपति 🚩
#गणेश #वक्रतुंड #लंबोदर #गीता #श्रीकृष्ण
16/06/2026
📜 Strengthening the mission to preserve Bharat’s manuscript heritage.
In a significant step under the Gyan Bharatam Mission, the Government of NCT of Delhi has deployed 300 Urdu and Sanskrit teachers to support the identification, documentation, and preservation of invaluable manuscripts.
Their expertise will play a vital role in cataloguing manuscripts written in classical and traditional languages, many of which remain undiscovered and undocumented.
The Gyan Bharatam Mission continues its nationwide effort to identify and preserve over one crore manuscripts housed in libraries, museums, academic institutions, and private collections across India.
📰 Read the full report by The New Indian Express: https://www.newindianexpress.com/states/delhi/2026/Jun/14/delhi-deploys-300-urdu-and-sanskrit-teachers-for-gyan-bharatam-manuscript-preservation-mission
त्रिपुरा वध हेतु श्री गणेश स्तुति
|| रुद्रनाथ शंकर द्वारा त्रिपुर नाश के हेतु गणेश स्तुति ||
🚩🚩🛑🕉️भो भो न यावद्भगवन्नर्चितोऽसौ पुराणि जगदीशेश साम्प्रतं न विनायकः । हनिष्यति ॥🕉️🛑🚩🚩
(शिवपु०, रुद्रसं०, यु० खं० १०।६)
-'हे जगदीश ! हे भगवन्! जबतक आप विनायककी पूजा नहीं करेंगे, तबतक इन तीनों पुरोंको नष्ट नहीं कर सकेंगे।'
शिवपुराणके अनुसार तारकासुरके तुल्यबल तीन महान् पुत्र थे- तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष। इन तीनोंने कठोर तपसे विधाताको संतुष्ट करके अपने-अपने लिये क्रमशः सुवर्ण, रजत एवं वज्रतुल्य लौह पुरोंको प्राप्त किया था। वे तीनों पुर एक सहस्र वर्षोंके बाद मध्याह्नमें अभिजित् मुहूर्तमें एक स्थानपर स्थित होते थे
शिवपुराणमें कथा आती है कि असुरोंसे पूर्ण त्रिपुरको भस्म करनेके लिये कामारि शम्भुने शर-संधान किया। धनुषको दृढ़तासे धारण किये रणकर्कश शिव लक्ष्यपर दृष्टि गड़ाये एक लाख वर्षतक अडिग खड़े रहे, किंतु त्रिपुरपर लक्ष्य स्थिर नहीं हुआ। उस समय देवत्राता शिवने आकाशवाणी सुनी - जो उपरोक्त श्लोक के द्वारा गणेश पूजन करने का आव्हान कर रही थी !
तब अन्धकासुरसंहारी त्रिलोचनने आदिमया भद्रकालीको बुलाकर गणेशजीकी पूजा की, भगवान् पशुपतिकी हर्षपूरित पूजासे विनायक संतुष्ट हुए, तब लोकनाथ हरने महात्मा तारकपुत्रोंके तीनों पुरोंको देखा। तब उन्होंने अभिजित् मुहूर्तमें अपने अद्भुत धनुषकी प्रत्यंचाको खींचा। उससे अत्यन्त भयानक शब्द हुआ। देवदेव शिवने असुरोंको अपना नाम सुनाते हुए कोटिसूर्यसमप्रभ उग्र शर छोड़ दिया। उक्त परम तेजस्वी अग्नितुल्य दहकते हुए तीक्ष्ण शरके स्पर्शसे | समस्त दैत्योंसहित त्रिपुर भस्म हो गया। शिवपुराण में उक्त श्लोकों के माध्यम से आप इस कथा का संस्कृत वर्णन पढ़ सकते है।
🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑
एतच्छ्रुत्वातु वचनं गजवक्त्रमपूजयत् । भद्रकालीं समाहूय ततोऽन्धकनिषूदनः ॥
तस्मिन् सम्पूजिते हर्षात् परितुष्टे पुरस्सरे । विनायके ततो व्योम्नि ददर्श भगवान् हरः ॥ पुराणि त्रीणि दैत्यानां तारकाणां महात्मनाम् ।
(शिवपु०, रुद्रसं०, यु० खं० १०।७-९)
अभिलाख्यमुहूर्ते तु विकृष्य धनुरद्भुतम् । कृत्वा ज्यातलनिर्घोषं नादमत्यन्तदुस्सहम् ॥ आत्मनो नाम विश्राव्य समाभाष्य महासुरान् । मार्तण्डकोटिवपुषं काण्डमुग्रं मुमोच ह॥
(शिवपु०, रुद्रसं०, यु० खं० १०। २५-२६)
#शिव #शिवपार्वती #शिवशंकर #गणेश #युद्ध #तारकासुर
16/06/2026
15/06/2026
|| Spiritual Poverty ||
Lately, the older segment of the younger generation—those around thirty years of age—has begun to lean heavily towards spirituality. It is surprising to see this sudden gravitation of this specific age group toward the spiritual realm; India had not witnessed such a trend before. What is the reason for this? Today, despite being materially prosperous and having access to a multitude of options—social media, financial and social security, and a lifestyle of unfettered freedom—is it truly normal for the new generation to be so spiritual? The sight of so many young people undertaking arduous pilgrimages like the trek to Kedarnath, flocking to the mountains, and attempting—albeit sometimes misguidedly—to live life authentically, is a phenomenon that baffles many.
Sociologist Rolf Dobelli believes that humans have always strived to secure the highest status within their social groups since the dawn of evolution. In modern times, this status is defined by material wealth. When a materially prosperous individual catches the eye of another in their circle, the latter often feels their own security threatened, unconsciously giving rise to jealousy. They come to view material comforts as their entitlement. A few years ago, a detergent advertisement became immensely popular with the tagline: "Why is the person across from me wearing a shirt whiter than mine?"
If, despite an abundance of comforts, the fires of jealousy and sorrow continue to burn within, it implies that while material prosperity has grown, 'spiritual poverty' has spread alongside it. To break free from this cultural malaise, one should not measure oneself against friends, relatives, or loved ones. Instead, the comparison should be between who you were yesterday and who you are today—and how much you have evolved through God's grace.
We must align ourselves with a renewed vision and version of our own selves as time passes; if you constantly compare your standing with that of others, you will inevitably find someone who surpasses you in one aspect or another...!
- Dr. Kushaan
15/06/2026
|| आध्यत्मिक दरिद्रता ||
आज कल की पुरानी पीढ़ी यानी के तीस बत्तीसी के आसपास के लोग काफी स्पिरिचुअल होने लगे है, यह एक आश्चर्य की बात है के यह पीढ़ी और यह उम्र के लोगो का अचानक आध्यात्मिकता की ओर खिंचाव...यह ट्रेंड भारत ने इसके पहले नही देखा था उसका कारण क्या है ?? आज जब के भौतिक रूप से हम ज्यादा समृद्ध है, करने के लिए बहुत कुछ उपलब्ध है, सोशल मीडिया, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा और स्वछंद बर्ताव के बावजूद नई पीढ़ी का इतना आध्यात्मिक होना क्या वास्तव में सामान्य है ? केदारनाथ जैसे अंतिम स्वर्गारोहिणी की यात्रा पे यूथ का ज्यादा होना, पहाड़ों की ओर भागना और जीवन को सही रूप में जीने के गलत प्रयास करने का यह बिहेवियर आज कई लोगो के समझ के बाहर है,
समाजशास्त्री रॉल्फ़ डोबेले का मानना है कि इंसान विकास के समय से ही अपने समूह में सबसे ऊँचा स्थान पाने की कोशिश करता रहा है। आज के समय में, यह स्थान भौतिक संपत्ति से तय होता है। जैसे ही कोई भौतिक रूप से खुशहाल व्यक्ति अपने समूह के किसी दूसरे व्यक्ति की नज़र में आता है, तो उसकी सुरक्षा को खतरा महसूस होता है और अनजाने में ही मन में जलन पैदा हो जाती है। वह भौतिक सुख-सुविधाओं को अपना अधिकार मानता है। कुछ साल पहले साबुन पाउडर का एक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसमें कहा गया था, "आपके सामने वाले व्यक्ति की शर्ट मेरी शर्ट से ज़्यादा सफ़ेद क्यों है?"
अगर इतनी सुख-सुविधाओं के बावजूद मन में जलन और दुख की आग जल रही है, तो इसका मतलब है कि भौतिक समृद्धि तो बढ़ी है, लेकिन 'आध्यात्मिक गरीबी' भी फैल गई है। इस सांस्कृतिक बीमारी से बाहर निकलने के लिए, आपका मुकाबला आपके दोस्तों, रिश्तेदारों या अपनों से नहीं मगर पिछले कल में आपकी स्थिति क्या थी और आज आपकी स्थिति क्या है, और ईश्वर कृपा से उसमे कितना बदलाव आया है उससे मुकाबला होना चाहिए,
समय के साथ हमारे अपने आप के नए विजन और वर्जन के साथ होना चाहिए, अगर आप दूसरों एसएलकेई स्तर से अपने स्तर का मुकाबला करेंगे तो वह आप को कभी न कभी किसी न किसी चीज में अपने से बेहतर ही मिलेंगे....!
15/06/2026
🕉️"गणेशोत्तरतापिनीयोपनिषद्"🕉️ में श्री गणेश के आदि रूप का वर्णन
'अप्राप्यमप्राप्यं च अज्ञेयं चाज्ञेयं च ।
विकल्पासहिष्णु तच्छक्तिकं गजवक्त्रं
गजाकारं जगदेवावरुन्धे।' (३)
अर्थात्- 'जो मनोगतिशून्य है, अर्थात् जिसे मनसे न जाना जा सके, जो अज्ञेय है, अर्थात् जिसे वाणीके द्वारा भी व्यक्त न किया जा सके तथा जो निर्गुण होनेसे विकल्पशून्य है, वह निरुपाधिक मायासे युक्त है। उनका गजाकार स्थूल और गजवक्त्र महान् शक्तिका द्योतक है, जिसने जगत्को धारण कर रखा है।
" कितना विशाल वर्णन है, हमारे कई अलग अलग शास्त्रों, टीकाओ और उपनिषदों में श्री गणपति महात्म्य का निरूपण किया गया है। आज डिजिटल युग में भी हम उन विशाल ज्ञान भंडारों को पूरी तरह से समझने और जानने में निष्फल रहे है।"
गणपति मठ को गुप्तता से बाहर ला कर समाज के बीच में श्री गणपति की तांत्रिक साधनाओं का परिचय करवाने का यह भागीरथ कार्य हाथ में लेने के बाद से ही समाज में फैली भ्रांतियां और पाखंड से परिचय हुआ, हजारों साल पहले लिखे गए "गणेशोत्तरतापिनीयोपनिषद्" में श्री गणपति को मनोगती शून्य और अज्ञेय कहा गया है, जिनको जानने और समझने के लिए मन की गति और बुद्धि भी शून्य के समान हो उसको सिद्ध करने का या उनको प्राप्त करने का विचार करना भी मूर्खता है। लेकिन शायद यही विचार में मुक्ति का मार्ग भी है। तंत्र से अपेक्षा भले ही धन, इच्छापूर्ति और शत्रुणाश की ही की जाती है लेकिन असल में तंत्र साधना आपको मुक्ति का मार्ग देने का एक साधन है। मनोगति का शून्य हो जाना ही गणपति तत्व को प्राप्त कर लेना है। उनको समझने से ज्यादा उनमें मिल जाना ही गणपति तत्व की प्रधानता दर्शाता है।
जय गणपति 🚩🚩
#गणपतितंत्र #गणेश #अर्थसंपन्न #अर्थतन्त्र #तंत्र #ज्ञान #बुद्धि #उपनिषद
15/06/2026
🛑🛑 महत्वपूर्ण सूचना 🛑🛑
माँ कामाख्या मंदिर दर्शन हेतु दिनांक 15/06/2016, सोमवार से माँ कामाख्या मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए कामाख्या देवालय प्रबंधन समिति द्वारा केवल दो प्रकार की व्यवस्था लागू की गई है।
निःशुल्क जनरल कूपन – जैसा पहले से उपलब्ध था, वैसे ही सभी श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क रहेगा।
₹501 का वीआईपी टिकट – यह टिकट केवल ऑनलाइन माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकेगा।
इन दोनों व्यवस्थाओं के अतिरिक्त कोई अन्य नियम या विशेष व्यवस्था लागू नहीं होगी। अतः माँ कामाख्या के दर्शन के लिए आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को या तो जनरल कूपन प्राप्त कर सामान्य कतार में लगकर दर्शन करना होगा, अथवा ₹501 का वीआईपी टिकट ऑनलाइन अग्रिम रूप से बुक कराकर दर्शन करना होगा।
सभी श्रद्धालुओं से अनुरोध है कि किसी भी भ्रामक सूचना पर विश्वास न करें और केवल आधिकारिक व्यवस्था का ही पालन करें।
जय माँ कामाख्या।
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Website
Address
Mumbai
401105