Rashi Library
11/10/2017
Summary of the Book
चैतन्याचा आणि मांगल्याचा सण म्हणजे दिवाळी. दिवाळीच्या स्वागताची तयारीही उत्साहाने केली जाते. वसुबारसेपासून सुरु होणाऱ्या दिवाळीची तयारी करण्यासाठी ही दोन्ही पुस्तके उपयुक्त ठरावीत. पहिल्या पुस्तकात दिवाळीच्या प्रथांपासून फराळ आणि पारंपारिक पदार्थांची माहिती दिली आहे. एवढेच नव्हे, तर आकाशकंदील कसे बनवायचे, मेंदी कशी रेखायची, रांगोळी कशी काढायची अन् किल्ला कसा बनवायचा याविषयी सल्लाही दिला आहे.
दुसऱ्या पुस्तकात वासंती काळे यांनी ५० प्रकारच्या लाडूंच्या कृती दिल्या आहेत. नेहमीच्या लाडवांबरोबरच मटकीचे, शेवेचे, ब्रेडचे लाडू कसे बनवायचे ते त्यातून समजते. उपवासाचे लाडू हा खास विभाग आहे. याशिवाय महत्वाचे म्हणजे प्रारंभी लाडूसाठी पाक कसा बनवायचा, तो बिघडू नये यासाठी काय करायचे याचे मार्गदर्शन केले आहे.
महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले के एक गांव में चांदभाई रहते थे, जिन्हें सब पाटिल कहते थे। एक दिन उनका घोड़ा खो गया। वे उसे ढ़ूंढ़ते रहे। इतने में देखा कि फकीर की वेशभूषा में सोलह साल का एक तरुण खड़ा है।
चांदभाई को देखते ही उसने पुकारा, ‘क्यों चांद पाटिल! आपका घोड़ा गुम हो गया है न?’ ‘हां, उसे ही तो ढ़ूंढ़ रहा हूं,’ चांदभाई ने कहा। लेकिन वे हतप्रभ थे कि यह लड़का उनका नाम कैसे जानता है? इसने कैसे जाना कि मेरा घोड़ा खो गया है? उस तरुण फकीर ने उनसे कहा, ‘उस पहाड़ी के पीछे एक बाड़ा है। वहीं आपका घोड़ा घास चर रहा है।’ चांद पाटिल वहां पहुंचे तो देखा घोड़ा सचमुच उसी बाड़े में चर रहा था। वह अपने घोड़े के साथ घर लौट गए, पर फकीर के व्यक्तित्व ने उन्हें गहरे प्रभावित किया था।
तब से उस तरुण फकीर की चर्चा उस पूरे इलाके में फैलने लगी। संयोग की बात चांदभाई के घर में ही किसी का विवाह था। बारात औरंगाबाद से शिरडी जानी थी। बारात के साथ वह सोलह वर्षीय तरुण फकीर भी चल दिया। शिरडी में खंडोबादेव का मंदिर आज भी है। उस मंदिर के पुजारी म्हालसापति थे। उन्होंने उस सोलह साल के फकीर को देखते ही उसका स्वागत किया, ‘आओ साई!’ वह फकीर तब से वहीं रहने लगा।
किसी को पता नहीं कि उस तरुण के माता-पिता कौन हैं, उसका जन्म कब और कहां हुआ, वह हिंदू है या मुसलमान। लेकिन वह मस्जिद में रहता था और मंदिर में भी। शिरडीवासी समझ चुके थे कि वह फकीर सही मायनों में हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर है। कोई पूजा करे या नमाज पढ़े, उनकी नजरों में कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह कहता - ईश्वर, अल्लाह अलग नहीं हैं। सबका मालिक एक है। यही चमत्कारी तरुण फकीर आगे चलकर शिरडी के साईं बाबा कहलाए।
मां का विश्वास
थॉमस अल्वा एडिसन प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन स्कूल में टीचर ने एडिसन को एक मुड़ा हुआ कागज दिया और कहा कि यह ले जाकर अपनी मां को दे देना। एडिसन घर आए और अपनी मां को वह कागज देते हुए कहा, 'टीचर ने यह आपको देने को कहा है।' मां ने वह कागज हाथ में लिया और पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। एडिसन ने मां से पूछा, 'इसमें क्या लिखा है मां? यह पढ़कर तुम रो क्यों रही हो?' आंसू पोंछते हुए मां ने कहा, 'इसमें लिखा है कि आपका बेटा बहुत होशियार है और हमारा स्कूल नीचे स्तर का है। यहां अध्यापक भी बहुत शिक्षित नहीं हैं। इसलिए हम इसे नहीं पढ़ा सकते। इसे अब आप स्वयं शिक्षा दें।' उस दिन के बाद से मां खुद उन्हें पढ़ाने लगीं और मां के मार्गदर्शन में एडिसन पढ़ते-सीखते रहे। कई वर्षों बाद मां गुजर गई। मगर तब तक एडिसन प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन चुके थे और उन्होंने फोनोग्राफ और इलेक्ट्रिक बल्व जैसे कई महान अविष्कार कर लिए थे। एक दिन फुरसत के क्षणों में वह अपने पुरानी यादगार वस्तुओं को देख रहे थे। तभी उन्होंने आलमारी के एक कोने में एक पुराना खत देखा और उत्सुकतावश उसे खोलकर पढ़ने लगे। यह वही खत था जो बचपन में एडिसन के शिक्षक ने उन्हें दिया था। उन्हें याद था कि कैसे स्कूल में ही उन्हें अत्यधिक होशियार घोषित कर दिया गया था। मगर पत्र पढ़ कर एडिसन अचंभे में पड़ गए। उस पत्र में लिखा था, 'आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर है। इसलिए उसे अब स्कूल ना भेजें।' अचानक एडिसन की आंखों से आंसू झरने लगे। वह घंटों रोते रहे और फिर अपनी डायरी में लिखा, 'एक महान मां ने बौद्धिक तौर पर काफी कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया।'
ेपठान का खाना
लंबे समय तक पठानों को लेकर यह आम राय बनी हुई थी कि यह लड़ाकू लोगों का झुंड है। ये लोग लड़ते वक्त इंसान और इंसानियत को भूल जाते हैं। पठानों में ताकत ही दर्जे तय करती है। इनका बदला जितना खूंखार होगा उतना ही इनकी ताकत के ढोल बजेंगे। तब किसने सोचा था कि कोई आएगा और इन्हें लड़ाई-झगड़ों के रास्ते से इतर शांति और सेवा की पगडंडियों पर ले जाएगा? इनमें मुल्क और माटी की सोंधी खुशबू भर देगा। यह काम किया खान अब्दुल गफ्फार खान ने। हर कबीले के पठानों को इकट्ठा करके शांति, सद्भावना और प्रेम के लिए संगठित करके उन्होंने 'खुदाई खिदमतगार' की नींव रखी। हर एक पर हाथ उठा लेने वाले पठान जबसे खुदाई खिदमतगार बने, तबसे उनका हर विरोध अहिंसा की राह होकर जाने लगा। अंग्रेजों की लाठियों से इनके सिर से खून की धार बह उठती, फिर भी खान बाबा के ये अनुशासित सिपाही गांधी मार्ग से नहीं डिगते। बादशाह खान इकलौते शख्स थे जिन्हें महात्मा गांधी की जिंदगी में ही दूसरा गांधी कहा जाने लगा। सरहदी गांधी के नाम से मशहूर बादशाह खान के बहुत से दिलचस्प किस्से हैं। एक बार जब वह गांधी जी के पास रुकने आए तो गांधी जी फिक्र में थे कि अपने इस पख्तून पठान को खाने में गोश्त कैसे दें। आश्रम में मांसाहार वर्जित था। फिर भी गांधी जी खुद खान साहब के लिए गोश्त पकाने को तैयार हो गए। तब बादशाह खान बोल उठे, 'वाह बापू, एक पठान के लिए आप आश्रम का नियम तोड़ सकते हैं तो एक पठान क्या एक वक्त अपना खाना नहीं छोड़ सकता?' आज उन्हीं बादशाह खान की पुण्यतिथि है। गांधी जी अपने इस पठान साथी के लिए खुद वुजू का पानी रखते, जानमाज बिछाते, तो यह अफगानी पठान भी गांधी की प्रार्थना सभा में सबसे ऊंची आवाज में भजन गाता। बादशाह खान जैसे लोगों ने प्रेम, समर्पण और त्याग से देश की नींव को मजबूत बनाया।
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