Multai meri JAAN

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26/05/2026

मंत्री जी आए और चले गए, ताप्ती सरोवर की समस्या जस की तस। (अक्षय सोनी जी पत्रकार)
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Photos from Multai meri JAAN's post 24/05/2026

मां ताप्ती के उद्गम स्थल के प्रति शासन का रवैया — आस्था और संवेदनाओं का प्रश्न
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण स्थिति है कि जिस पवित्र नगरी को शासन स्वयं “ताप्ती नगरी” और धार्मिक आस्था का केंद्र मानता है, वहीं मां ताप्ती के उद्गम स्थल में आने वाले प्रमुख जलमार्ग को “नाला” कहकर संबोधित किया जा रहा है। यह केवल एक शब्द का विषय नहीं है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा प्रश्न है।
मां ताप्ती केवल एक नदी नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और सनातन संस्कृति की जीवंत प्रतीक हैं। जिस जलधारा से ताप्ती सरोवर का अस्तित्व बना हुआ है, उसे यदि शासन द्वारा नाला बताया जाता है, तो यह सीधे तौर पर उस पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा प्रतीत होता है, जिसे वर्षों से श्रद्धालु पूजते आए हैं।
ताप्ती भक्तों का मानना है कि उद्गम स्थल से जुड़ा प्रत्येक जलमार्ग धार्मिक दृष्टि से पवित्र है। ऐसे में प्रशासनिक दस्तावेजों या योजनाओं में उसे “नाला” कहना लोगों की भावनाओं को आहत करता है। श्रद्धालु स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, क्योंकि एक ओर शासन ताप्ती नगरी को पवित्र नगरी का दर्जा देकर धार्मिक महत्व का प्रचार करता है, वहीं दूसरी ओर उसी पवित्र धारा को सामान्य नाले की श्रेणी में रख देता है।
यह मामला केवल नामकरण का नहीं, बल्कि सोच और संवेदनशीलता का भी है। यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़े प्राकृतिक जलस्रोत को केवल तकनीकी दृष्टि से देखा जाएगा, तो लोगों में यह संदेश जाएगा कि शासन आस्था की गरिमा को समझने में असफल हो रहा है। धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के प्रति प्रशासनिक भाषा में भी सम्मान और संवेदनशीलता झलकना आवश्यक है।
स्थानीय नागरिकों और ताप्ती भक्तों का कहना है कि जिस जलमार्ग से ताप्ती सरोवर तक जल पहुंचता है, उसे संरक्षित और पवित्र धारा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, न कि नाला बताकर उसकी धार्मिक महत्ता को कम किया जाए। यदि शासन वास्तव में ताप्ती नगरी की पवित्रता को सम्मान देना चाहता है, तो उसे इस विषय पर पुनर्विचार कर श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि आस्था और विकास के बीच संतुलन बनाएं। मां ताप्ती करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र हैं, इसलिए उनसे जुड़े हर स्थल, जलधारा और परंपरा के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। (चिंटू खन्ना जी, मुलताई।) 🙏🇮🇳
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22/05/2026

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Photos from Multai meri JAAN's post 17/05/2026

भूमिका: दहशत की रात और कांपती ताप्ती नगरी]

मुलताई। शनिवार की रात मुलताई के लिए किसी काली रात से कम नहीं थी। जब शहर नींद की आगोश में जाने की तैयारी कर रहा था, तब एक के बाद एक आए 5 भूकंपीय झटकों ने पूरे जिले में दहशत फैला दी।

मुलताई और बैतूल जिला भौगोलिक रूप से एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र पर स्थित है, जिसे विज्ञान की भाषा में 'सोन-नर्मदा-ताप्ती' (SONATA) लाइनमेंट कहा जाता है।

फॉल्ट लाइन की सक्रियता: यह भारत की एक प्रमुख 'फॉल्ट लाइन' (जमीन के नीचे की दरार) है। मुलताई इसी लाइन के ठीक ऊपर स्थित है। यहाँ की चट्टानें सदियों से तनाव में हैं।
माइग्रेशन पैटर्न: कल रात के झटकों ने दिखाया कि दरार के भीतर की हलचल उत्तर-पूर्व की ओर फैल रही है। 49 किमी से शुरू होकर 6 किमी तक आना इस बात का प्रमाण है कि मुलताई के ठीक नीचे की जमीन सुलग रही है।

[बड़ा सवाल: क्या 'शैतानी' ब्लास्टिंग ने बिगाड़ा खेल?]

नरखेड़ और मुलताई के बीच संचालित माइनिंग कंपनियों द्वारा की जा रही भारी ब्लास्टिंग इस आग में 'घी' का काम कर रही है।

ट्रिगर इफेक्ट (Trigger Effect): विज्ञान स्पष्ट कहता है कि 200-300 किलो बारूद का धमाका सीधे तौर पर इतना बड़ा भूकंप नहीं ला सकता, लेकिन अगर जमीन के नीचे की चट्टानें पहले से ही भारी तनाव (Stress) में हैं, तो ये धमाके 'ट्रिगर' का काम करते हैं। यानी, जो ऊर्जा प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे निकलती, उसे इन विस्फोटों ने अचानक बाहर धकेल दिया।

[प्रशासन से तीखे सवाल]

क्या प्रशासन ने इन भारी ब्लास्टिंग वाली कंपनियों को अनुमति देने से पहले कोई भूकंपीय सुरक्षा ऑडिट कराया था?
मुलताई की दहलीज तक पहुंचे इन झटकों के बाद भी विवादित कंपनियों की ब्लास्टिंग पर तत्काल रोक क्यों नहीं लगाई गई?
क्या जिम्मेदार विभाग किसी बड़ी जनहानि या मुलताई की तबाही का इंतजार कर रहा है?

भूकंप को समझने के लिए जमीन के नीचे की बनावट को समझना जरूरी है। हमारी धरती कई बड़ी 'टेक्टोनिक प्लेट्स' पर टिकी है।

चट्टानों का खिसकना: जमीन के नीचे मौजूद ये प्लेट्स या चट्टानें हमेशा गतिमान रहती हैं। जब ये आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे पर दबाव बनाती हैं, तो भारी मात्रा में ऊर्जा (Stress) जमा हो जाती है।

ऊर्जा का अचानक निकास: जब यह दबाव सहने की क्षमता खत्म हो जाती है, तो चट्टानें अचानक टूटती हैं और वह दबी हुई ऊर्जा तरंगों (Waves) के रूप में बाहर निकलती है। इसे ही हम भूकंप के झटके के रूप में महसूस करते हैं।🙏🇮🇳
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