Dilkash Daur
हम सब
एक इत्तिफ़ाक़ के
मुख़्तलिफ़ नाम हैं
मज़हब
मुल्क
ज़बान
इसी इत्तिफ़ाक़ की अन-गिनत कड़ियाँ हैं
अगर पैदाइश से पहले
इन्तिख़ाब की इजाज़त होती
तो कोई लड़का
अपने बाप के घर में पैदा होना पसंद नहीं करता
निदा फ़ाज़ली
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
मिरे हर अमल को सराह कर ये अज़िय्यतें न दिया करो
मिरी जान तुम भी अजीब हो तुम्हें रूठना भी तो चाहिए
अाग़ा सरोश
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
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