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*जागरण संपादकीय: लंबा खिंचता युद्ध*
अब जब सभी देश निष्प्रभावी दिख रहे हैं, तब फिर यह आवश्यक हो जाता है कि कहीं से कोई यह आवाज प्रबलता से उठे कि मानवता के हित में इस युद्ध का पटाक्षेप किया जाए। अच्छा होगा कि ऐसी आवाज उठाने का काम भारत करे।
अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध एक माह से जारी, संकट गहराया।
ट्रंप के शांति दावे झूठे, ईरान परमाणु केंद्र पर हमला।
भारत को मानवता के हित में युद्ध रोकने की पहल करनी चाहिए।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़े एक माह बीत चुका है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से खुद को शांति का मसीहा बताए जाने के बाद भी पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला यह खतरनाक सैन्य संघर्ष खत्म होने के बजाय और खिंचता ही दिख रहा है। इसका प्रमाण है अमेरिका की ओर से ईरान के परमाणु केंद्र को निशाना बनाना।
ईरान के इस्फहान स्थित परमाणु केंद्र पर अमेरिका ने एक ऐसे समय बंकर बस्टर बम गिराया, जब ट्रंप ईरानी नेताओं से शांति प्रस्ताव पर कथित तौर पर वार्ता भी कर रहे हैं। या तो वे झूठ बोल रहे हैं अथवा ईरान के साथ-साथ पश्चिम एशियाई देशों और विश्व के साथ भी छल कर रहे हैं। पश्चिम एशिया संकट का समाधान करने के मामले में उनका इरादा कुछ भी हो, वे बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं रह गए हैं।
इसी कारण अमेरिका में तो उनका विरोध बढ़ता ही जा रहा है, उनके मित्र देश और यहां तक कि नाटो राष्ट्र भी ईरान के खिलाफ युद्ध में उनका सहयोग करने को तैयार नहीं। अब यह भी स्पष्ट दिख रहा है कि ट्रंप ने बिना विचारे इजरायल संग ईरान पर हमला बोलकर अमेरिका और यूरोप समेत पूरे विश्व को संकट में डाल दिया। इसके भरे-पूरे आसार हैं कि अभी तक अपनी मनमानी करते चले आ रहे ट्रंप को इस बार अपने अहंकार की कीमत चुकानी पड़ेगी।
पश्चिम एशिया संकट जिस तरह गहराता चला जा रहा है और ट्रंप इस संकट के समक्ष जिस प्रकार असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं, उससे उनकी जगहंसाई तो हो ही रही है, अमेरिका की प्रतिष्ठा को चोट भी पहुंच रही है। यह सही समय है कि अमेरिका के नीति-नियंता और साथ ही वहां की जनता इस पर विचार करे कि उसने ट्रंप सरीखे अस्थिर प्रवृत्ति के व्यक्ति को राष्ट्रपति चुनकर क्या हासिल किया?
इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका के साथ इजरायल की रणनीति सवालों के घेरे में है, लेकिन इसके साथ ही ईरान के रवैये को भी सही नहीं कहा जा सकता। ईरान एक तरह से यही दिखा रहा है कि अमेरिका और इजरायल का सामना करने के क्रम में उसे अपनी बर्बादी की परवाह नहीं और उसकी प्राथमिकता ऊर्जा संकट को चरम पर ले जाना और अपने पड़ोसी देशों की नाक में दम करना है। शायद उसकी इसी नीति के कारण खाड़ी के देश नुकसान उठाने के बावजूद यह चाह रहे हैं कि ईरान किसी तरह पस्त हो जाए।
इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि विश्व के प्रमुख देश अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच के घमासान को रोकने के लिए गंभीरता से कोई ठोस पहल करते नहीं दिख रहे हैं। अब जब सभी देश निष्प्रभावी दिख रहे हैं, तब फिर यह आवश्यक हो जाता है कि कहीं से कोई यह आवाज प्रबलता से उठे कि मानवता के हित में इस युद्ध का पटाक्षेप किया जाए। अच्छा होगा कि ऐसी आवाज उठाने का काम भारत करे।
*संपादकीय: खतरे में ट्रंप की साख, युद्ध से निकलने का खोज रहे मौका*
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के साथ युद्ध से निकलने का मौका तलाश रहे हैं, लेकिन दोनों पक्षों की शर्तें न मानने के कारण संघर्ष जारी है। ईरान के हमलों से खाड़ी देश परेशान हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के बिजली और ऊर्जा ठिकानों को तबाह करने की धमकी देने के बाद पहले जिस तरह पांच दिन तक इन ठिकानों पर हमले टालने की घोषणा की और अब कहा कि कुछ और दिन की मोहलत दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि वे समझौते के मूड में आ गए हैं।
हालांकि रह-रहकर वे ईरान को धमकाते भी हैं, पर उन्होंने जिस तरह होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने के लिए भी समयसीमा बढ़ा दी, उससे यही लगता है कि वे किसी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहे हैं। उनके ऐसे संकेतों के बाद भी यह कहना कठिन है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा युद्ध थम जाएगा।
इसका कारण यह है कि ईरान बिना इस भरोसे अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं कि उस पर फिर हमला नहीं किया जाएगा। जिस तरह ईरान अमेरिका की युद्ध विराम संबंधी शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं हो सकता, वैसे ही अमेरिका और इजरायल के लिए भी उसकी शर्तें मानना संभव नहीं।
वास्तव में इसी कारण युद्ध थमता नहीं दिख रहा है। जहां इजरायल ईरान को निशाना बनाने में लगा हुआ है, वहीं ईरान उस पर हमले करने के साथ ही अपने पड़ोसी देशों पर मिसाइलें दाग रहा है। यह स्वाभाविक ही है कि इससे इन देशों का धैर्य जवाब दे रहा है। ये देश इसलिए अधिक परेशान हैं कि ईरान उनके नागरिक और ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बना रहा है।
यदि खाड़ी के देशों ने ईरान पर जवाबी हमले करने शुरू किए तो युद्ध एक नए मोड़ पर पहुंच जाएगा। निःसंदेह ऐसा न तो ट्रंप चाहेंगे और न ही विश्व के अन्य देश, क्योंकि ऊर्जा संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी चपेट में भारत समेत अन्य एशियाई देश ही नहीं, यूरोप और अमेरिका भी आ गए हैं।
इस ऊर्जा संकट के लिए प्रत्यक्ष रूप से तो ईरान जिम्मेदार है, जिसने होर्मुज जल मार्ग बाधित कर रखा है, पर परोक्ष जिम्मेदार अमेरिका ही है, जिसने बिना कुछ सोचे-समझे इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई से न केवल अमेरिका-इजरायल को तंग किया है, बल्कि पड़ोसी देशों को भी। यदि ईरान और अधिक समय तक जवाबी कार्रवाई करने में समर्थ बना रहता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति को अपना रुख और नरम करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।
इस स्थिति में उनका प्रभाव कम ही होगा-न केवल अमेरिका में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी। ध्यान रहे कि विश्वव्यापी ऊर्जा संकट के लिए वही जिम्मेदार माने जा रहे हैं और घरेलू स्तर पर भी उनका विरोध बढ़ रहा है। ईरान युद्ध के पहले उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला पर हमला किया और अपनी मनमानी टैरिफ नीति से अपने मित्र देशों समेत दुनिया भर को तंग किया, उसके चलते उनकी विश्वसनीयता और साख पहले ही कम हो चुकी है।
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