AmitVerma53

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12/05/2026

गांव के एक छोटे से मंदिर में माधव नाम का एक मूर्तिकार रहता था। माधव पत्थर तराशने में तो माहिर था ही, लेकिन उसका मन हमेशा कुछ ऐसा करने को बेताब रहता था जो दुनिया की नज़रों से छोटा हो, पर भक्ति में सबसे बड़ा।
एक सावन की सुबह, जब पूरा गांव बारिश की बूंदों से महक रहा था, माधव बेल के पेड़ के नीचे बैठा था। उसने एक कोमल सा बेलपत्र उठाया। उसकी आंखों में एक चमक आई। उसने अपनी बारीक छेनी और रंग उठाए और घंटों की एकाग्रता के बाद उस पत्ते पर कुछ उकेरा।
जब उसने अपनी हथेली खोली, तो गांव वाले दंग रह गए। उस नन्हे से बेलपत्र पर साक्षात भोलेनाथ विराजमान थे। वे ध्यान की मुद्रा में थे, शांत और सौम्य।
एक बुजुर्ग ने पूछा, "माधव, इतनी मेहनत इस एक पत्ते पर क्यों? यह तो कुछ दिनों में सूख जाएगा।"
माधव ने मुस्कुराकर जवाब दिया:
"भक्ति लंबी उम्र की मोहताज नहीं होती। जैसे महादेव एक लोटा जल और एक बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं, वैसे ही मेरी यह कला उस एक क्षण के लिए है जब कोई इसे देखे और उसके मुख से बस 'हर-हर महादेव' निकल जाए। श्रद्धा पत्ते के सूखने में नहीं, मन के भीगने में है।"
उस दिन पूरा गांव यह समझ गया कि ईश्वर को पाने के लिए बड़े मंदिरों की नहीं, बल्कि हथेली पर रखे एक छोटे से समर्पण की ज़रूरत होती है।

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