Comedy Hub
15/09/2022
25/06/2022
हां मैं ही कुम्हार हूँ। गांव के किनारे पर बसा छोटा संसार हूँ। हां मैं ही..............
तुम्हारे ही खेत से मिट्टी उठाता हूँ। फिर उसे जीवित करने की कोशिश करता हूँ। कलम की देवी की मूरत भी बनाता हूँ। अनपढ़ होकर भी समझदार हूँ। हां मै ही................
तेरे पनघट पर मेरी ही घरा उतरती है। आंगन के कोने में जो पानी से भरी रहती है। आषाढ़ में मेढ पर बिछती मृदाभार हूँ। हां मैं ही.............
चाक पर नाचती लोककला जब दुनिया तालियां बजाती है तब राष्ट्र को इक सम्मान दिलाता कलाकार हूँ। हां मैं ही...............
हाथी, घोड़ों के खिलौने बेचता हूँ। बचपन को धरती से जोड़ता है। छठ की घाट पर जलती दिया है मार हां में ही कुम्हार हूँ।
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Website
Address
Lucknow
226029