Prince Kumar Tiwari
22/11/2021
शीर्षक : बचपन
बचपन में हम महज़ 5 रपए की पतंग के पीछे पाँच किलोमीटर तक भागते थे , ना जाने कितनी चोटे लगती थी उस दरमियान...
वो पतंग भी हमें बहुत दौड़ाती थी...
आज मालूम होता है , दरअसल वो पतंग नहीं बल्कि एक चुनौती थी...क्योंकि अपनी ख़ुशियों को हांसिल करने के लिए दौड़ना पड़ता है , वो मुफ़्त में हरगिज़ नहीं मिलती...
शायद यही जिंदगी की रेस है...!
जब हमारा बचपन था तो जवानी एक सपना की तरह थी , लेकिन जब जवान हुए तो बचपन एक बीते हुए ज़माने की तरह लगने लगा...
जब घर में रहते थे तो आज़ादी अच्छी लगती थी , आज पूरी आज़ादी है , फिर भी घर जाने की चाह लगी रहती है...
कभी होटल में जाना पिज़्ज़ा , बर्गर खाना पसंद था , आज घर में सिर्फ़ अपनी मां के हाथ का खाना पसंद है...
स्कूल के दिनों में जिनके साथ अक़्सर झगड़ते थे , आज उनको ही इंटरनेट पर तलाशते हैं...
ख़ुशी किसमें होतीं है , ये पता अब चला है , बचपन क्या था ? इसका एहसास अब हुआ है...
काश ! बदल सकते हम ज़िंदगी के कुछ साल
काश ! जी सकते हम , ज़िंदगी फिर एक बार...!
23/09/2021
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