Gaur Rajput's -pamsa
शाहजहाँ ने अपने प्रिय पुत्र दारा के कहने पर औरंगजेब और मुराद को रोकने के लिए सेना भेजी। दोनों ब्रिगेडों को क्रमशः महाराजा जसवंत सिंह और कासिम खान के अधीन रखा गया। सेना ने 18 और 26 दिसंबर 1657 को आगरा छोड़ दिया ।
नर्मदा के तट पर लड़े गए धर्मतपुर के युद्ध में जसवंत सिंह ने औरंगजेब का विरोध किया था। यह युद्ध 15 अप्रैल 1658 को उज्जैन से पंद्रह मील दूर लड़ा गया था। जसवंत औरंगजेब पर हमला कर सकते थे लेकिन उन्होंने मुराद की सेनाओं को औरंगजेब में शामिल होने दिया। वह एक ही बार में दोनों मुगल राजकुमारों को हराना चाहते थे। हालांकि, देरी से औरंगजेब को फायदा हुआ। अब मुगल सेनापति कासिम खान, जिसे शाहजहाँ ने जसवंत की मदद के लिए भेजा था, को औरंगजेब ने अपने साथ शामिल होने के लिए राजी कर लिया। युद्ध शुरू होते ही कासिम खान ने दलबदल कर लिया। कोटा और बूंदी के मुकुंद सिंह हारा, दयाल दास झाला, राजगढ़ के अर्जुन गौड़ और रतलाम के रतन सिंह राठौर ने जसवंत की 30,000 राठौरों की सेना के साथ युद्ध के मैदान में बहादुरी से लड़ाई लड़ी "शाही राजकुमारों की अपार श्रेष्ठता के बावजूद, फ्रांसीसी सैनिकों द्वारा इस्तेमाल की गई कई तोपों की मदद से, रात ने ही राजपूतों के साहस के खिलाफ विज्ञान, संख्या और तोपखाने की प्रतियोगिता को रोक दिया"। युद्ध में दुर्गादास राठौर ने चार घोड़े बदले और घायल होने से पहले लगभग आधा दर्जन तलवारें खो दीं। संख्या विद्रोहियों के पक्ष में भारी थी। अंत में असमान मुकाबला विद्रोहियों की जीत के साथ समाप्त हुआ और औरंगजेब ने जीत की जगह का नाम फतेहाबाद रखा।
धरमत की जीत के बाद औरंगजेब आगे बढ़ा और 30 मई को सामूगढ़ में दारा को हरा दिया । उसने 8 जून 1958 को आगरा के किले पर कब्जा कर लिया और अपने पिता को पदच्युत कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। हार के बाद दारा मुल्तान और सिंध भाग गया। उसने दिल्ली की गद्दी के लिए नए सिरे से प्रयास किया और जसवंत सिंह के निमंत्रण पर फरवरी 1659 में अजमेर पहुंचा। औरंगजेब फतेहपुर के पास खजवा में शुजा से युद्ध करने के लिए व्यस्त था और अपनी राजधानी से दूर था। औरंगजेब अजमेर से चार मील दक्षिण में देवराई में दारा से मिलने के लिए वापस लौटा। जसवंत से क्रोधित होकर औरंगजेब ने मोहम्मद अमीर खान के नेतृत्व में दस हजार शाही सैनिकों की एक सेना तोपों और तोपखाने के साथ मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजी उन्होंने जयसिंह से जसवंत को मित्रता के लिए एक पत्र लिखने को कहा। जसवंत ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस बीच दारा युद्ध हार गया और केवल दो हज़ार अनुयायियों के साथ गुजरात की ओर पीछे हट गया। जयसिंह और बहादुर खान उसका पीछा करते हुए गए। जसवंत सिरोही से पहले जयसिंह के साथ मिल गया। गुजरात में सूखे के कारण दारा को कच्छ के रण के रास्ते सिंध भागने का समय मिल गया। दारा कंधार में सुरक्षित रहने के लिए जा रहा था, जब दादर के बलूच सरदार मलिक जीवन ने विश्वासघात करके दारा को पकड़ लिया और उसे जयसिंह को सौंप दिया। 10 नवंबर 1959 को जयसिंह की मध्यस्थता पर औरंगजेब ने जसवंत की महाराजा की उपाधि वापस कर दी।
सांस्कृतिक-झरोखा
‘सांगो’ई गौड़ सिरेह’
चलते चलते रात होने को आई थी | कवि ईसरदासजी गुजरात के नागरचाळा ग्राम में पहुँच गए थे | उन्होंने देखा गवाड़ में टाबर खेल रहे थे | एक किशोर से उन्होंने पूछा – यहाँ कोई राजपूत की कोटड़ी है ? किशोर ने ईसरदासजी की ओर देखा तथा उपहासात्मक लहजे में बोला – आगे सांगजी गौड़ की कोटड़ी है |
यह मध्यकाल की घटना है | दिल्ली में तब शेरशाह सूरी था और मारवाड़ में राव मालदेव | तब चारण रात्रि-विश्राम राजपूत के यहीं करते थे | चारणों को तब देवी-पुत्र कहते थे और राजपूत देवी उपासक थे | यह रिश्ता अटूट था | ईसरदासजी ने इसीलिए यहाँ कोई राजपूत की कोटड़ी है , पूछा था | कोटड़ी कोट-किले शब्द का ही छोटा रूप होता है, भले ही वह साधारण झोंपड़ा ही क्यों न हो ? वह अतिथि-गृह होता था |
ईसरदासजी गाँव में पूछते-पूछते गाँव से बाहर आ गये | उनको सांगजी गौड़ की कोटड़ी नहीं मिली | गाँव के बाहर वे खड़े हो गए | उन्हें वहां एक झोंपड़ी दिखाई दी | वे झोंपड़ी के पास गए, तो उन्हें वहां एक विधवा राजपूत महिला दिखीं | उन्होंने उस बुजुर्ग महिला से सांगजी गौड़ की कोटड़ी का पता पूछा | सुनकर महिला मुस्कराई और ईसरदासजी से बोली- यही सांगे की कुटिया है बापजी! आप कहाँ से पधारे हैं ?
मारवाड़ के भादरेस गाँव से आया हूँ माँ, चारण हूँ , रात बिसराम करके आगे जाना है |
मेरे धन-भाग जो आप पधारे | मेरी तो कुटिया ही पवित्र हो गई बापजी ! आप विराजें | सांगा आता ही होगा, वह गाँव के बछड़े चराता है |
ईसरदासजी सब कुछ समझ गए | गाँव के लोगों ने उनका उपहास किया था | साथ ही विधवा और उसके पुत्र का भी उपहास | पर वे भक्त थे, कवि थे | उन्होंने सुबह आगे की यात्रा पर रवाना होने से पहले जो कहा, वह दोहा सदियों से राजस्थान और गुजरात में जन-जन की जुबान पर है –
‘ दीनां री देवळ चड़ै, क्यूँ कोई रीस करेह |
नागरचाळां ठाकरां ,(थांमें) सांगो ई गौड़ सिरेह ||
( जो देते हैं , अर्थात जो उत्सर्ग करते हैं, उनकी ही देवलियां स्थापित होती है, इससे किसी को नाराज नहीं होना चाहिए | हे नागरचाळा के ठाकुरों ! कान खोल कर सुन लो, तुम सब में यह सांगा गौड़ श्रेष्ठ है | )
आज न सांगा गौड़ है, न संत-प्रवर ईसरदास | आज नागरचाळा के ठाकुरों के तो नाम ही काल के गाल में समा गए हैं , पर सांगा गौड़ ज़िंदा है | जब भी पांच व्यक्ति इक्कठे होते हैं, कोई लौकिक ज्ञान चर्चा चलती है तो बछड़े की पूंछ पकड़ा उस विधवा राजपूतानी का बालक सांगा गौड़ सदियों की सरहदें लांघता आकर उपस्थित हो जाता है| और तब ईसरदास की ललकार गूँज उठती है -- नागरचाळां ठाकरां ,(थांमें) सांगो ई गौड़ सिरेह ||
आफ़ग़ानिस्तान
पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक। पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र। इसे आधुनिक कंदहार से जोड़ने की ग़लती कई बार लोग कर देते हैं जो कि वास्तव में इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था। इस प्रदेश का मुख्य केन्द्र आधुनिक पेशावर और आसपास के इलाके थे। इसमहाजनपद के प्रमुख नगर थे - पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) तथा तक्षशिला इसकी राजधानी थी । इसका अस्तित्व 600 ईसा पूर्व से 11वीं सदी तक रहा। कुषाण शासकों के दौरान यहाँ बौद्ध धर्म बहुत फला फूला पर बाद में मुस्लिम आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया।
प्राचीन नाम

गांधार महाजनपद
गांधार, थाइलैंड या स्याम के उत्तरी भाग में स्थित युन्नास का प्राचीन भारतीय नाम है। चीनी इतिहास–ग्रंथों से सूचित होता है। कि द्वितीय शती ई. पू. में ही इस प्रदेश में भारतीयों ने उपनिवेश बसा लिए थे और ये लोग बंगाल- असम तथा ब्रह्मदेश के व्यापारिक स्थलमार्ग से यहाँ पहुँचे थे। 13वीं शती तक युन्नान का भारतीय नाम गंधार ही प्रचलित था, जैसा कि तत्कालीन मुसलमान लेखक रशीदुद्दीन के वर्णन से सूचित होता है। इस प्रदेश का चीनी नाम नानचाओं था। 1253 ई. मेंचीन के सम्राट कुबलाख़ाँ ने गंधार को जीतकर यहाँ के हिन्दू राज्य की समाप्ति कर दी।
इस प्रदेश का उल्लेख महाभारत और अशोक के शिलालेखों में मिलता है। महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की रानी औरदुर्योधन की माता गांधारी गंधार की राजकुमारी थीं। आजकल यह पाकिस्तान के रावलपिंडी और पेशावर ज़िलों का क्षेत्र है। तक्षशिला और पुष्कलावती यहीं के प्रसिद्ध नगर थे। अशोक के साम्राज्य का अंग रहने के बाद कुछ समय यह फारस के और कुषाण राज्य के अंतर्गत रहा। यह पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक संगम का स्थल था और यहाँ कला की 'गांधार शैली' का जन्म हुआ।
सिंधु नदी के पूर्व और उत्तरपश्चिम की ओर स्थित प्रदेश। वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी भाग भी इसमें सम्मिलित था। ऋग्वेद में गंधार के निवासियों को गंधारी कहा गया है तथा उनकी भेड़ो के ऊन को सराहा गया है और अथर्ववेद में गंधारियों का मूजवतों के साथ उल्लेख है-
'उपोप मे परामृश मा में दभ्राणिमन्यथा:,
सर्वाहमस्मि रोमशा गंधारीणामिवाविका'[1]
'गंधारिम्यों मूजवद्भ्योड् गेभ्यो मगधेभ्य:
प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं परिदद्मसिं [2]
अथर्ववेद में गंधारियों की गणना अवमानित जातियों में की गई है किंतु परवर्ती काल में गंधारवासियों के प्रति मध्यदेशीयों का दृष्टिकोण बदल गया और गंधार में बड़े विद्वान पंडितों ने अपना निवास-स्थान बनाया। तक्षशिला गंधार की लोकविश्रुत राजधानी थी।

बुद्ध की पूजा करते हुए इंद्र और ब्रह्मा, कला संस्थान शिकागो
छान्दोग्य उपनिषद में उद्दालक-अरुणि ने गंधार का, सद्गुरु वाले शिष्य के अपने अंतिम लक्ष्य पर पहुंचने के उदाहरण के रूप में उल्लेख किया है। जान पड़ता है कि छांदोग्य के रचयिता का गंधार से विशेष रूप से परिचय था।
शतपथ ब्राह्मण [3] तथा अनुगामी वाक्यों में उद्दालक अरुणि का उदीच्यों या उत्तरी देश (गंधार) के निवासियों से संबंध बताया गया है। पाणिनि ने जो स्वयं गंधार के निवासी थे, तक्षशिला का [4] उल्लेख किया है। ऐतिहासिक अनुश्रुति मेंकौटिल्य को तक्षशिला महाविद्यालय का ही रत्न बताया गया है। वाल्मीकि ने रामायण [5] में गंधर्वदेश की स्थिति गांधार विषय के अंतर्गत बताई गई है। कैकय देश इस के पूर्व में स्थित था। केकय-नरेश युधाजित के कहने से अयोध्यापतिरामचंद्र जी के भाई भरत ने गंधर्व देश को जीतकर यहाँतक्षशिला और पुष्कलावती नगरियों को बसाया था।
महाभारत काल में गंधार देश का मध्यदेश से निकट संबंध था। धृतराष्ट्र की पत्नी गंधारी, गंधार की ही राजकन्या थी।शकुनि इसका भाई था। जातकों में कश्मीर और तक्षशिला-दोनों की स्थिति गंधार में मानी गई है। जातकों में तक्षशिला का अनेक बार उल्लेख है। जातककाल में यह नगरी महाविद्यालय के रूप में भारत भर में प्रसिद्ध थी। पुराणों में[6] गंधार नरेशों को द्रुहयु का वंशज माना। वायु पुराण में गंधार के श्रेष्ठ घोड़ों का उल्लेख है।
अंगुत्तरनिकाय के अनुसार बुद्ध तथा पूर्व-बुद्धकाल में गंधार उत्तरी भारत के सोलह जनपदों में परिगणित था। सिकन्दर केभारत पर आक्रमण के समय गंधार में कई छोटी-छोटी रियासतें थीं, जैसे अभिसार, तक्षशिला आदि। मौर्य साम्राज्यमें संपूर्ण गंधार देश सम्मिलित था। कुषाण साम्राज्य का भी वह एक अंग था। कुषाण काल में ही यहाँ की नई राजधानी पुरुषपुर या पेशावर में बनाई गई। इस काल में तक्षशिला का पूर्व गौरव समाप्त हो गया था। गुप्त काल में गंधार शायद गुप्तों के साम्राज्य के बाहर था क्योंकि उस समय यहाँ यवन, शक आदि बाह्यदेशीयों का आधिपत्य था।
7वीं शती ई. में गंधार के अनेक भागों में बौद्ध धर्म काफ़ी उन्नत था। 8वीं-9वीं शतियों में मुसलमानों के उत्कर्ष के समय धीरे-धीरे यह देश उन्हीं के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया। 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस नेअफ़ग़ानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया लेकिन इसके बाद काफ़ी समय तक यहाँ हिन्दू तथा बौद्ध अनेक क्षेत्रों में रहते रहे। अलप्तगीन और सुबुक्तगीन के हमलों का भी उन्होंने सामना किया। 990 ई. में लमगान (प्राचीन लंपाक) का क़िला उनके हाथों से निकल गया और इसके बाद काफिरिस्तान को छोड़कर सारा अफ़ग़ानिस्तान मुसलमानों के धर्म में दीक्षित हो गया।
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