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ईश्वर सभी लोगों के जीवन को सुखी क्यों नहीं कर देते?
इस इस कहानी से समझिए।
एक बार की बात है, एक कृष्ण भक्त एक सैलून में बढ़े हुये अपने बाल कटवाने गया था। जैसा की हम जानते हैं छोटे कस्बों की नाई की दुकान में जाते ही तुरंत सेवा मिलना, गया-पटना की सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन में घुसते ही जगह मिलने के जैसी खुशकिस्मती वाली बात है
मतलब...कृष्ण भक्त प्रतीक्षा में बेंच पर बैठ गया, हज्जाम किसी और की चिकने गाल पर फोम रगड़ रहा था इसका नंबर तीसरा था। समय काटने के लिए अखबार पढ़ते हुये वह बीच -बीच में राधे -कृष्ण; राधे कृष्ण बोल उठता
कृष्ण भक्त के मुंह से ईश्वर का सुंदर नाम सुनकर नाई की पता नहीं क्यों जल उठती। दो चार बार वह केवल बुदबुदा कर रह गया। जब राधे-कृष्ण का फिर उच्चार सुनाई दिया तो नास्तिक नाई आग बबुआ हो जाता है
वह हज्जाम उसपर खीज कर कहा भाई क्यों अपनी जुबान और हमारे कान को तकलीफ देते हो। दुनिया में भगवान केवल भ्रम है, मन का वहम बस। कृष्ण भक्त समझ गया कि पट्ठा कंस के कुल का लगता है; जो कहता था कृष्ण एक बालक मुझे क्या मरेगा
कृष्ण भक्त बिना विवाद किए बैठा रहा और फिर से मुंह से निकला "राधे-कृष्ण"
इस बार हज्जाम का सिर घूम गया, उसका उस्तरा गलत जगह लगते-लगते बचा। वह क्रोध में कृष्ण भक्त का हाथ पकड़ कर बाहर लाया और बोला,"आओ कुछ दिखाना चाहता हूँ आपको, देखो सामने अस्पताल बाहर कितनी लंबी लाईन लगी हुई है, अगर भगवान होते तो क्या इन सब लोगों के दुःख दूर ना करते, बेचारे कितने दुःखी व असहाय हैं
देखो सामने के स्टेशन पर कितने भिखारी बैठे है, क्या तेरे कृष्ण को को इन बेबस, गरीब व लाचारों पर ज़रा भी दया नहीं आती
"इसलिए कहता हूँ ई ढकोसला बंद करो। भगवान है ही नहीं"
कृष्ण भक्त मन ही मन को को पुकारा। उसने हज्जाम से कहा,"मुझे लगता है दुनिया से नाई या हज्जाम खतम हो गए है कोई है ही नहीं"
इतनी बात सुनकर हज्जाम ठहाके मार कर हंसने लगा, कि अगर इस दुनिया में नाई नहीं होता तो आखिर मैं कौन हूँ
तो कृष्ण भक्त ने नाई का हाथ पकड़ कर दुकान से बाहर लाया और बोला बाहर ये लोग तुम्हें आते जाते दिखाई दे रहे हैं कि नहीं, नाई बोला मैं आपकी बात का मतलब नहीं समझा, कृष्ण भक्त बोला कि देखो लोगों को किसी के बाल बहुत बड़े बड़े हैं तो किसी कि दाढ़ी बहुत बड़ी हुई है अगर दुनिया में नाई होता तो इन सभी लोगों के बाल सही से बने रहते, दाढ़ी मुछे भी सही से संवरीं होती
अब नाई बोला ऐसा नहीं है अब तुम ही कहो मैं क्या करूँ, जिस भी व्यक्ति को अपने को संवारना है उसे मेरी दुकान पर आना होगा तभी मैं व्यक्ति को संवार सकूंगा, अब हर किसी को तो सडक़ पर पकड़ कर बाल-दाढ़ी नहीं ना काट सकता हूँ मैं
अब कृष्ण भक्त ने नाई से कहा कुछ समझ में आया कि नहीं, इस दुनिया में भगवान होते हैं जैसे जिसे बाल-दाढ़ी संवारनी हो तो तुम्हारे पास चल कर तुम्हारी दुकान पर आना पड़ेगा ठीक उसी प्रकार सभी प्राणियों को अपने प्रयासों से,अपने सुकर्मों से भगवान के चरणों तक पहुंचना होगा.
आपके पिता ने आपको सबसे सुरक्षित सलाह क्या दी थी?
जब मैं छोटा था मेरे पिताजी लगभग रोज़ एक ही कहानी मेरे जिद करने पर सुनाते थे । तब मुझे उसका मतलब समझ नहीं आता था आज आता है । कई वर्ष बीत गए है ।
कहानी _। एक आदमी जिसकी जेब में सिर्फ 1 रुपया था और वह तीन दिन से भूखा था। शहर के बाजार की और चल पड़ा, और खाने के लिए चीज़े खोजने लगा । सबसे पहले समौसे की दुकान आईं जी ललचाया पर बाहर बोर्ड पर उसकी कीमत 5 रुपए लिखी वह आगे बढ़ गया मिठाई की दुकान के पास से निकलते हुए जब कीमत पर नजर पड़ी वह में मसोस कर रह गया और भगवान को गालियां देने लगा कि तुमने मुझे सिर्फ 1 रुपया ही दिया क्यों मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? कहते कहते उसकी आंखो में पानी भर आया । आगे नमकीन, फल, चने ,हलवा पूरी की दुकान आते गई पर वह 1 रुपए से कुछ नहीं खरीद सका । उसकी भगवान को गालियां, क्रोध और आंसू तीनो थमने का नाम नहीं ले रहे थे ।
शाम होने को आई बाजार ख़त्म दुकान वाले भी सामान समेटने लगा था। वह व्यक्ति बाजार के अंतिम छोर पर पहुंचा अंतिम आशा में उसने एक थैले पर केले बेचने वाले को देखा वह भी सब घर जाने के लिए समान समेट रहा था । उसने हिम्मत जुटाई और केले वाले के पास जाकर उसने कहा "भईया 1 रुपए में एक केला दोगे ? केले वाले ने एक बार उसे ऊपर से नीचे देखा और एक रुपया लेकर एक छोटा केला उसको दे दिया । आदमी ने केले को छीला छिलका पीछे फेका और थोड़ी देर के लिए सब भूलकर केले का आंनद लेने लगा, चलते चलते खाते हुए एक छोटा खड्डा आया और सड़क पर गिर गया, गिरते ही उसने पीछे देखा और फिर रोने लगा , उसने देखा कि एक आदमी
उसका फेका हुआ केले का छिलका उठा कर खा रहा था । हाथ में केला लिए उसने ऊपर देखा और कहा " धन्यवाद भगवान" उठा और चल दिया ।
शिक्षा= पिताजी कहते थे, आपके पास जो है वह कई लोगो को नसीब नहीं, जब आपको लगे कि मेरे पास कुछ नहीं है तो अपने से पीछे वाले को देखे, और जब घमंड होने लगे की मेरे पास कुछ हो गया है तो अपने से आगे वाले को देखे। इस से संतुलन बना रहेगा ना कभी कम आत्मविश्वासी होंगे न कभी अति आत्मविश्वासी
ऐसा क्या है जो कुछ माता-पिता सोचते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ सही कर रहे हैं लेकिन वास्तव में वह गलत कर रहे हैं?
इसका जवाब मैं मनोहर पर्रिकर जी द्वारा सुनाई एक कहानी के माध्यम से बताना चाहत हूँ….
मनोहर पर्रिकर ने एक बार अपनी आपबीती बयान की थी।
"मैं गोआ के एक गाँव "पर्रा" से हूँ, इसलिये हम "पर्रिकर" कहे जाते हैं। मेरा गाँव अपने तरबूजों के लिये प्रसिद्ध है। जब मैं बच्चा था, वहाँ फसल कटाई के बाद मई में किसान एक 'तरबूज खाओ प्रतियोगिता' आयोजित करते थे। सभी बच्चों को बुलाया जाता था और उन्हें जितने चाहो उतने तरबूज खाने को कहा जाता था।
कई साल बाद, मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिये IIT मुम्बई चला गया। फिर 6.5 साल बाद अपने गाँव वापस आया। मैं तरबूज ढूंढने बाजार गया। पर वो गायब थे। जो वहाँ मिले भी वे बहुत छोटे-छोटे थे।
मैं उस किसान से मिलने गया जो 'तरबूज खाओ प्रतियोगिता' आयोजित करता था। अब उसकी जगह उसके बेटे ने ले ली थी। वह प्रतियोगिता आयोजित करता था पर एक अंतर था। जब वो बूढ़ा किसान हमें तरबूज खाने को देता था, वह हमें एक कटोरे में बीज थूक देने को कहता। हमें बीज चबाने की मनाही थी। वह अगली फसल के लिये बीज इकट्ठा कर रहा था।
हम अवैतनिक बाल मजदूर थे, असल में ।
वह प्रतियोगिता के लिये अपने बेहतरीन तरबूजे रखता था जिनसे वह सबसे अच्छे बीज प्राप्त करता था जिनसे अगले साल और भी बड़े तरबूज पैदा होते थे। जब उसका बेटा आ गया, तो उसने सोचा कि बड़े वाले तरबूजों के बाजार में ज्यादा दाम मिलेंगे सो उसने बड़े वाले तो बेचने शुरू किये और प्रतियोगिता के लिये छोटे तरबूज रखने लगा। अगले साल, तरबूज छोटे हुए, और अगले साल उनसे भी छोटे। तरबूजों की पीढ़ी एक साल की होती है।
सात सालों में, पर्रा के बेहतरीन तरबूजों का सफाया हो गया। मनुष्यों में, 25 साल पर पीढ़ी बदल जाती है। हमें 200 सालों में यह पता चलेगा कि हम अपने बच्चों को पढ़ाने में क्या त्रुटियाँ कर रहे थे।
अच्छे बीज याने प्रतिभाओं का चयन अपने आप में एक बड़ा कार्य है। विसंगत विचार, सरकारी नौकरी का भूत उन्हें ये बताना की अगर नहीं कर सके तो वो जीवन में कुछ भी नहीं कर पायेन्गे जैसी बेकार की बातों के चलते हमारे अच्छे तरबूज बाज़ार (यानि हमारे बच्चे) छोटे से तरबूज बन के रह जायेंगे अपनी प्रतिभा को दबाये
क्या आप किसी विशेष महापुरुष को जानते हो जिनके बारे में आपने पहले कभी शायद ही सुना हो?
एक दिन जवाहरलाल नेहरू को मिलने के लिए एक महिला आयी और उनको एक नोटबुक और एक थैली दे गयी। नेहरू ने वह थैली खोली तो उसमें ३५ लाख रुपये थे और उस नोटबुक में रुपयों का पूरा हिसाब था।
वह रकम कांग्रेस संस्था की पूँजी थी। इसका हिसाब उस महिला के पिता करते थे। उनके पिता की मृत्यु के पश्चात एक भी रुपया अपने पास रखे बिना उस महिला ने वह रकम नेहरू को दे दी थी और वह अपने घर चली गयी थी।
आजीवन अकिंचन व्रत का पालन करना, हमेशा रेल के सामान्य वर्ग की श्रेणी के डिब्बों में सफर करना, और अपने हाथों से बने हुये वस्त्र पहनने वाली वह महिला कौन थी ?
वह महिला थी - स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक विस्मृत हुई -भारत के महान नेता सरदार वल्लभभाई पटेल की पुत्री -"मणिबहन "
आजादी के यह अमर प्रतीक हैं। इन्होंने देश की निःस्वार्थ सेवा की है। यह हमारे देश का अमूल्य गहना हैं।
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