Rajendra Rathoud
01/05/2026
“नाम के पत्रकार बनाम काम के पत्रकार”
आज देश में पत्रकारों की संख्या लाखों में है… लेकिन सच कहूँ तो पत्रकारिता बहुत कम लोगों में बची है। कई लोग सिर्फ अपने नाम के आगे “पत्रकार” जोड़कर रुतबा कमाते हैं।
न लिखना, न पढ़ना… बस पहचान का इस्तेमाल करके काम निकालना ही उनका पेशा बन चुका है।
मुझसे भी अक्सर कहा जाता है कि “तुम दिनभर लिखते-पढ़ते रहते हो, इससे तुम्हें क्या मिलता है?”
और वही लोग गर्व से कहते हैं “हम तो बिना कुछ किए ही अपना काम निकलवा लेते हैं।”
हो सकता है, उनके नजरिए से वो सही हों। लेकिन मेरी दुनिया अलग है।
मुझे चैन तब तक नहीं मिलता, जब तक मेरे मन में उठे सवाल कागज़ पर नहीं उतरते, जब तक सच्चाई शब्दों में ढलकर बाहर नहीं आ जाती।
ये मेरे लिए सिर्फ काम नहीं है… ये एक बेचैनी है, एक जिम्मेदारी है, एक जुनून है।
आप इसे पागलपन कह सकते हैं। लेकिन अगर सच लिखना पागलपन है, तो मुझे ये पागलपन मंजूर है।
क्योंकि इतिहास में नाम उन्हीं का बचता है, जो सच के साथ खड़े रहते हैं— ना कि उनका, जो सिर्फ नाम का इस्तेमाल करते हैं। पत्रकार होना एक पहचान नहीं, एक जिम्मेदारी है।
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