Mewara Classes

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19/07/2025

भारत का वास्तुशिल्प अजूबा: चाँद बावड़ी!

कहाँ: आभानेरी, दौसा (राजस्थान)
निर्माण: 9वीं सदी में राजा चंदा द्वारा
खासियत: 13 मंजिलें, 3500 से ज़्यादा सीढ़ियाँ और 100 फीट गहराई
उपनाम: भूलभुलैया बावड़ी

यह दुनिया की सबसे गहरी और बड़ी बावड़ियों में से एक है, जो प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना है।

19/07/2025

सुनो लडकियों.....
प्रेम अधूरा रह जाए तो खुद पर नाज़ करना !
पिता जहां करें शादी उसी घर में राज करना!
कौन कहता है कि मां बाप से बगावत कर लो,
जो कहें वो कल करने को उसे आज करना !

खुशी तुम्हें भी मिलेगी खुशी उनको भी रहेगी!
फिर न किसी तीसरे की उसमें दाल गलेगी!
जब भी मायके में आओगी स्वागत ही रहेगा,
भरा पूरा परिवार मिलेगा न कोई कमी खलेगी!

राखी पर भईया की कलाई न सूनी जाएगी!
भाभी भईया से लड़कर नेग अच्छा दिलाएगी!
बैठेंगे शाम को बचपन को फिर से दोहराएंगे,
कितनी थी शरारती तुम मम्मी सबसे बताएंगी!

त्यागकर इन पलों को तुम्हे अकेले क्यों होना!
जहां गूंजती थी हंसी तुम्हारी वहीं क्यों रोना!
बड़े अरमानों से पाला तुम्हें हक उनका भी है,
थोड़ा अधिकार उन्हें भी दे दो उसे क्यों खोना!

जिसने की मनमानी हाल उनका भी देखा करो!
अंजाम अच्छा हुआ या बुरा कुछ तो लेखा करो!
अपने ही हाथों कभी अपनी बरबादी मत करना,
मेहनत करके किस्मत की लकीरों में रेखा करो!

17/07/2025

इसे aapko स्थानिय बोली या क्षेत्रीय भाषा में कहते है !

इसे अपने मारवाड़ी में गोगा गांवड़ी/ गोगा टीडी/ अंग्रेज़ी में Painted Grasshopper , इसका वैज्ञानिक नाम पोइकिलोसेरस पिक्टस और हिन्दी में आमतौर पर आक टिड्डा या आक का टिड्डा कहा जाता है, एक रंग-बिरंगा, मध्यम आकार का टिड्डा है।
शरीर पर कैनेरी पीले और फ़िरोज़ी-नीले धारियाँ, पंखों पर पीले धब्बे, और पीछे के पंख हल्के लाल रंग के होते हैं।ये कद में 4–6 सेमी तक के होते
भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में मिलता है।
खान-पान एवं विषैली प्रकृति
दोनों वयस्क और नन्हें (nymph) आक टिड्डे ख़ासतौर पर आक की दूधिया रस वाली बेल (Calotropis gigantea एवं C. procera) पर रहते हैं और वहीं से वे शारीरिक रक्षा हेतु हृदयग्लाइकोसाइड्स (cardiac glycosides) इकट्ठे करते हैं।
नन्हें आक टिड्डे घायल करने पर 30 सेमी दूर तक ज़हरीला दूध जैसा तरल फेंक सकते हैं।वयस्कों में यह तरल पंखों के नीचे जमा होता है और फेंकने की बजाय अवशोषित रक्षा प्रदान करता है।
आक टिड्डा यदि मुख्यतः आक न मिले तो कनेर अन्य फसलों पर भी हमला कर सकता है, इसलिए कभी-कभी कृषि की दृष्टि से कीट भी माना जाता है।
पोइकिलोसेरस पिक्टस, या आक टिड्डा, आकर्षक रंगों वाला, विषैली रक्षात्मक क्षमता वाला टिड्डा है जो मुख्यतः आक की बेल पर पाया जाता है और सूखाग्रस्त इलाकों में सामान्य है।🙏🙏

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