Yoga Ravi
नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अंतर्मन,
तब सुख के मिले समंदर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
जब फसल सूखकर जल के बिन
तिनका-तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
संबंध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना
फिर सुख में उन संबंधों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
छोटी-छोटी ख़ुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
© रामधारी सिंह दिनकर ❤️
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