Dayaram R. Dewasi

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09/12/2020

पाबूराम धामसीन की वॉल से।।

सभी मित्रगणों को सादर प्रणाम🙏🙏
मेरी रचना कहानी - "चिंटु क्यों रूठ गया"

"चिंटु क्यों रूठ गया?" ये चिंटु कोई खिलौनों के लिए नहीं रूठा, कोई खाने के लिए नहीं रूठा तो आखिर क्यों रूठा?
तो फिर कहानी को ही पढ़ना पड़ेगा। पढ़िये, समझिये व शैयर कीजिए।
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"कहानी:- चिंटु क्यों रूठ गया?"


सर्दी के मौसम का संध्या कालिन समय था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। सभी पशु-पक्षी अपने-अपने घर जा चुके थे। किसान चंपालाल भी खेत में सिंचाई करके अपने आसियाने पर आ चुके थे जो बहुत ही गरीब किसान थे। पुरानी धोती पहनी हुई थी जिस पर सलवटें देखकर कोई भी समझ सकता था कि वह कई वर्षो से उस गरीब किसान के बदन को ढ़क रही होगी। पुरानी बनियान भी कई देश-दूनिया के नक्शों को प्रदर्शित कर रही थी I किसान ने आँगन में रुक कर संगीता को आवाज लगाई जो उसके चार बिना माता की संतानों में से सबसे बड़ी थी। वह गरीब किसान की बेटी जो बिखरें हुए बाल सहित फटी चादर ओंढ़कर बाहर आयी। पिता को गुनगुने पानी का लोटा देकर बोली, "पापा! चींटु को सुबह से ही तेज बुखार आ रहा है। कुछ खाया भी नहीं, भुखा ही सो गया है।" चींटु तीन बहिनों का एकमात्र सबसे छोटा भाई था जिस अभागे को जन्म के समय ही माँ इस गरीब बाप के भरोसे छोड़कर भगवान को अपनी हालातों की शिकायत करने चली गयी थी। वह अनजान बिमारी से लड़ रहा था।
चंपालाल अपने हाथों को गंदी धोती से सुखाता हुआ संगीता से बोला, "बेटा! चिंटु को कोई टेबलेट देनी थी न!"
"एक ही टेबलेट थी वह भी कल पड़ौसी चाची लेकर चली गई।"
चंपालाल ने अपने पुराने घर में प्रवेश किया जिस पर पुरानी नालें (मिट्टी की परतों से बनायी गई कलाकृती से परिपुर्ण चादरें) टूटकर गीरना शुरू हो गई। चिंटु पर अपने ठंडे हाथ फेरते हुए बोला, "बेटा! कैसे हो अब तुम?"
चिंटु अपनी धँसी हुई आँखो को खोलता हुआ पिता से बोला, "अब तो थोड़ा ठीक हूँ।"
चंपालाल ने मीना की देखकर कहाँ, "भैया को कुछ खिलाओं और बिस्तर ओढ़ाकर सुला दो।" मीना संगीता से छोटी बहिन थी जिसके कल ही रोटी बनाते वक्त अंगुलियाँ झुलस चुकी थी। परंतु पापा से छुपाती हुई वह भाई के खाने का प्रबंध करने चली गई। चिंटु को खिलाया गया और अब चिंटु गहरी नींद में सो गया था।
चंपालाल आग के पास बैठकर अपने पैरों को गर्मी देकर पुनः रात की सिंचाई के लिए तैयार कर रहे थे। पैर पुरे दिन पानी में रहने के कारण जम चुके थे और चमड़ी पर बड़े फफोले उठ गये थे। चमड़ी जगह-जगह गठबंधन का विरोध कर रही थी और रक्त की बुंदे बाहर आ रही थी जिसको अंधेरें में नही देखा जा सकता था।
चंपालाल ने बरसात के मौसम में भी खाद-बीज उधार लाकर मुंगफली की फसल की बुवाई की थी जो उसके मेहनत का साक्ष्य स्वयं ही बता रही थी। किसान को पुरा विश्वास था कि अबकी फसल अच्छी होगी तो चिंटु को जयपुर अस्पताल में ले जाऊंगा जो बचपन से ही गंभीर बिमारी से लड़ रहा है। मुंगफली पककर तैयार हो चुकी थी। उखेड़ी जा रही थी तो कुछ खेत में सुख रही थी। खेत में सुख रही मुंगफलियों पर बारिश होने से सारी मुंगफलियों का रंग खराब हो चुका था। उसे ओने-पौने भाव पर बाजार में बेचनी पड़ी जिससे तो पुरा कर्जा भी नहीं उतर पाया था। अब पुनः कर्ज लेकर रबी की फसल बोई थी और उसका बेटा अभी भी उसी बिमारी से लड़ रहा था। किसान चंपालाल अपने खेत से काम पुरा करके आते ही सबसे पहले चिंटु की संभाल लेने पहुंचे। चिंटु का फटा बिस्तर उठाकर उसके सिर पर हाथ फैर रहे थे और वह चिंटु अपने प्यारे पापा से रूठ चुका था।

स्वरचित एवं मौलिक रचना
- पाबुराम देवासी
धामसीन (रानीवाड़ा)
राजस्थान

15/01/2019

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