My Colorful Notebook
05/04/2023
Discover the power of silence and the freedom to start anew. Embrace the beauty of starting over with every fall. ✨
26/11/2020
बच्चपन वाली दीवाली अब नहीं आती।
वो घरों का दियों से जगमगाना अब कहाँ नज़र आता हैं
अब तो हर जगह फेयरी लाइट्स का ज़माना हैं।
वो सितम्बर के महीने से ही घरों में रंग-रोगन का दौर अब कुछ बदल सा गया है,
अब तो हर 3-4 महीनों में मिनी-मेकओवर का ज़माना हैं।
माँ-दादी का वो 2-2 महीनो पहले घर के कोने-कोने को चमकना अब बस कॉलिन और मैड के हाथों 15 दिन में हो जाता हैं।
कहाँ रह गए वो ज़माने जब हम सब मिलकर बाजार जाया करते थे,
हर एक कोने को सजाने के लिए सामान नया-नया लाया करते थे।
अब तो ऑनलाइन ही सारी खरीदारी होती है,
अब कहाँ बाजार की वो चहल-पहल और रौनक नसीब होती हैं।
बच्चपन में तो महीने भर पहले दर्ज़ी को नया सूट सीने दे आते थे
आज तो रेडीमेड ने दर्ज़ी की वो छोटी सी दुकान ही मानो जैसे भुला दी हैं।
पहले तो त्योहार के दिनों में सुबह-श्याम बस मीठा ही खाते थे
परंतु अब तो वेट गेन के चक्कर में बस एक काजू-कतली का ही स्वाद ले पाते हैं।
पटाखे तो कॉलोनी में नवरात्रों से शुरू हो जाते थे,
भैया-पापा-दादा हर श्याम आ के साथ में एक बम जरूर जलाते थे।
इस दौर में तो वो पटाखे भी नज़र नहीं आते,
साउंड और एन्वाइरन्मन्ट पॉल्युशन के कारण अब सब शोर दबे हैं रह जाते।
माँ-दादी का घर पर पकवान बनाने का दौर अब नहीं रहा,
अब तो गिफ़्ट बॉक्स में पैक्ड काजू-बादाम, मिठाई और चॉकलेट ही स्टेटस सिंबल कहलाते हैं।
वो रामा-श्यामा के लिए नानी के घर जाना अब एक सपना सा लगता है,
अगले दिन दफ्तर जो जाना होता हैं।
15-15 दिनों की वो छुट्टियाँ अब नहीं आती
क्योंकि
बच्चन वाली दीवाली अब नहीं आती।।
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