Acting Adda
20/10/2025
गोवर्धन ठाकुरदास असरानी अलविदा
चरित्र अभिनेता/कॉमेडियन/निर्देशक
जनवरी १९४१ में जयपुर,राजस्थान में जन्म हुआ था
पिता की साड़ियों की एक दुकान थी यह दुकान आज भी कायम है जिसे इनके भाई के बच्चे चला रहे है लक्ष्मी साड़ी - राजमंदिर के पास
कुल ७ भाई बहन - जिसमें ४ भाई ३ बहने
सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की बहुमुखी प्रतिभाओं से भरे असरानी स्कूल में डांस/ ड्रामा/संगीत में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे,
स्कूल दिनों में ही १९५५ में जयपुर आकाशवाणी की स्थापना हुई थी,
खबर लगी के बच्चों के ड्रामे के लिए एडिशन चल रहा है तो पहुंच गए
एक अधिकारी ने यह कह कर भगा दिया कि नाखून काट साफ सुधरे कपड़े पहन कर आओ
अगले दिन नाखून काटकर साफ कपड़े पहन कर पहुंचे तो उसी अधिकारी ने बोला
"काम ही पूजा है" यह लाइन इनके जहन में छप गई
पहला एडिशन पास सिलेक्शन
पहला रेडियो नाटक जिसमें किरदार मिला जॉर्ज का जिसका काम था हर काम में टांग अड़ाना या चोंच मारना,
यह ड्रामा इतना प्रसिद्ध हुआ के रेडियो के बाद इसके मंचन भी होने लगे थे जिसका पारितोषक ५ रुपया मिलता था और स्कूल फीस थी १ रुपया,
मंच पर काम करते करते वह समर्पित होते गए और इसी समर्पण ने इन्हें, १९६०- १९६२तक साहित्य कला भाई ठक्कर से अभिनय की शुरुआती शिक्षा ली, फिर पिता के विरोध के बावजूद यह बॉम्बे पहुंचे,
फिर उन्होंने अपने काम को पूजा की तरह लिया और आज अमर हो चुके है
एक अभिनेता जिन्होंने शुरुआत की रेडियो से
बेशुमार मददगार किरदार, हास्य किरदार,
अंग्रेजों के जमाने के जेलर - असरानी
असरानी उनका उपनाम था, उन्होंने इसी नाम से पहचान भी बनाई,,,
जयपुर से स्नातक तक की पढ़ाई की जयपुर रेडियो पर वॉइस ओवर आर्टिस्ट भी काम किया,
मुंबई आकाशवाणी पर भी काम किया
मुंबई में मुलाकात किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी से हुई जिन्होंने अभिनय सीखने की सलाह दी
तब १९६४- ६६ तक पुना फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट से अभिनय की पहली बेच में अभिनय की बारीकियों को सिखा,
१९६६ में एक फिल्म हम कहा जा रहे है में एक कालेज बॉय का किरदार मिला,
तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी FTTI आई तो असरानी और साथियों ने शिकायत की के कोई हमें काम तो क्या कोई समय भी नहीं देता
तब इंदिरा गांधी ने फिल्म इंडस्ट्री से अनुरोध किया के FTTI के स्टूडेंट्स को काम दीजिए,
पर मुंबई सपने तोड़ने में माहिर शहर है, संघर्ष का समय शुरू हो चला,
१९७० में हरे कांच की चूड़ियां फिल्म में अभिनय किया हीरो थे विश्वजीत
किरदार का नाम था त्रिपाठी जो हीरो का दोस्त था,,
इसी साल इन्होंने गुजराती फिल्में भी की,, फिल्म बावर्ची (१९७९) के किरदार ने पैर जमा दिए, फिल्म नमक हराम, मेरे अपने/परिचय - में गुलज़ार साहब ने मौका दिया,
गुलज़ार की फिल्म कोशीश (१९७२) में नकारात्मक भूमिका निभाई- पर दोस्तो ने सलाह दी के नेगेटिव रोल की जगह हस्ते हंसाते रोल हीं करो,
१९७० में मंजू बंसल से विवाह हुआ मंजू ने कुछ फिल्मों में बतौर अभिनेत्री भी साथ काम किया,
लगभ ३५० फिल्मों में अभिनय किया,
१९७२ से १९९१ तक राजेश खन्ना के साथ लगभग ७ से ८ फिल्मों में काम किया,,
राजेश के साथ बावर्ची के दौरान अच्छी दोस्ती हो चली जिसके चलते राजेश ने कई फिल्में दिलाई इस बात का स्वयं असरानी ने खंडन किया के ऐसा कुछ नहीं हुआ,,,
चला मुरारी हीरो बनने और सलाम मेमसाब में बतौर मुख्य अभिनेता काम किया,
१९७२ से १९८२ तक गुजराती फिल्मों में बतौर हीरो काम भी किया,,
१९७४ से १९९७ तक लगभ ६ फिल्मों का निर्देशन भी किया,
पहली गुजराती फिल्म बतौर निर्देशन अ हमदाबाद तो रिक्शा वालो(१९७४),
मां बाप (१९७७),
बतौर लेखक - निदेशक फिल्म चला मुरारी हीरो बनने (१९७७)
बतौर हीरो गुजराती फिल्में -
संसार चक्र, सात कैदी, पाखीनो मानो, छैल छबीला गुजराती,जुगल जोड़ी,
शोले फिल्म के किरदार जेलर आज तक तरोताजा ही है,,
७० के दशक में लगभग १०१ हिंदी फिल्मों में काम किया
८० के दशक में लगभग १०७ फिल्मों में अभिनय किया
नमक हराम, रफू चक्कर, चुपके चुपके, बिदाई के किरदार यादगार थे थे,
फिल्म बालिका वधू और आज की ताजा खबर फिल्म के लिए बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड भी मिले
*इदरीस खत्री*
22/08/2025
राजेश खन्ना साहब के जीवन में अनिता आडवाणी नामक एक महिला भी थी। अनिता आडवाणी काका के आखिरी दौर में साथ थी। एक दफ़ा अनिता आडवाणी ने ये दावा भी किया था कि काका ने उनसे गुपचुप विवाह भी किया था। अनिता आडवाणी ने राजेश खन्ना के जीवन पर एक किताब भी लिखी थी। हालांकि वो किताब विवादों में आ गई। और अब जल्दी से वो किताब मिलती भी नहीं है। अनिता आडवाणी ने हाल ही में एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया है कि राजेश खन्ना जब खाने की टेबल पर आते थे तो उन्हें कम से कम दस तरह के पकवान चाहिए होते थे। अगर इतने पकवान ना हों तो उन्हें गुस्सा आ जाता था। और वो कहते थे कि हम कोई रिफ़्यूजी हैं क्या?
अनिता आडवाणी ने ये भी कहा कि वैसे तो राजेश खन्ना के यहां एक कुक काम करता था। मगर वो भी उनके लिए कभी-कभी खाना बनाया करती थी। राजेश खन्ना जी के यहां छह-सात कर्मचारी नौकरी करते थे। अनिता आडवाणी के मुताबिक राजेश खन्ना को छोले-भटूरे बहुत पसंद थे। इसलिए राजेश खन्ना जी के लिए अनिता आडवाणी ने छोले-भटूरे बनाना सीखा। राजेश खन्ना खाने के बहुत शौकीन थे। और डोसा तो वो रोज़ खाते थे। राजेश खन्ना को पराठा भी बहुत पसंद था। और वो कभी भी स्टाफ़ को ऑर्डर दे देते थे कि आज आलू, मूली व गोभी का पराठा उनके लिए बनाया जाए। स्टाफ़ कई बार परेशान हो जाता था उनकी आदतों से।
बकौल अनिता आडवाणी, इतना खाना बनवाने के बावजूद वो सब पकवानों को थोड़ा-थोड़ा ही चखते थे। खाने के शौकीन थे। मगर खुराक ज़्यादा नहीं थी उनकी। बचा हुआ खाना उनका स्टाफ़ खाता था। स्टाफ को अलग से खाना बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी अपने लिए। यानि खाना बिल्कुल भी बर्बाद नहीं होता था।
09/07/2025
गुरूदत्त जी एक्टिंग से ज़्यादा डायरेक्शन पर फ़ोकस करना चाहते थे। मगर कई बार ऐसा हुआ जब उन्हें मजबूरी में एक्टिंग करनी पड़ी थी। जैसे, प्यासा फ़िल्म में काम करने के लिए उन्होंने दिलीप कुमार से बात की थी। लेकिन ऐन वक्त पर दिलीप साहब ने प्यासा में काम करने से इन्कार कर दिया था। ऐसे में गुरूदत्त ने तय किया कि वो खुद ही प्यासा में एक्टिंग भी करेंगे।
ठीक ऐसे ही साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म के लिए गुरूदत्त शशि कपूर जी को लेना चाहते थे। मगर शशि कपूर जी(जो हालांकि न्यूकमर ही थे तब) के पास डेट्स की कमी थी। और गुरूदत्त उनसे बल्क में डेट्स लेना चाहते थे। क्योंकि वो मीना कुमारी की सभी डेट्स ले चुके थे। और साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म के लिए एक अच्छा-खासा बड़ा सेट तैयार करा चुके थे।
इसलिए जब शशि कपूर जी ने इन्कार कर दिया तो साहिब बीबी और गुलाम फ़िल्म में भूतनाथ का किरदार गुरूदत्त ने खुद निभाने का फ़ैसला किया। एक और बात, साहिब बीबी और गुलाम में भूतनाथ का किरदार निभाने के लिए तो उन्होंने एक्टर बिस्वजीत से भी बात की थी। लेकिन उनके साथ भी गुरूदत्त की बात नहीं बनी। आखिरकार गुरूदत्त को ही भूतनाथ का किरदार जीना पड़ा।
साथियों आज महान गुरूदत्त साहब का सौंवा जन्मदिवस है। गुरूदत्त अगर ज़िंदा होते तो आज सौ साल के हो जाते। 9 जुलाई 1925 गुरूदत्त साहब का जन्म हुआ था। गुरूदत्त जैसा फ़िल्मकार अभी तक तो कोई दूसरा आया नहीं है फ़िल्म इंडस्ट्री में। वैसे भी गुरूदत्त जिस ज़माने के फ़िल्मकार थे, उस ज़माने में फ़िल्में लोग मन से बनाते थे। तब कंटेंट को महत्व दिया जाता था। सिर्फ़ पैसे को नहीं। भारतीय सिनेमाई इतिहास में गुरूदत्त अमर रहेंगे।
गुरुदत्त भारतीय सिनेमा के सम्पूर्ण कलाकारों की फेहरिस्त में सबसे आगे नजर आते है
25/05/2025
राम बलराम (1980) के सेट से यह कैंडिड शॉट अमजद खान, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और निर्देशक विजय आनंद की विशेषता वाले एक यादगार पल को कैप्चर करता है। एक्शन से भरपूर थ्रिलर फिल्म में दो भाइयों-राम और बलराम की कहानी सुनाई गई है- जो धर्मेंद्र और अमिताभ द्वारा अभिनीत हैं- जो भाग्य से अलग हो जाते हैं और बाद में एक आम दुश्मन से लड़ने के लिए फिर से एकजुट होते हैं। मुख्य भूमिका में जीनत अमन और रेखा के साथ, फिल्म में नाटक, भावनाओं और एक्शन का सही मिश्रण था, जो बॉलीवुड के स्वर्ण युग की विशिष्ट थी। शानदार विजय आनंद द्वारा निर्देशित, अपनी स्टाइलिश कहानी कहने के लिए जाने जाते हैं, राम बलराम बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी सफलता थी। अमजद खान, जो अपनी शक्तिशाली स्क्रीन उपस्थिति के लिए जाने जाते हैं, ने अपने प्रदर्शन के साथ गहराई और यह तस्वीर न केवल प्रतिष्ठित सितारों को एक फ्रेम में दिखाती है बल्कि रचनात्मक भावना और सौहार्द को भी दर्शाती है जो 1980 के दशक की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में से एक बनाने में चली गई।
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