Bhaav - express yourself

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04/10/2024

Shubh Navratri !!

24/10/2023

Happy Dussehra

05/09/2023

*स्वास्थ्य एवं शिक्षा दोनों ही जीवन का आधार है...*

हमारे शास्त्रों में एक श्लोक है, "आरोग्यम धनसंपदा।" स्वस्थ तन जिसके पास है, वह दुनिया का सबसे सम्पन्न व्यक्ति है। निरोगी काया भगवान का दिया वरदान है, जिसे संजोना हमारा दायित्व है।

भौतिक सुख कम या ज्यादा हो, हम संतुलन बना सकते है किन्तु, शरीर निरोगी न हो तो हम जीवन का सम्पूर्ण आनंद नहीं ले सकते। स्वस्थ शरीर का असर मानसिक सेहत पर भी पड़ता है, जो हमारी खुशियों के लिए जिम्मेदार है। सेहतमंद होने से हम ऊर्जावान रहते है और कार्यक्षमता बढ़ती है। अच्छी सेहत जीवन की अवधि बढ़ाकर हमारी उम्र बढ़ाती है। हमारा स्वस्थ होना ही वास्तविक दौलत है, जो हमें जीवन की सभी चुनौतीयों का सामना करने के लिए समर्थ बनाती है।

नियमित व्यायाम, ध्यान-योग, संतुलित एवं सात्विक भोजन, वैयक्तिक एवं बाहरी स्वच्छता, नियमित चिकित्सीय जाँच,भरपूर सूर्यप्रकाश, आवश्यक निद्रा और तनावरहित दिनचर्या से हम शरीर संपदा हासिल कर सकते है। अपने वजन को नियंत्रित रखना बहुत आवश्यक है। वजन नियंत्रण में होने के कारण गंभीर बीमारियों का खतरा स्वस्थ व्यक्ति में कम होता है।

मनुष्य काया अनमोल है, इसकी कद्र करते हुए इसे स्वस्थ बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। हर कोई अपना यह कर्तव्य निभाए तो, यह समाज, देश और विश्व अकल्पनीय सकारात्मकता से भर जाएगा।

*उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के लिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक स्वास्थ्य की भी आवश्यकता होती है और इसे प्राप्त करने का जरिया है - शिक्षा*। पृथ्वी पर सभी प्राणियों की तरह मनुष्य भी एक प्राणी ही है, लेकिन सोचने की क्षमता ही उसे सर्वश्रेष्ठ बनाती है। शिक्षा विचारों को दिशा देने का काम करती है। शिक्षा का महत्व अनादिकाल से रहा है। हमारे धर्मग्रंथों में भी श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि देवताओं का शिक्षा के लिए ऋषियों के आश्रम में अपना बाल्यकाल बिताने का उल्लेख हैं। आधुनिक युग में शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है। धन उपार्जन तो शिक्षा का आवश्यक किन्तु साधारण उपयोग है। अच्छी शिक्षा मनुष्य का बौद्धिक विकास कर, जीवन जीने का नजरिया देती है, नीति मूल्यों के साथ बगैर कोई समझौता किए हमारा दृष्टिकोण विस्तृत कर, सकारात्मक रूप से हर पहलु को देख और परख कर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। सही शिक्षा, हमारे उठने, बैठने, चलने, सोचने सब का अंदाज बदल हमारे व्यक्तित्व को निखारती है। बेहतर शिक्षा जीवन में आगे बढ़ने और सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत आवश्यक है, इससे आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है। शिक्षा से ही समानता की भावना जागृत हो कर देश का विकास और वृद्धि संभव है। विद्याग्रहण एक अनंत प्रक्रिया है और हम आखरी साँस तक सीख सकते हैं।

सफल और प्रसन्न जीवन जीने के लिए अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दोनों समान रूप से आवश्यक है। शरीर से स्वस्थ व्यक्ति अपना निजी एवं सामाजिक दायित्व एक अस्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा सहजता एवं अच्छी तरह से निर्वहन कर सकता है और एक शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्ति से ज्यादा जागरूक होने के कारण रोजमर्रा की जिंदगी में ज्यादा स्वस्थ, ज्यादा कार्यक्षम एवं खुशनुमा व्यक्तित्व का मालिक बनते हुए राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सहायक बनता है।

अच्छे स्वास्थ के बिना मनुष्य अधूरा है और अच्छी शिक्षा के बिना मनुष्य का विकास अधूरा है। इसलिए *स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों ही हमारे जीवन के महत्वपूर्ण आधार है।*

मनीषा साबू

Photos from Bhaav - express yourself's post 15/08/2023

"आरम्भ.....
आज़ादी के उत्सव का"

15 अगस्त 2022 के दिन हमारे देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूर्ण हुए हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव का आरम्भ हुआ और 15 अगस्त 2023 के दिन इसका समापन है। आज भारत सम्पूर्ण विश्व में व्यावसायिक, तकनीकी, औद्योगिक, खगोलशास्त्र, क्रीड़ा, शिक्षा, स्वास्थ्य,
आदि प्रत्येक क्षेत्र में अद्भुत प्रगति कर, मजबूती से अपनी अलग पहचान लिए शान से खड़ा हैं। इस बात का हमें अभिमान हैं।

एक विचार बारम्बार उभरता है, क्या हम सचमुच गुलामी से मुक्त हुए? और न चाहते हुए भी इसका उत्तर 'नहीं' में आता है। आज भी हम अंग्रेजों के मानसिक गुलाम ही हैं।

अंग्रेजी नहीं आती, यह कहने में हमें शर्म महसूस होती हैं लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी नहीं आती, यह बताने में हम

अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं। कैसी विडंबना है, अपनी भाषा में काम करना, हमारे अनपढ़ होने की निशानी मानी जा रही है। ज्ञानवर्धन के लिए ज्यादा से ज्यादा भाषाएं जरूर सीखनी चाहिए, आज यह अत्यावश्यक भी है, लेकिन अपनी भाषा के प्रति मन में आदरभाव हो।

पश्चिमी सभ्यता का पहनावा उनके वातावरणीय स्थिति के अनुसार है, किंतु गर्म क्षेत्र में रहने के बाद भी हमें सूट, बूट, टाई पहनकर बाबू ही बनना हैं। इसीको हमने आधुनिकता का मापदंड बना लिया हैं।

कांटे, चम्मच, छुरी को अपनाकर, हमने हाथ के निवाले को भूला दिया, जबकि शास्त्रों द्वारा इस तथ्य को प्रमाणित किया गया है कि, हाथ से किया हुआ भोजन ऊर्जादायक, स्वास्थ्यवर्धक एवं अल्प समय में पचनीय होता है।

बाहरी सभ्यता की देखादेखी में एक और फैशन जुड़ गया है, 6 महीने की आयु से ही बच्चों के अलग कक्ष की व्यवस्था। भारतीय सभ्यता साथ रहने और अंत तक साथ निभाने की है। हमारे यहाँ 5 पीढियां भी साथ ही

रहती हैं। 4-5 वर्ष तक के बच्चों को अपने पास सुलाने से उनके साथ मजबूत संबंध बनते हैं। बच्चों का मनोबल, आत्मविश्वास बढ़ता हैं।

पश्चिमी सभ्यता हमारे रहन सहन, विचारों पर कब्जा कर रही है। खासकर युवाओं पर इसका प्रभाव अधिक हैं। स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता और स्वैराचार नहीं है। ध्येय, लक्ष्य, मेहनत और सही रास्तों पर आगे बढ़ने से ही हम प्रगति की ओर अग्रसर होंगे। वैचारिक ठहराव के साथ जिम्मेदारियों को समझना, हमारा दायित्व हैं।

एक बात की बहुत ही खिन्नता है, जब भी कोई विदेश यात्रा करके आता है, यहाँ की सड़कें, गंदगी, भ्रष्टाचार, सरकार, आदि विषयों पर टिका टिपण्णी करना जरूरी समझता है। हमारी जनसंख्या को देखते हुए, यह सब बहुत उत्तम है। देश क्या है- हम ही तो देश हैं। हर व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अपने दायित्व का निर्वाहन करेगा, तो इन समस्याओं का निर्मूलन संभव होगा।

सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण बात--
अपनी भाषा में रामा नहीं 'राम' ही कहते है। धर्मा नहीं

'धर्म' ही कहते है। कर्मा नहीं 'कर्म' ही कहते है, इसलिए अपने उच्चारण के प्रति सजग रहना आवश्यक है। अपनी संस्कृति का मजाक न बनने दें।

मनुष्य को उन्नति की राह ले जानेवाले अच्छे आचार विचार जरूर अपनाने चाहिए किंतु, अपने संस्कार सभ्यता को निम्न स्तर का मानकर उनसे दूरी बनाना, अवनति की ओर ही ले जाता है। जाने कितने घर उजड़े, कितनी माँओं की गोद सूनी हुई, जब जाकर हमने आज़ादी का सवेरा देखा हैं। उनके इस त्याग का सम्मान करना ही होगा। अपना देश, यहाँ की संस्कृति, बोली, परंपरा; प्रत्येक देशवासी का अभिमान है। जब भी 'भारत' का नाम होठों पर आए, स्वर में गर्व और आँखों में चमक हो। यही हमारे दासमुक्त होने का प्रमाण होगा।

हमारी स्थिति उस कस्तूरीमृग के समान हो गयी है, जिसकी स्वयं की नाभि में सुगंध है और वह उसे ढूँढने जंगल जंगल भटक रहा है। हमारे वेदों, पुराणों का अध्ययन कर, दुनिया भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही हैं। हम जिस दिन पाश्चत्य संस्कृति की दासता से मुक्त होकर अपने देसीपन को अपनाएंगे; उसी

दिन सच्चे अर्थों में आज़ादी के उत्सव का आरंभ होगा और उसका समापन कभी न हो कर हम इसका आनंद अविराम उठाते रहेंगे।

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