Apsara
10/11/2022
कर सौलह श्रंगार जो, खूब निखारे वेश•
फूलों वाली सेज पर, बिखर गये जो केश•
-प्रदीप पुष्पेन्द्र
सत्य तो यह है कि हम छंद की दुहाई देनेवाले भी कम दोषी नहीं हैं। छंद गीत ग़ज़ल के नाम पर मृत देह की उपासना करते रहे। उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर ही न सके।
केवल काया ही सुन्दर होना ही जरूरी नहीं, उसमें प्राण फूँकने का काम भी जरूरी है। छंदमुक्त कविता में तो आजकल प्राण पूर्णतः गायब हैं यानि कि न तो काया है और न प्राण है।
बिना कथ्य, बजन, मनन, चिंतन, गहनता, कवित्त के न तो कविता हो सकती है, न ग़ज़ल और न ही गीत की कल्पना।
कुल मिलाकर हमारी कविता में "कविता के अनिवार्य तत्व" ही गायब हैं, तो इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं।
#जराहटके
02/10/2022
माँ गौरी को पूजिए, दिवस आठवें रोज।
शंख औढ़नी नारियल, दें कन्या को भोज।
श्वेत फूल फल नारियल, चूनर शंख पसंद।
माँ गौरी जो पूजते, पाते परमानंद।
जय माता की.....
-प्रदीप पुष्पेन्द्र
आठवें दिवस माँ महागौरी का स्वरूप
दोहा नियम
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