Inbedwithwords
कसक दिल की मिटाने में ज़रा सी देर लगती है
किसी का ग़म भुलाने में ज़रा सी देर लगती है
किसी को चाह कर अपना बनाना ठीक है लेकिन
मोहब्बत आज़माने में ज़रा सी देर लगती है
तुम्हें पाने की ख़्वाहिश में हुआ एहसास ये मुझ को
मुक़द्दर आज़माने में ज़रा सी देर लगती है
ग़ज़ल पढ़ कर तो आसानी से महफ़िल लूट सकते हो
मगर इज़्ज़त कमाने में ज़रा सी देर लगती है
ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएँगे
ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएँगे
हम न मजनूँ हैं न फ़रहाद के कुछ लगते हैं
हम किसी दश्त तमाशे में नहीं आएँगे
मुख़्तसर वक़्त में ये बात नहीं हो सकती
दर्द इतने हैं ख़ुलासे में नहीं आएँगे
उस की कुछ ख़ैर-ख़बर हो तो बताओ यारो
हम किसी और दिलासे में नहीं आएँगे
जिस तरह आप ने बीमार से रुख़्सत ली है
साफ़ लगता है जनाज़े में नहीं आएँगे
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मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए
बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए
रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल
मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से
इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए
#ʜɪɴᴅɪᴘᴏᴇᴛʀʏ
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअ’ल्लुक़ मर नहीं जाता
बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं
किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता
मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो
शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता
❤️
रख हौसला वो मंज़र भी आयेगा …
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