Ramkumar

Ramkumar

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17/06/2026

महाबली हनुमान अष्टचिरंजीवियों में से एक हैं। उन्हें कल्प के अंत तक जीवित रहने का वरदान प्राप्त है। यही कारण है कि रामायण के साथ साथ हनुमान जी का वर्णन महाभारत में भी आता है। महाभारत में उनके द्वारा भीम के अभिमान को भंग करने और अर्जुन के रथ की रक्षा करने के विषय में तो हम सभी जानते ही हैं किन्तु हरिवंश पुराण में एक वर्णन ऐसा भी आता है जब श्रीकृष्ण ने बजरंगबली के द्वारा बलराम जी, सुदर्शन चक्र, गरुड़ एवं देवी सत्यभामा का अभिमान भंग करवाया था।

श्रीकृष्ण कभी ऐसा नहीं चाहते कि उनका कोई भी प्रिय अहंकार के वश में आये। इसी कारण वे समय समय पर अपने प्रियजनों का अहंकार भंग करते ही रहते थे। किन्तु एक बार स्वयं उनकी माया से महाबली बलराम, सुदर्शन चक्र, गरुड़ एवं उनकी पत्नी सत्यभामा अहंकार के वश में आ गए। वैसे मैं ये बताना आवश्यक समझता हूँ कि इस कथा में मूल रूप से सुदर्शन, गरुड़ एवं सत्यभामा जी का ही वर्णन है। बलराम जी का प्रसंग मूल रूप से इसमें नहीं है क्यूंकि वे स्वयं श्रीहरि के अवतार हैं। कदाचित जब उन्हें शेषावतार के रूप में प्रचारित किया जाने लगा, तभी उनका प्रसंग भी इसमें जोड़ दिया गया होगा।

तो कथा ऐसी है कि श्रीकृष्ण के माया के प्रभाव से बलराम जी, सुदर्शन, गरुड़ एवं माता सत्यभामा एक ही समय अहंकार के प्रभाव में आ गए। द्वैत नामक एक महाशक्तिशाली वानर था जो स्वयं को हनुमान जी से भी अधिक शक्तिशाली बताता था। वो राजा पौंड्रक का सेवक था जो स्वयं को कृष्ण ही बताता था। तो वे दोनों वास्तव में श्रीकृष्ण और हनुमान जी की प्रसिद्धि का श्रेय स्वयं लेना चाहते थे। उसी महापराक्रमी द्वैत वानर का बलराम जी ने अपने केवल एक ही मुष्टि प्रहार से वध कर दिया था। तब उनके मन में अपने बल के प्रति तनिक अहंकार का भाव आ गया।

सुदर्शन ने एक बार देवराज इंद्र के वज्र को निष्क्रिय कर दिया था जिससे उसे भी अपने बल का अभिमान हो गया। गरुड़ प्रभु के वाहन थे। उनकी गति अतुलनीय थी और उन्हें अपने वेग का ही अभिमान था। अपनी पत्नी सत्यभामा के लिए श्रीकृष्ण ने स्वर्ग पर चढ़ाई कर देवताओं से युद्ध किया और पारिजात को प्राप्त किया। इससे सत्यभामा जी को ये अभिमान हो गया कि वे ही श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय पत्नी हैं।

श्रीकृष्ण तो मायापति हैं, उन्हें इनके अभिमान के विषय में पता चल गया। ये सभी उन्हें अत्यंत प्रिय थे अतः उन्हें अभिमान के वश से निकालना आवश्यक था। तब बहुत सोच विचार कर श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया कि एक पवनपुत्र हनुमान ही हैं जो अकेले इन सभी का गर्व तोड़ सकते हैं। यह सोच कर उन्होंने गरुड़ को आज्ञा दी कि वे महाबली हनुमान को सूचित करें कि वे उनसे मिलना चाहते हैं और उन्हें लेकर द्वारिका आ जाएँ।

उस समय हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर एकांतवास कर रहे थे जो द्वारिका से लगभग ढाई सौ योजन दूर था। श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर गरुड़ तीव्र गति से तत्काल गंधमादन की ओर उड़े और शीघ्र ही वहां पहुँच गए। वहां वे हनुमान जी से मिले और उन्हें श्रीकृष्ण का सन्देश दिया। हनुमान जानते थे कि कृष्ण और राम एक ही हैं, उन्होंने गरुड़ से कहा कि "पक्षीराज! ये मेरा सौभाग्य है कि प्रभु ने मुझे समरण किया है। आप चलिए, मैं शीघ्र ही आता हूँ।"

इसपर गरुड़ ने कहा कि "हे महाबली! द्वारिका यहाँ से बहुत दूर है अतः आप मुझपर बैठ जाएँ, मैं आपको अतिशीघ्र द्वारिका पंहुचा दूंगा।" इस पर हनुमान जी ने कहा - "हे पक्षीराज! आप मेरी चिंता ना करें, आप चलिए, मैं आपसे पहले ही द्वारिका पहुँच जाऊंगा।" हनुमान जी को ऐसा बोलते देख कर गरुड़ के अभिमान को ठेस लगी। उन्होंने कहा कि इस संसार में सबसे अधिक गति मेरी ही है पर फिर भी द्वारिका से यहाँ पहुँचने में मुझे बहुत समय लगा, फिर किस प्रकार हनुमान मुझसे पहले द्वारिका पहुंचेंगे? वे तीव्र गति से द्वारिका की और बढे ताकि वहां पहुंचकर हनुमान की गति को मात दे सकें।

गरुड़ की गति वास्तव में अद्वितीय थी किन्तु पवनपुत्र तो फिर पवनपुत्र थे। वे उनसे पहले द्वारिका पहुँच गए। उन्होंने सोचा कि श्रीकृष्ण के दर्शनों से पहले थोड़ा भोजन कर लूँ। यही सोच कर वे राजकीय उद्यान में गए और वृक्षों को उखाड़ कर फल खाने लगे। उन्हें रोकने के लिए नारायणी सेना के एक से बढ़कर एक वीर आये किन्तु हनुमान जी की शक्ति के समक्ष वे कितनी देर टिकते? तब उस उपद्रव के विषय में सुनकर स्वयं महाबली बलराम उन्हें रोकने उद्यान पहुंचे।

स्वयं बलभद्र को आया देख कर हनुमान सावधान हो गए। वे जानते थे कि श्रीकृष्ण उनके माध्यम से ही बलराम जी का अभिमान भंग करवाना चाहते हैं इसीलिए उनके कई बार रोकने पर भी वे नहीं रुके। इससे बलराम क्रोधित हो गए और दोनों के बीच तुमुल युद्ध छिड़ गया। दोनों ऐसे योद्धा थे जिनके बल की कोई सीमा नहीं थी। उस युद्ध में बलराम ये देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि उनके भीषण से भीषण प्रहारों को भी वो वानर सहज रूप से रोक रहा था। यह देख कर उन्होंने अपनी पूरी शक्ति से हनुमान जी पर मुष्टि प्रहार किया। ये प्रहार उस प्रहार से कई सैकड़ों गुणा अधिक शक्तिशाली था जो उन्होंने द्वैत वानर पर किया था, किन्तु आश्चर्य, वो वानर उसी प्रकार अविचल खड़ा रहा।

अपने इतने भीषण प्रहार को व्यर्थ जाते देख कर बलराम का अभिमान चूर हो गया। उन्हें समझते देर ना लगी कि जो उनके भी वार को इतनी सहजता से झेल ले वो पवनपुत्र हनुमान के अतिरिक्त और कोई हो ही नहीं सकता। उन्होंने हनुमान जी को पहचान लिया और उन्हें प्रणाम किया। तब हनुमान जी ने भी उनसे अकारण युद्ध के लिए क्षमा मांगी और श्रीकृष्ण से मिलने भवन की ओर बढे।

उधर श्रीकृष्ण ने सुदर्शन को द्वार की रक्षा के लिए खड़ा कर दिया और कहा कि किसी को अंदर प्रवेश ना करने दें। जब हनुमान जी द्वार पर पहुंचे तो सुदर्शन ने उन्हें रोक लिया। पवनपुत्र ने उनसे आग्रह किया कि वे श्रीकृष्ण को उनके आगमन की सूचना दें किन्तु अपने बल के अभिमान में सुदर्शन ने ऐसा करने से भी मना कर दिया और उनसे युद्ध को उद्धत हो गया। तब और कोई उपाय ना देख कर हनुमान जी ने बात ही बात में सुदर्शन को अपने मुख में रख लिया और भवन के अंदर प्रवेश किया। इससे सुदर्शन का अभिमान भी चूर-चूर हो गया।

उधर श्रीकृष्ण ने देवी सत्यभामा से कहा कि हनुमान बड़े क्रोध में इधर ही आ रहे हैं। इस समय उन्हें केवल प्रभु श्रीराम और माता सीता के दर्शन ही शांत कर सकते हैं। मैं राम का वेश धरता हूँ और तुम सीता के वेश में मेरे निकट बैठो। ये सुनकर सत्यभामा अत्यंत प्रसन्न हुई। उनका रूप तो अद्वितीय था ही, वे माता सीता का वेश धर कर भगवान राम बनें श्रीकृष्ण एक निकट बैठ गयी और हनुमान के आने की प्रतीक्षा करने लगी।

जब हनुमान जी ने भवन में प्रवेश किया तो श्रीराम रुपी श्रीकृष्ण को सामने देखा। अपने प्रभु के दर्शन होते ही हनुमान जी भावुक हो गए। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे आकर प्रभु के चरणों में लोट गए और राम नाम का जाप करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने हनुमान जी को उठाया और अपने ह्रदय से लगा लिया। प्रभु और भक्त के संगम का विहंगम दृश्य वहां प्रस्तुत हो गया।

उधर माता सीता बनी सत्यभामा इसकी प्रतीक्षा कर रही थी कि अब हनुमान उनका भी आशीर्वाद लेंगे, किन्तु उनकी ओर देखते ही हनुमानजी ने कहा - "हे प्रभु! आज आपने किस दासी को अपने वामभाग में बिठा रखा है? माता सीता कहाँ हैं?" ये सुनकर श्रीकृष्ण ने तत्काल माता रुक्मिणी को वहां आने को कहा। माता रुक्मिणी के दर्शन होते ही हनुमान जी उन्हें माता सीता ही समझ कर उन्हें प्रणाम किया। ये देख कर देवी सत्यभामा का अभिमान जल की भांति बह गया।

जब प्रभु की लीला समाप्त हुई तब गरुड़ ने हनुमान का सन्देश लेकर भवन में प्रवेश किया किन्तु जब उन्हें ये पता चला कि ना केवल पवनपुत्र उनसे पहले यहाँ पहुंचे हैं, बल्कि उन्होंने इतनी लीलाएं भी समाप्त कर ली हैं, गरुड़ का अपने वेग के प्रति अभिमान तक्षण समाप्त हो गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बजरंगबली के माध्यम से एक ही बार में अपने सभी प्रियजनों के अभिमान को भंग कर दिया।

17/06/2026

#जयश्रीराम #हनुमानजी #सीताराम

15/06/2026

१. कष्टों और संकटों का निवारण (प्रथम पंक्ति)
भक्त जनों की पीर: यहाँ 'पीर' का अर्थ भक्तों के जीवन में आने वाले दुखों, कष्टों, शारीरिक-मानसिक संतापों और सांसारिक विषमताओं से है।

अम्बा करतीं नाश: इस पंक्ति का भाव यह है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे और निष्कपट मन से जगदम्बा की शरण में आता है, माता उसकी हर पुकार को सुनती हैं। वे एक ममतामयी माँ के रूप में अपने बच्चों के जीवन के समस्त कष्टों और दुखों को जड़ से समाप्त कर देती हैं।

२. अज्ञान का शमन और आत्मिक जागृति (द्वितीय पंक्ति)
मन का तिमिर मिटाय के: यहाँ 'तिमिर' (अंधकार) केवल भौतिक अंधेरे का सूचक नहीं है, बल्कि यह मानव मन के भीतर व्याप्त अज्ञान, भटकाव, भय, मोह और नकारात्मक विचारों का प्रतीक है।

भरतीं नया प्रकाश: इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जब माँ अम्बे की कृपा होती है, तो मनुष्य के भीतर की सारी उलझनें और अंधकार दूर हो जाते हैं। माता बुद्धि और विवेक का ऐसा दिव्य आलोक (उजाला) भर देती हैं, जिससे जीवन का मार्ग पूरी तरह स्पष्ट, सकारात्मक और सात्विक हो जाता है।

मूल भाव:

यह दोहा दर्शाता है कि माँ अम्बे की भक्ति केवल बाहरी संकटों (पीर) को ही दूर नहीं करती, बल्कि वह मनुष्य के आंतरिक संसार का भी कल्याण करती हैं—मन के भ्रम और अज्ञान को मिटाकर उसमें ज्ञान, शांति और संतोष का एक नया सवेरा लेकर आती हैं।

14/06/2026

तम को हरते पलक में, दिव्य अलौकिक रूप:
भगवान सूर्य का रूप अत्यंत दिव्य, भव्य और इस लोक से परे (अलौकिक) है। वे जैसे ही उदित होते हैं, पलक झपकते ही संसार का सारा अंधकार (तम) नष्ट हो जाता है। यह अंधकार केवल बाहरी दुनिया का ही नहीं, बल्कि मन के भीतर के अज्ञान और निराशा का भी है, जिसे सूर्यदेव अपनी चमक से एक क्षण में दूर कर देते हैं।

सृष्टि पूरी जी उठे, पाकर पावन धूप:
जब सूर्यदेव की पवित्र और कल्याणकारी किरणें (पावन धूप) धरती पर पड़ती हैं, तो पूरी प्रकृति में एक नए जीवन का संचार हो जाता है। रात की निष्क्रियता के बाद पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य—यानी पूरी जीवसृष्टि—चेतना और नई ऊर्जा से भर उठती है। ऐसा लगता है मानो पूरी सृष्टि दोबारा जीवित हो गई हो।

निष्कर्ष:
यह दोहा सूर्य नारायण की उस असीम शक्ति और कृपा को दर्शाता है, जिससे वे संसार को ऊर्जा, प्रकाश और जीवन प्रदान करते हैं।

#सूर्य

13/06/2026

भारतीय संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के जिस रचना ने सर्वाधिक असर छोड़ा है वो गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस है। हालाँकि तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ मानस में कुछ ऐसी घटनाओं को भी जोड़ा है जो मूल वाल्मीकि रामायण में नहीं है। साथ ही कई अन्य घटनाओं को मानस में स्थान नहीं दिया गया है। ऐसी ही एक जानकारी महाराज दशरथ की पत्नियों के विषय में है।

रामचरितमानस में ये बताया गया है कि महाराज दशरथ की केवल तीन पत्नियाँ थी - कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी। हालाँकि यदि आप मूल वाल्मीकि रामायण को पढ़ेंगे तो हमें ये पता चलता है कि महाराज दशरथ की मुख्य एवं गौण मिलाकर कुल रानियों की संख्या ३५० से अधिक थी। उन रानियों के विषय में बहुत ही कम वर्णित है किन्तु फिर भी, विशेष रूप से अयोध्या कांड में उनका वर्णन किया गया है।

महाराज दशरथ की तीन से अधिक रानियां होने का पहला प्रमाण हमें अयोध्या कांड में मिलता है। हालाँकि इस श्लोक में महाराज दशरथ ने स्पष्ट रूप से इन्हे पत्नी नहीं कहा है पर ये तय है कि उनके अंतःपुर में सहस्त्रों स्त्रियां थी। ये बात महाराज दशरथ कैकेयी से तब कहते हैं जब वे श्रीराम के वनवास की बात करती है।

अयोध्या कांड के सर्ग १२ के श्लोक २७ में लिखा है:

बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्।
परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते।।

अर्थात: मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत-से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसी के मुँह से श्रीराम के सम्बन्ध में सच्ची या झूठी किसी प्रकार की शिकायत नहीं सुनी जाती।

इसके बाद महाराज दशरथ की कई पत्नियों के होने का वर्णन तब तब आता है जब कैकेयी दशरथ से श्रीराम का वनवास मांगती है और दशरथ इस धर्म संकट में हैं कि श्रीराम को इसकी सूचना कैसे दें।

अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १० में लिखा है:

सुमन्त्रानय मे दारान्ये केचिदिह मामकाः।
दारैः परिवृतः सर्वैदृष्टुमिच्छामि राघवम।।

अर्थात: हे सुमंत! इस घर में मेरी जितनी स्त्रियाँ है, उन सभी को बुला लो। मैं उन सबके सहित श्रीरामचन्द्र को देखना चाहता हूँ।

अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक ११ में लिखा है:

सोSन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यंब्रवीत।
आर्या हयति वो राजाSगम्यतां तत्र मा चिरम।।

अर्थात: ये सुन सुमंत अंतःपुर गए और सभी रानियों से बोले कि, महाराज आपको बुलाते हैं - शीघ्र आइये।

अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १२ में लिखा है:

एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञा।
प्रचक्रमुस्तद्ववनं भर्तुराज्ञाय शासनं।।

अर्थात: जब सुमंत ने उन स्त्रियों को इस प्रकार महाराज की आज्ञा सुनाई, तब अपने पति की आज्ञा से वे महाराज के पास जाने को तैयार हुई।

अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १३ में इसे सबसे स्पष्ट रूप से लिखा गया है:

अर्द्धसप्तशतास्तास्तु प्रमदास्ताम्रलोचनाः।
कौशल्यां परिवार्यार्थ शनैर्जग्मुर्धतव्रताः।।

अर्थात: साढ़े तीन सौ स्त्रियाँ, जिनके नेत्र श्रीरामचन्द्र जी के वियोगजन्य दुःख के कारण रोते रोते लाल हो गए थे, कौशल्या को घेर कर धीरे-धीरे महाराज के पास गयीं।

अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १४ में लिखा है:

आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः।
उवाच राजां तुं सुतं सुमंत्रानय में सुतं।।

अर्थात: जब महाराज ने देखा कि, सब स्त्रियाँ आ गयी, तब उन्होंने सुमंत को आज्ञा दी कि हे सुमंत! मेरे पुत्र को ले आओ।

अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के श्लोक ३६ में लिखा है:

एता वदभिनितार्थमुक्तवासजननींवच:।
त्रय:शतशतर्धा हिददर्शावेक्ष्यमातर:।।

अर्थात: अपनी माता को सांत्वना देने के पश्चात राम ने एक पल सोच कर वहाँ खड़ी अपनी ३५० विमाताओं की ओर देखा।

अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के श्लोक ३७ में लिखा है - कौशल्या की ही भांति राम ने अपनी सभी विमाताओं से, जो दुख से विह्लल हो रही थी, करबद्ध हो कहा - "माता! यदि मुझसे अनजाने में कोई अपराध हो गया हो तो मुझे क्षमा करें।"

अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के अंतिम श्लोक ४१ में लिखा है:

मुरजपणवमेघघोषव दशरथवेश्म वभूव यत्पुरा।
विलपितपरिदेवनकुलं व्यसंगतं तद्युत्सुदुःखितं।।

अर्थात: हा! महाराज के जिस भवन में पहले मृदंग, ढोल के मेघ-गर्जनवत शब्द हुआ करते थे, वही भवन आज रानियों के करुणापूर्ण आर्तनाद एवं परिताप के अत्यंत दुःख से भर गया है।

तो वाल्मीकि रामायण के इन श्लोकों से पता चलता है कि महाराज दशरथ की कई (कम से कम ३५०) रानियाँ थी। इसके अतिरिक्त महर्षि वाल्मीकि ने ये लिखा है कि महाराज दशरथ अपनी तीनों प्रमुख पत्नियों (कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी) से एक सा प्रेम करते थे।

किन्तु जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की तो उन्होंने महाराज दशरथ की केवल इन्ही तीन रानियों का वर्णन किया है। साथ ही उन्होंने ये भी वर्णन किया है कि महाराज दशरथ अपनी तीनों रानियों में से कैकेयी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। हो सकता है कि चूँकि स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में महाराज दशरथ की अन्य रानियों का विस्तार पूर्वक वर्णन नहीं किया है इसी कारण तुलसीदास जी ने उन्हें रामचरितमानस में सम्मलित नहीं किया है।

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