Deepak Kumar Jha

Deepak Kumar Jha

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20/10/2025

आपको और आपके परिवार को प्रकाश का महापर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

यह दीपोत्सव आप सभी के जीवन को स्नेह, समृद्धि, सुख-शांति, सौहार्द एवं अपार खुशियों की रोशनी से आलोकित करे, माता लक्ष्मी की कृपा आप पर सदैव बरसती रहें ॥
💥🪔💥 शुभ दीपावली 💥🪔💥

09/07/2025

कबूतरों को दाना डालना क्यों अनुचित है ❓

आपका दाना डालना कबूतरों को भोजन हेतु आप पर पूर्णतः आश्रित करता है। वो अपने भोजन खोजने की प्राकृतिक क्षमता को खो देते हैं और अपने अस्तित्व के लिए लोगों पर निर्भर हो जाते हैं। यह खाद्य श्रृंखला की गतिशीलता को काफी हद तक बदलकर रख देता है। उदाहरण हेतु आप हैदराबाद को देखिये। शहर में कबूतरों की बढ़ती आबादी और उसके विकृत परिणामों को देखते हुए पक्षी विशेषज्ञ और पशु चिकित्सक ने पक्षियों के सार्वजनिक भोजन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। कबूतर अपनी प्राकृतिक क्षमता के ह्रास के कारण अपने अस्तित्व के लिए लोगों पर निर्भर हो जाते हैं और इसके प्रकृति में असंतुलन पैदा होता है। आमतौर पर इस वजह से चूहों की जनसंख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है क्योंकि चूहे भी अब कबूतरों के बचे हुए दाने पर आश्रित हो गए है।
अगर एक कबूतर को आप अच्छी तरह से दाना खिलाएं तो वह साल भर में करीब 12 किलो बीट कर देता है। कबूतरों की बीट जब सूख जाती है तो इससे कुछ परजीवी पैदा होते हैं जो हवा में जाकर इंफेक्शन फैलाते हैं। इतना ही नहीं इनके बीट में नाइट्रोजन और मीथेन की मात्रा अधिक होती है जिसके कारण स्टोनवर्क वाले ऐतिहासिक स्थलों को काफी नुकसान भी पहुंचता है।
लंदन का ट्रेफल्गर स्क्वेयर कबूतरों को दाना डालने के मामले में काफी लोकप्रिय था। वहां लोग कबूतरों को खूब दाना डालते थे लेकिन कबूतरों की बीट ने वहां के स्टोनवर्क को काफी नुकसान पहुंचाया। ऐसे में 2001 में वहां कबूतरों को खिलाए जाने वाले दाने की बिक्री पर रोक लगा दी गई। इसी तरह 2008 में वेनिस में भी सेंट मार्क्स स्क्वेयर पर कबूतरों के लिए बेचे जाने वाले दाने पर रोक लगा दी गई थी।
कबूतरों को दाना डालना कबूतर और मनुष्य दोनों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है। वह अप्राकृतिक दर से प्रजनन करते हैं। कबूतर से हिस्टोप्लाज्मोसिस, क्रिप्टोकॉकोसिस और साइटाकोसिस जैसी मानव बीमारियां हो सकती हैं। इनके पंख नाना प्रकार के जीवाणुओं और विषाणुओं के वाहक होते है। ये श्वास संबंधी समस्याएं भी पैदा करते है।
जंगली कबूतरों के कारण हमारे देश के कई बड़े नगर त्रस्त हैं । ब्लू रॉक कबूतरों को पहले चट्टानों और चट्टानी क्षेत्रों के आसपास देखा जाता था। अब भोजन की निरंतर उपलब्धता के कारण कबूतरों ने पूरे वर्ष स्थायी रुप से कहीं भी घोंसला बनाना शुरू कर दिया है जबकि पहले वो घोंसलों का निर्माण शिकार का मौसम और प्रकृति में भोजन की उपलब्धता के अनुरूप करते थे। कबूतर बहुत ही उग्र स्वभाव के होते हैं, इनके परभक्षी न होने की वजह से छोटे पक्षियों जैसे तोता, मैना, गौरैया की आबादी पर संकट मंडरा रहा है ।
हमारे धर्म और संस्कृति में पक्षियों और प्राणिमात्र से सद्भावना को उच्च स्थान दिया गया है। परंतु सबसे उच्चतम है प्रकृति का स्वरूप और उसकी नियति। हमारे पूर्वजों ने भी कबूतर को प्रकृति का अंग मानते हुए इन्हें प्राथमिकता दी लेकिन हमारी अज्ञानता, आकर्षण और मनोरंजन ने प्रकृति की संतुलन और सीख को भुला दिया है। हमें कबूतरों को संरक्षित करना चाहिए लेकिन प्रकृति और दूसरे पक्षी के मोल पर नहीं ।

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