BEAM Foundations

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BIHAR EMINENCE AND MAJESTY FOUNDATIONS (बिहार वैभव एवं विभूति)
This group is mainly created to introduce to the people of world about contribution of Bihar and Biharis and to bring less known important people and places of Bihar on world map..

07/03/2026
01/03/2026

Happy Holi

21/02/2026

मुजफ्फरपुर में जन्मे कनीष्क नारायण ने यूनाइटेड किंगडम की राजनीति में महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। 18 वर्ष की उम्र में लेबर पार्टी से जुड़ने वाले कनीष्क ने राजनीति में सक्रिय होने से पहले ब्रिटिश सिविल सर्विस जॉइन की और कैबिनेट ऑफिस में एडवाइजर के तौर पर कार्य किया। पर्यावरण, खाद्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया।
4 जुलाई 2024 को वे वेल्स लेबर पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सांसद चुने गए। उनकी पहचान वेल्स से चुने जाने वाले पहले भारतीय मूल के सांसदों में होती है। सितंबर 2025 में उन्हें ब्रिटेन सरकार में एआई और ऑनलाइन सुरक्षा मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने एआई पॉलिसी, ऑनलाइन सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, बौद्धिक संपदा और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाई।
हाल ही में दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में भाग लेने के बाद वे 23 साल बाद बिहार पहुंचे। उन्होंने कहा कि लंबे अंतराल के बाद राज्य में आकर उन्होंने काफी बदलाव और तरक्की देखी है। मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध लीची और आम का स्वाद उन्हें आज भी याद है। अपने दौरे के दौरान उन्होंने स्थानीय एसकेजे लॉ कॉलेज में छात्र-छात्राओं से संवाद किया।
नवंबर 1989 में मुजफ्फरपुर में जन्मे कनीष्क नारायण की प्रारंभिक शिक्षा शहर के प्रभात तारा स्कूल से हुई। उनका पैतृक गांव वैशाली जिले के गोरौल में है। उनके दादा कृष्ण कुमार मुजफ्फरपुर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अध्यक्ष रहे थे। बाद में परिवार दिल्ली चला गया और लगभग 12 वर्ष की उम्र में वे अपने माता-पिता के साथ इंग्लैंड जाकर वेल्स में बस गए।
ब्रिटेन में उन्होंने कार्डिफ के स्कूलों में पढ़ाई की और छात्रवृत्ति के आधार पर ईटन कॉलेज में दाखिला पाया। आगे चलकर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र में स्नातक किया। इसके बाद अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट (एमबीए) की पढ़ाई की।
दिल्ली एआई समिट में इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे कनीष्क को बिहार की धरती अपनी जन्मभूमि मुजफ्फरपुर खींच लाई। 23 साल बाद बिहार पहुंचे कनीष्क ने प्रदेश की बदली तस्वीर पर प्रसन्नता जताई। पटना में जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने मिथिला परंपरा के तहत उनका स्वागत किया।

04/01/2026

बिहार की बेटियों की बोली लगायी जा रही है और बिहार के लोग शीतनिद्रा में पड़े हुए हैं? शर्म नहीं आती? क्या बिहार की बेटियाँ बिकाऊ हैं? क्या उनकी क़ीमत 20-25 हज़ार है?😕

उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने समस्त बिहार सहित पूरे देश की महिलाओं का घोर अपमान किया है..

एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अविवाहित लोगों के बारे में बहुत ही शर्मनाक टिप्पणी करते हुए कहा..

" बिहार में 20-25 हजार में लड़कियां मिलती हैं.."

30/06/2025

बिहार के मुजफ्फरपुर मुजफ्फरपुर के आदर्श मथ्य विद्यालय की प्रिंसिपल रेखा चौधरी का 21 साल बाद ट्रांसफर हुआ. बच्चों और टीचरों ने विदाई समारोह का आयोजन किया. उनकी विदाई देख आप भी भावुक हो जाएंगे.

24/06/2025

उत्तर बिहार के तीन रचनाकारों को इस वर्ष साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए चुना गया है। खास बात यह है कि इनमें दो प्रतिभाशाली महिलाएं मधुबनी ज़िले से हैं, जिन्होंने अपनी मातृभाषा मैथिली में रचनात्मक योगदान दिया है।
दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. धीरज कुमार पांडेय को उनकी संस्कृत पुस्तक 'पारिभाषिकशब्द स्वारस्यम्' (वेदांत परिभाषा संदर्भ) के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार मिलेगा। यह पुस्तक संस्कृत आलोचनात्मक गद्य में एक अहम योगदान मानी जा रही है।

मधुबनी ज़िले की मुन्नी कामत, जो फुलपरास के सुरियाही गाँव से हैं, को उनकी मैथिली बाल कथा संग्रह 'चुक्का' के लिए साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। मुन्नी कामत ने बाल मनोविज्ञान और लोक संवेदनाओं को बहुत सरलता से अपनी कहानियों में पिरोया है।

वहीं नेहा झा मणि, जिनका जन्म मंगरौनी, मधुबनी में 28 जून 1991 को हुआ, को उनकी मैथिली कविता संग्रह 'बनारस आ हम' के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2025 के लिए चुना गया है। उनकी कविताओं में बनारस की संस्कृति, स्मृति और संवेदनाएं जीवंत हो उठती हैं।

ये तीनों रचनाकार न सिर्फ़ भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अग्रणी हैं, बल्कि युवाओं के लिए भी प्रेरणा हैं — कि अगर समर्पण और संवेदना हो, तो गाँव-क़स्बों से भी साहित्य का सूरज उग सकता है।

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