Samayantar
20/12/2025
पंकज बिष्ट ने समयांतर पत्रिका की शुरुआत स्वेच्छा से रिटायरमेंट लेने के बाद की. उस समय वह 52 वर्ष के थे और केंद्र सरकार के प्रकाशन विभाग में नौकरी कर रहे थे. रिटायरमेंट तक उनके दो उपन्यास, ‘लेकिन दरवाज़ा’ और ‘उस चिड़िया का नाम’, सहित कई कहानियां भी प्रकाशित हो चुकी थीं. वह पहले से जानते थे कि उन्हें एक ऐसी हिंदी पत्रिका निकालनी है जो समाज और राजनीति पर बात करे. इससे पहले वह 1970 और 1977 में भी ऐसा करने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन ख़ास सफलता नहीं मिली. हालांकि, उनकी इच्छा लगभग आधे लिखे उपन्यास को पहले पूरा कर लेने की थी. उन्होंने क़रीब 200 पन्ने लिख लिए थे, लेकिन एक दिन कंप्यूटर फ़ाइल करप्ट हो गई. वह बताते हैं कि 'एडिट करते-करते कुछ ग़लत हो गया. सोचा बाद में ठीक कर लूंगा.' फिर उन्होंने ध्यान वापस एक पत्रिका पर लगाया, जो आगे चलकर समयांतर बनी. उनका कहना था कि यह वह दौर था जब माहौल में ‘घुटन’ बढ़ रही थी. अख़बार कई बातें लिखने से हिचकिचाने लगे थे. लिखने और बोलने की आज़ादी कम हो रही थी.
ऐसे घुटन भरे माहौल में बिष्ट ने खुल कर सांस लेने का विकल्प चुना. उन्होंने बताया, 'मैं ऐसी पत्रिका निकालना चाहता था जिसमें मैं खुल कर, बिना डरे, वही कह सकूं जो कहना चाहता हूं.'
पढ़ें समयान्तर पत्रिका पर विष्णु शर्मा का पूरा लेख, लिंक कमेन्ट बॉक्स में.
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