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03/02/2018
अगर कोई पुरुष किसी महिला से शादी का वादा कर के शारीरिक संबंध बनता है और बाद मे शादी से इनकार कर देता है तो वो महिला बलात्कार का केस दर्ज करा सकती है ?
अगर कोई महिला किसी पुरुष से शादी का वादा कर के शारीरिक संबंध बनाती है और बाद मे शादी से इनकार कर देती है तो वो पुरुष कुछ न करे।
28/01/2018
पद्मावती के जौहर की आंच महसूस नहीं होती
पुराने वक्त से ही फिल्म के नायक/खलनायक को दमदार दिखाने के लिए एक 'कॉन्ट्रास्ट' पैदा किया जाता है। नायक अच्छे गुणों वाला और खलनायक बुरा। यदि किसी सुंदर कन्या का दिल जीतना है और सामने दो प्रतियोगी हैं तो निर्देशक दोनों के चरित्र में भारी बदलाव करेगा। चरित्र वर्णन( कैरेक्टराइजेशन) में इस बात का ध्यान रखेगा कि 'खलनायक' कहीं से भी 'नायक' से अधिक शक्तिशाली न दिखाई दे।
मामला बराबरी का हो सकता है लेकिन ऊपर-नीचे नहीं हो सकता। ताज़ा फिल्म 'पद्मावत' में निर्देशक संजय लीला भंसाली ने फिल्म के चरित्र संयोजन(कैरेक्टराइजेशन) में एक 'काइयाँपन' दिखाया है, जिसके कारण फिल्म के समग्र प्रभाव पर 'खिलजी प्रभाव' स्पष्ट दिखाई देता है।
संजय लीला भंसाली ने बहुत शातिरपन के साथ अपने चरित्र बुने हैं। ऐसी विक्षिप्तता के साथ कि पद्मावती और राजा रतन सिंह के किरदार खिलजी के किरदार के सामने बेचारे नज़र आते हैं। फिल्म में 'कैरेक्टर बिल्डिंग' बहुत अहम होती है। पद्मावत में सारा खेल इसी कैरेक्टर बिल्डिंग का है। उदाहरण के तौर पर दोनों की फिल्म में पहली एंट्री की बात कर ली जाए।
रतन सिंह परदे पर एक घायल व्यक्ति के रूप में आता है, जिसे गलती से पद्मावती ने तीर मार दिया है। उधर खिलजी एक पराक्रमी वीर के रूप में पेश किया जाता है। पहले सीन में ही मंगोल राजा का सिर उड़ा लाता है। इस सीन से खिलजी का किरदार रतन सिंह के किरदार पर भारी पड़ना शुरू हो जाता है। इसके बाद हर दृश्य में खिलजी की दरिंदगी और रतन सिंह का किरदार झुके कन्धों वाला, बोझिल किरदार। देखा आपने दमदार किरदार कैसे गढ़ दिया जाता है।
जिस भी दृश्य में खिलजी को दिखाया गया, उनमे विशेष श्रम किया गया है। लाइट्स के बेहतरीन प्रयोग रणवीर सिंह पर किये गए। सारे सशक्त दृश्य उसके ही खाते में गए। शाहिद कपूर के किरदार को संवारा नहीं गया, स्पष्ट दिखाई देता है जब वह राजपुताना शान के संवाद बेहद सपाट अंदाज में बोलते हैं। आखिरी की छोटी सी लड़ाई छोड़ दे तो एक राजपूत का शौर्य कहीं दिखाया नहीं गया या काइयेपन से छुपा लिया गया। शाहिद के किरदार को जानबूझकर कमज़ोर किया गया ताकि रणवीर सिंह के किरदार की क्रूरता अंडरलाइन हो। और ये तभी हो सकता था जब आप एक कद्दावर अभिनेता के सामने 'खरगोश' चुन लेते हैं।
जब पद्मावती का किरदार निभा रही दीपिका पादुकोण जंगल में हिरण का शिकार करते समय तीर को अनगढ़ अंदाज से थामती है तो समझ आ जाता है कि ये किरदार महज खानापूर्ति के लिए रखा गया था। उनके चेहरे पर सपाट भाव देखकर निराशा होती है। क्या उनके किरदार को भी जानबूझकर दबाया गया है। उनके चेहरे पर कहीं भी राजपूताना तेज़ और शौर्य के दर्शन नहीं होते हैं। इस फिल्म में केवल और केवल खिलजी व मलिक गफूर के किरदारों पर मेहनत की गई है। दीपिका जैसी अभिनेत्री का एक भी सशक्त दृश्य न होना मेरी बात की पुष्टि करता है।
इतिहास और रिसर्च का इस फिल्म से कोई लेनादेना नहीं है। यदि राजा रतन सिंह को खिलजी की पत्नी छुड़ा देती है तो साफ़ समझ आता है कि आप गोरा-बादल समेत राजपूताना शौर्य को अपमानित कर रहे हो। फिल्म के अंत में एक आत्मघाती लड़ाई में राजपूतों का मरण दिखाया गया है, एक बेवकूफाना लड़ाई। राजा रतन सिंह खालिस उर्दू के संवाद बोलता है, जलालुद्दीन खिलजी की सेवा में अरबी नृत्य होता है, राजकुमारी जंगल में गाउन पहनकर हिरण मारने जाती है। ये सड़ा हुआ शोध राम जाने किसने किया होगा।
फिल्म देखना एक कला है। कुछ साल पहले तक भारत में फिल्म देखने का एक पाठ्यक्रम होता था 'फिल्म आस्वाद पाठ्यक्रम'। अफ़सोस कि वह अब बंद हो चुका है। एक बात ईमानदारी से कहूं तो भारत में 'प्रशिक्षित दर्शकों' का अभाव है। भारतीय दर्शक चकाचौंध और धांसू संवादों में बह जाते हैं। 'जो रेत की नाव बनाकर समुन्दर से दांव लगाए, वो राजपूत' सुनकर तालियां बजा लेते हैं लेकिन ये नहीं देख पाते कि न आवाज में उतार-चढ़ाव था, न शौर्य की भावना।
फिल्म औसत से भी कम दर्जे की है, जिसमे खिलजी के पात्र को दिखाने के लिए कहानी का सहारा लिया गया है। विरोध न होता तो तीन दिन भी नहीं टिक पाती। निर्देशन के लिहाज से ये फिल्म उनकी वाहियात फिल्म 'गुज़ारिश' से भी निचले स्तर की है। इसका मतलब ये भी नहीं कि इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए था।
भंसाली ने चालाकी से विरोध को घूमर गीत तक सीमित रखकर अपना खेल खेल दिया। रतन सिंह और पद्मावती के किरदार को कमज़ोर कर खिलजीनामा पेश करने का षड्यंत्र सफल कर दिया। इसका एक ही प्रमाण है कि जब आप फिल्म देखकर बाहर निकलते हैं तो दिमाग में केवल 'खिलजी' का वहशीपन भरा होता है। आपको पद्मावती के जौहर की आंच महसूस नहीं होती लेकिन खिलजी की क्रूरता महसूस होती है। यहीं तो गेम था भंसाली का, जिसमे वह पूर्णतया सफल रहा है।
साभार- - -
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