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क्या आप जानते हैं कि जब तो अर्जुन को न मार डाले तब तक के लिए कर्ण ने अपने पैर न धोने की कसम खाई थी ??
28/08/2019
अहंता ममतानाशे सर्वथा निरहंकृतो।स्वरुपस्थो यदा जीव: कृतार्थ: स निगद्यते।। अर्थात जो व्यक्ति अहंकार यानि मैं.. और ममता यानि ये मेरा है.. से मुक्त हो जाता है उस अवस्था को ही कृतार्थ कहा जाता है।
महाप्रभु वल्लभाचार्य।
24/08/2019
श्रीकृष्ण क्यों हैं परम पुरुष?
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भगवान श्री कृष्ण को आम तौर पर भगवान श्री विष्णु का पूर्णावतार माना जाता रहा है। वैष्णव मत और श्री मद्भभागवतम के मुताबिक श्री कृष्ण साक्षात विष्णु हैं। अन्य अवतारो के विपरीत जहां भगवान विष्णु ने अपने अंशों को पृथ्वी पर भेजा था वहीं कृष्ण के रुप में वो साक्षात स्वयं धरती पर आए। वाल्मिकि रामायण के ठीक से अध्ययन से यही पता चलता है कि जब राम पृथ्वी पर थे तब भी विष्णु वैकुंठ में वास कर रहे थे। जब हनुमान जी लंका भी जाते हैं और रावण उनसे परिचय पूछता है तो वो कहते हैं कि मैं उन राम का सेवक हूं जिनके आदेश से विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं- 'जाके बल बिरंची हरि ईसा..पालत सृजत हरत दससीसा' इसके अलावा भी जब भगवान श्री राम सीता जी को अग्निपरीक्षा के लिए कहते हैं तो ब्रम्हा के साथ विष्णु भी आते हैं और राम को उनके स्वरुप के बारे में बताते हैं। लेकिन भगवान विष्णु कभी भी भगवान श्री कृष्ण के जीवन में कहीं भी नजर नहीं आते हैं। भगवान जब गीता भी कहते हैं तो भी वो विष्णु से पृथक कह कर खुद को संबोधित नहीं करते । भागवतम में भी कृष्ण को सर्वोपरि माना गया है। ब्रम्हवैवर्त पुराण के मुताबिक कृष्ण वैकुंठ से भी कई योजन उपर गोलोक में निवास करते हैं। और उनके ही द्वारा ब्रम्हा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति होती है। खुद विष्णु श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए देखे जा सकते हैं। ये श्लोक कुछ इस प्रकार है- वरं वरेण्यम वरदं वराहम....। श्री कृष्ण से संबंधित एक मुहर भी हड़प्पा सभ्यता के सिंध के लरकाना जिले में मिली है जिसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है। यानि भगवान श्री कृष्ण जिन्हें हम मथुराधीश या द्वारिकाधीश के रुप में द्वापर में देखते हैं उनसे पहले भी कृष्ण का कोई स्वरुप था। ऋग्वेद में भी कृष्ण का सांकेतिक जिक्र एक गड़ेरिये के रुप में दिखाई देता है जो हर युग में धरती पर आकर धर्म की स्थापना करता है। ब्रम्हवैवर्त पुराण , श्रीमद् भागवतम, हरिवंश पुराण भगवान श्री कृष्ण से ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं और उन्हें ही परम पुरुष के रुप में देखते हैंं।
03/10/2018
सुंदरकांड- स्त्रियों के संघर्ष की दास्तान
सुंदरकांड रामचरितमानस और रामायण का एक ऐसा अध्याय है जिससे होकर राम कथा के सारे पात्रों की जिंदगी के समाधान का राह खुलता है। हनुमान जी को इसी कांड में अपने देवत्व और शक्ति का अहसास होता है । राम और रावण के बीच फंसे विभिषण को राम के शरण में जाने का मार्ग मिलता है। माता जानकी को फिर से राम के पास वापस लौटने की उम्मीद मिलती है। भगवान श्री राम को माता जानकी का पता मिलता है । लेकिन इस कांड में एक बड़ा रहस्य यह भी छिपा है कि इसमें स्त्रियों के संघर्ष और लंका में उनकी दयनीय स्थिति का पता भी चलता है । जैसे ही हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं वहां सालों से राम के आने की उम्मीद पाली हुई लंकिनी से उनका साक्षात्कार होता है। लंकिनि उन्हें देखते ही कहती है कि ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा था कि विकल होसी जब कपि ते मारे तब जानेहु निसिचर संहारे... तात मोर अति पुन्य बहुता देखेउं नयन राम कर दूता... इसके आगे भी लंकिनि यही कहती हैं कि तात स्वर्ग अपवर्ग सुख ...धरिये तुला एक अंग..तूल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सतसंग... इसका अर्थ यही है कि लंकिनी भी वहां रावण के राज की मारी हुई एक ऐसी नारी थी जो लंका के द्वार पर सालों से इंतजार कर रही थी कि कोई मुक्तिदाता आयेगा और उन्हें रावण के राज़ से मुक्ति दिलाएगा। इसी प्रकार जब हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं और अशोक वाटिका के एक वृक्ष पर जाकर बैठते हैं। तब जब रावण माता सीता को प्रताड़ना देने के लिए त्रिजटा को आदेश देकर जाता है । तब शायद लंकिनी के द्वारा त्रिजटा तक यह संदेश पहुंच जाता है कि राम के दूत हनुमान लंका में प्रवेश कर चुके हैं। तभी त्रिजटा को भी यही उम्मीद बंधती है कि रावण के राज़ से मुक्ति अब संभव है और माता जानकी के साथ तब तक अच्छा व्यवहार होना चाहिए । त्रिजटा कहती है कि सबन्हौ बोली सुनाएसी सपना .. सीतहि सेई करहुं हित अपना । यहां तक कि त्रिजटा एक स्वप्न की कहानी गढ़ कर हनुमान जी को भी परोक्ष रुप से यही संदेश भेजती है कि वो लंका को जला डालें । त्रिजटा कहती है कि सपने बानर लंका जारे .. जातुधान सेना सब मारे। यहां तक कि कुबेर की पूर्व पत्नी मंदोदरी भी परोक्ष रुप से माता जानकी के पक्ष में ही खड़ी रहती हैं। जब रावण माता जानकी को मारने का प्रयास करता है तो उसे युक्ति पूर्वक दूर ले जाती हैं और कहती है .. सुनत बचन पुनि मारन धावा .. मयतनया कही नीति बुझावा.. कहेसी सकल निसचरन्हि बोलाई.. बहु बिधि सितहिं त्रासहु जाहि...। यहां तक कि जब हनुमान जी लंका जला कर वापस लौट जाते हैं तो इस अवसर पर जनता में फैले डर का भी इस्तेमाल मंदोदरी रावण के सामने करती है ताकि रावण डर कर माता जानकी को लौटा दे। मंदोदरी कहती है .. दूतिन्ह सन पुरजन बानी ..मंदोदरी अधिक अकुलानी...रहसि जोरी कर पति पग लागी ..बोली बचन नीति रस पागी..कंत करष हरि सन परिहू.. मोर कहा अति हित हिय धरहु.. समुझत जासु दूत कई करनी ..स्रवही गर्भ रजनीचर धरनी..तासु नारि निज सचिव बोलाई....पठहउं कंत जो चहहु भलाई...सुनहू नाथ सीता बिनु दिन्हे.. हित न तुम्हार संभु अज किन्हें.... इन सारी नारियों के कथनों से यह तो जरुर स्पष्ट होता है कि जिस रावण के राज के बारे में आज कल बुद्धिजीवी यह कहते पाए जाते हैं कि उसके राज़ में स्त्रियों की स्थिति बराबरी की थी। वहां स्त्रियां अपने पसंद का वर चुन सकती थी जैसे शूर्पनखा। वहां स्त्रियों का काम करने की आजादी थी जैसे लंकिनी । लेकिन रावण का राज उन औरतों के लिए दुखभरा था जिन्हें रावण ने बलपूर्वक अपहरण कर लंका में लाकर कैद करके रखा था। रावण ने वेदवती से लेकर हजारों स्त्रियों का शीलभंग किया था। लेकिन माता जानकी का चरित्र ऐसा था जिसने उन सभी दबी कुचली स्त्रियों के भीतर वो उम्मीद जगा दी कि रावण का प्रतिकार भी संभव है । माता जानकी ने हमेशा रावण को उसकी सीमाएं दिखाईं और ढृढता से उसके सम्मुख प्रतिकार की आवाज़ बन कर उभरीं । माता जानकी ने रावण को हमेशा यही दिखाया कि उसका चरित्र राम के उद्दात चरित्र के सामने बौना है । भले ही रावण प्रकांड पंडित था लेकिन श्री राम के रुपी सूर्य के सामने उसकी स्थिति एक जूगनू से ज्यादा नहीं थी.. सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।। जय श्री राम
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