Manish Kumar Gupta

Manish Kumar Gupta

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11/12/2025

रूपये की बीस साल की यात्रा और पुराना आर्थिक ढांचा

भारत की मुद्रा की कहानी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस परिवर्तन की कहानी है जिसमें एक देश धीरे धीरे आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर आत्मविश्वास और रणनीति पर खड़ी एक उभरती शक्ति बनता है।

स्थिरता की सतह और अंदर छिपी कमजोरियाँ
मनमोहन सिंह के कार्यकाल को लोग स्थिरता का दौर कहते हैं, लेकिन यह स्थिरता ऊपर से दिखने वाली थी। रुपये को मजबूती देने की क्षमता सीमित थी क्योंकि भारत उस समय आयात प्रधान मॉडल पर चल रहा था। पेट्रोल, मशीनें, रसायन, धातु और तकनीक जैसे हर महत्वपूर्ण तत्व विदेशी बाज़ार पर निर्भर थे। वैश्विक वित्तीय संकट, यूरोप के कर्ज संकट और तेल की कीमतों में उथल पुथल ने भारत को लगातार दबाव में रखा। ऐसे माहौल में रुपये को स्थिर रखना ही उस दौर की उपलब्धि थी। मजबूती नाम की कोई संभावना नहीं थी। यही वजह है कि रुपया 45 से 60 के बीच पहुंच गया और यह उस समय परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम था।

दुनिया बदलती है और भारत अपना रास्ता बदलता है

कहानी असल में तब बदलती है जब भारत अपना आर्थिक रुख बदलना शुरू करता है। रूस अमेरिका तनाव, चीन की आक्रामकता, कोविड के बाद की अव्यवस्था और अमेरिका की ब्याज दरों की उछाल ने लगभग हर देश की मुद्रा को प्रभावित किया। जापान से लेकर यूरोप तक सभी मुद्राएं कमजोर हुईं। रुपया भी दबाव झेल रहा था, लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। भारत अब सिर्फ उतार चढ़ाव झेलने वाला देश नहीं रहा, बल्कि अपने आर्थिक ढांचे को नया रूप देने वाला देश बन चुका था।

एक समय भारत उन अर्थव्यवस्थाओं में था जिन्हें Fragile Five कहा जाता था, लेकिन आज भारत उस सूची से बहुत दूर निकल चुका है। रुपये में उतार चढ़ाव जरूर है, मगर अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत खड़ी है। इसी दौर में भारत ने डॉलर पर निर्भरता को चुनौती देना शुरू किया। रूस के साथ रुपये रूबल व्यवस्था, यूएई के साथ ऊर्जा व्यापार में रुपये दिरहम, बांग्लादेश के साथ रुपये टका भुगतान और ब्रिक्स देशों में स्थानीय मुद्रा की पहल यह बताती है कि भारत वैश्विक मुद्रा राजनीति का सक्रिय खिलाड़ी बन रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार भी अब विविध हो रहा है। लंबे समय तक भंडार डॉलर पर केंद्रित रहा, लेकिन आज यह समझ बढ़ी है कि एक ही टोकरी पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसलिए दिरहम, युआन, यूरो, रियाल और रूबल जैसे विकल्प भंडार को ज्यादा स्थिर बनाते हैं, विचार वही है कि सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए।

नया आर्थिक मॉडल, डिजिटल भविष्य और रुपया

सबसे बड़ा बदलाव भारत के आर्थिक मॉडल में आया है। मनमोहन काल में आयात केंद्र में था। मजबूत रुपया आयात को सस्ता बनाता था और निर्यात पीछे छूट जाता था। मोदी सरकार के दौर में यह ढांचा उलट गया। अब लक्ष्य निर्यात, उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में भारत की पकड़ को बढ़ाना है। ऐसे मॉडल में थोड़ा कमजोर रुपया नुकसान नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में लाभ बन जाता है। सेवाओं का निर्यात, फार्मा, इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से वृद्धि इसी बदलाव का हिस्सा है।

डिजिटल रुपया भी भविष्य की मुद्रा व्यवस्था में बड़ा असर डाल सकता है। यह सीमा पार भुगतान को सरल बना सकता है और डॉलर आधारित अस्थिरता को कम कर सकता है। जब दुनिया डिजिटल भुगतान की दिशा में और आगे बढ़ेगी, भारत पहले से तैयार होगा।

अब सवाल आता है कि क्या मोदी सरकार रुपये को मजबूती से रोक सकती थी। तकनीकी रूप से हां, पर उसका परिणाम अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होता। विदेशी भंडार खर्च होता, निर्यात पर चोट पड़ती और यह कृत्रिम मजबूती लंबी नहीं टिकती। सरकार ने दिखावे की बजाय दीर्घकालिक रास्ता चुना और यही वजह है कि रुपये के उतार चढ़ाव के बावजूद अर्थव्यवस्था ज्यादा स्थिर दिखती है।

अगर इस पूरे सफर को एक पंक्ति में समझना हो तो यह है कि मनमोहन सिंह के समय रुपया स्थिर था क्योंकि भारत निर्भर था, और मोदी सरकार के समय रुपया कमजोर दिखता है क्योंकि भारत बदल रहा है। परिवर्तन का यही सार है कि पुरानी कमजोरियों को छोड़ कर नई ताकतों की ओर बढ़ना। रुपया भले आंकड़ों में गिरा दिखता हो, भारत आज पहले से कहीं अधिक ऊंचा और आत्मनिर्भर खड़ा है।

मनीष कुमार गुप्ता
चार्टर्ड अकाउंटेंट
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