Aas Rasheed

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07/11/2025

वार्ड नंबर 213 शास्त्री पार्क
आज की वीडियो कुछ बड़ी है लेकिन काम चोर ने क्या हालात कर दिए है कॉलोनी के ये देखना जरूरी है
काम चोर वार्ड छोड़

10/04/2025

कहानी का नाम: खामोशियाँ बोल उठीं

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और सामाजिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखी गई है।)
लेखक: आस मोहम्मद कुरैशी
मोबाइल: 9899385644

भाग 1: "सांवली सी सवेरा"

नेहा शर्मा…
14 साल की, 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक सीधी-सादी लड़की। साँवली रंगत, बड़ी-बड़ी आँखें और चेहरे पर हमेशा हल्की सी मुस्कान।

वो एक मध्यमवर्गीय सनातनी परिवार में पली-बढ़ी। माँ सविता देवी, जिनके लिए बेटी उनका गहना थी… और पिताजी मनोहर लाल शर्मा – सरकारी नौकरी में, जो ज़्यादातर अपने ऑफिस के काम में ही व्यस्त रहते। बड़ा भाई विवेक, जो कॉलेज के नाम पर घर पर ही ज़्यादातर समय बिताता था, मोबाइल में खोया हुआ, माँ की आँखों का तारा।

नेहा को बस एक ही चीज़ सुकून देती थी — स्कूल।
और स्कूल से लौटकर आशु वर्मा से थोड़ी देर की बातचीत, जो उसके घर के पास रहता था। आशु दो साल बड़ा था, लेकिन दोनों की दोस्ती बचपन से थी। जब नेहा छोटी थी, आशु ही उसे साइकल चलाना सिखाया करता था।

उस दिन सुबह की हल्की धूप नेहा की खिड़की पर आकर रुक गई थी। माँ ने पुकारा,
"नेहा, उठ जा बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या?"
नेहा ने आँखे खोलीं तो देखा कि उसका भाई विवेक सामने बैठा उसे देख रहा है।

"तू इतनी देर तक सोती क्यों है रे?" विवेक ने कहा, और फिर मुस्कराते हुए उसके माथे पर हल्का सा हाथ रख दिया।

नेहा को कुछ अजीब सा महसूस हुआ। वो बचपन से अपने भैया के बेहद करीब रही थी, लेकिन अब कुछ महीनों से उसे उसके व्यवहार में एक अजीब बदलाव महसूस हो रहा था। उसकी निगाहें, उसकी बातें — सबकुछ थोड़ा बोझिल लगता।

माँ ने आवाज़ लगाई, और नेहा झट से उठ गई।

शाम को...
नेहा जब स्कूल से लौटी तो आशु उसके गेट के बाहर खड़ा था।
"अरे तू आ गई? चल छत पे चलते हैं कुछ बात करनी है," आशु ने कहा।

नेहा ने सिर हिलाया, पर मन में कुछ और ही चल रहा था।

छत पर पहुँचते ही आशु बोला,
"नेहा, तुझसे कुछ बात करनी थी… आज सुबह मैंने तेरे भैया को तेरे कमरे में देखा। कुछ ठीक नहीं लगा मुझे।"

नेहा की आँखों में डर तैरने लगा…

"क्या… देखा?" – उसकी आवाज़ काँप रही थी।

आशु ने उसकी ओर देखा, और बोला,
"जो देखा, वो बता नहीं सकता… लेकिन तुझे सावधान रहना होगा। और कोई भी बात अगर अजीब लगे… तो मुझसे कहना, मैं तेरे साथ हूँ।"

नेहा का गला सूख गया। अब उसे यकीन होने लगा था कि उसका डर बेवजह नहीं था।

कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर थी… जहाँ मासूमियत और खामोशी के बीच कुछ अनकहा पनपने लगा था।

(जारी है… अगला भाग जल्द)

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