Radha Rani

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18/02/2026

एक बार नारद जी ने हनुमान जी से पूछा - "आप इतने शक्तिशाली कैसे हैं?"
नारद जी जो तीनों लोकों में घूमते रहते थे, एक दिन हनुमान जी के पास आए। उन्होंने पूछा, "हनुमान जी, आपने समुद्र लांघा, पर्वत उठाया, लंका जलाई। यह सब शक्ति कहां से आती है?"
हनुमान जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "नारद जी, यह सब केवल राम-नाम की शक्ति है। मैं तो कुछ नहीं हूं।"
नारद जी को विश्वास नहीं हुआ। तब हनुमान जी ने एक प्रयोग किया। उन्होंने समुद्र में कुछ पत्थर फेंके, वे डूब गए। फिर उन्होंने कुछ पत्थरों पर "राम" लिखा और फेंका - वे तैरने लगे!
नारद जी ने कहा, "लेकिन आप तो बिना लिखे ही समुद्र पार कर गए थे!"
हनुमान जी ने कहा, "क्योंकि राम-नाम मेरे हृदय में था, मेरी सांसों में था। हर पल मैं उनका नाम लेता हूं। यही मेरी असली ताकत है।"
सीख: भगवान का नाम सबसे बड़ी शक्ति है। जब हमारे मन में राम-नाम बसा हो, तो असंभव काम भी संभव हो जाते हैं।
राम नाम जपना, पराया माल अपना! 🙏🔔

18/02/2026

क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी और भरत जी का भी एक बार युद्ध हुआ था?
जब श्री राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौट रहे थे, तो हनुमान जी आगे-आगे उड़कर भरत जी को खुशखबरी सुनाने गए। उन्होंने कहा, "भरत जी! प्रभु राम लौट रहे हैं, सीता माता के साथ!"
लेकिन भरत जी ने पूछा, "प्रमाण क्या है? मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम सच कह रहे हो?" हनुमान जी ने सीता माता की चूड़ामणि दिखाई।
भरत जी को एक चिंता सता रही थी। उन्हें डर था कि कहीं रावण कोई छल न कर दे। इसलिए उन्होंने एक अग्निबाण चला दिया, जो पुष्पक विमान की ओर जा रहा था।
हनुमान जी ने तुरंत अपना विशाल रूप धारण कर उस बाण को रोक लिया। भरत जी ने फिर बाण चलाया, हनुमान जी ने फिर रोका। यह सिलसिला चलता रहा।
अंत में श्री राम स्वयं आगे आए और दोनों को रोका। उन्होंने समझाया कि दोनों ही अपनी-अपनी भक्ति में सच्चे थे। भरत जी और हनुमान जी ने एक-दूसरे को गले लगाया।
सीख: सच्चे भक्त कभी अपने कर्तव्य से नहीं डिगते। हनुमान जी और भरत जी दोनों अपने-अपने तरीके से श्री राम की रक्षा कर रहे थे।
सच्ची भक्ति में कोई अहंकार नहीं होता! 🙏🏹

17/02/2026

जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका जा रहे थे, तो रास्ते में तीन बड़ी बाधाएं आईं!
पहली बाधा मैनाक पर्वत थी। समुद्र के बीच में अचानक एक सुनहरा पर्वत उभर आया। मैनाक ने कहा, "हनुमान जी, आप थक गए होंगे। मेरे ऊपर बैठकर आराम कर लीजिए।"
हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, "धन्यवाद, पर मैं प्रभु का काम कर रहा हूं। विश्राम बाद में करूंगा।" और वे आगे बढ़ गए।
फिर सुरसा नामक राक्षसी आई। उसने कहा, "मुझे वरदान है कि कोई भी मेरे मुंह में जाए बिना यहां से नहीं जा सकता।"
हनुमान जी चतुर थे। उन्होंने अपना रूप विशाल कर लिया। सुरसा ने भी मुंह बड़ा किया। फिर अचानक हनुमान जी सूक्ष्म रूप में हो गए, उसके मुंह में घुसकर बाहर आ गए और आगे बढ़ गए।
तीसरी बाधा सिंहिका नामक राक्षसी थी जो परछाई पकड़कर शिकार करती थी। हनुमान जी ने उसे मार गिराया और अंततः लंका पहुंच गए।
सीख: जब हम भगवान का काम करते हैं, तो रास्ते में बाधाएं आती हैं। लेकिन विनम्रता, बुद्धि और साहस से हर बाधा पार की जा सकती है।
संकट मोचन हनुमान की जय! 🙏🌊

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