Brahmans
Economic laws are universal, and humans respond to incentives and coercion more or less the same way everywhere and in every culture. But I do advocate here and believe that there is a need for a Brahman School of Economics for developing a holistic theory of economic development of Brahmans to achieve self-reliance. True happiness is possible, according to Sanatana Dharma, only if material progre
14/04/2026
आज विश्व के महानतम ज्योतिषाचार्य, खगोलविद और गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की जयंती है।
आज विज्ञान और गणित जिस ऊँचाई पर खड़े हैं, उसमें उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने मानवता को ज्ञान, तर्क और विज्ञान की दिशा दिखाई।
आचार्य आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना आर्यभटीय में बीजगणित, अंकगणित और त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किए।
उन्होंने पाई (π) का मान दशमलव के पाँच अंकों तक सटीक बताया और “साइन” (ज्या) की अवधारणा दी, जो आज भी गणित और विज्ञान की नींव है।
उन्होंने हजारों वर्ष पहले यह सिद्ध कर दिया था कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं है, बल्कि सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है।
आचार्य आर्यभट्ट ने वर्ष की अवधि का सटीक अनुमान (365.2951 दिन) भी बताया, जो उनकी अद्भुत वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
ऐसे महान विद्वानों की विरासत पर हमें गर्व होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि हम उनके ज्ञान, विज्ञान और सोच को आगे बढ़ाएं।
आचार्य आर्यभट्ट जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥
- (अत्रिसंहिता, श्लोकः १४०)
ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है।
उपनयन संस्कार हाे जाने पर 'द्विजश्रेष्ठ' कहलाता है।
विद्या प्राप्त कर लेने पर 'विप्र' कहलाता है।
इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।
( नोट: "जन्मने जायते शूद्र:" वाला श्लोक फ़र्ज़ी है)
जिस श्लोक को अपने फर्जी कहा क्या पुराण फर्जी हैं, कृप्या समाधान करे
We are Back, Now We shall be active.!
12/07/2024
अंग्रेज़ों की क़ैद में क्रांतिकारी रामलाल तिवारी, जिन्हें बाद में सूली पर लटका दिया गया, न जाने ऐसे वीर ब्राह्मण सपूत में हंसते हंसते सूली पर चढ़े है,
सैल्यूट
06/07/2024
Mukherjee
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी - जन्म जयंती 6 जुलाई 1901
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।
- 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने समाजसेवा करने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया।
-जिस समय मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था और साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी, तब डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा नहीं हो।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वह मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी।
-महात्मा गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से उनके मतभेद बराबर बने रहे इसलिए उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की गयी।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू-कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था।
-संसद में अपने भाषण में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
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