MESA Foundation
11/12/2023
हमारी झोपड़ी तक शिक्षा नहीं पहुंचती लेकिन
चुनाव के समय शराब जरूर पहुंच जाती है। तो आप खुद समझ लें हमारे बच्चों को बर्बाद कौन कर रहा है..?
12/12/2022
"एक चीज जो आपको बिल्कुल सही-सही पता होनी चाहिए वह है लाइब्रेरी का एड्रेस।"
–अल्बर्ट आइंसटाइन
Mission for Education & Social Awareness
30/11/2022
जब अंग्रेज सरकार जीवित भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव को न बाँट सकी और न ही उनके सम्बन्ध में भ्रम पैदा कर सकी तो आखिरी चाल चली गयी। 23 मार्च, 1931 को शाम सात बजे उन्हें फाँसी देकर उनकी लाशों के टुकड़े-टुकड़े किये गये । फिर फिरोज़पुर, सतलुज के किनारे उन्हें जलाने की कोशिश की गयी और अधजली हालत में सतलुज नदी में बहाया गया। यह सब बहुत जल्दबाजी में किया गया। टुकड़े करने और अधजली हालत का प्रमाण 24 मार्च, 1931 को शहीद भगतसिंह की बहिन बीबी अमरकौर व अन्य देशवासियों द्वारा खून सने पत्थर, रेत और तेजधार हथियार से कटी अधजली हड्डियाँ हैं,
जिन्हें आजकल खटकड़कलाँ गाँव में प्रदर्शित किया गया है। 23 मार्च की रात में ही अंग्रेज सरकार ने एक विज्ञापन लगाया था, जिसमें भगतसिंह का अन्तिम संस्कार सिख परम्परा से, राजगुरु का सनातनी परम्परा से और सुखदेव का आर्यसमाजी परम्परा से करने की बात कही गयी थी।
इसकी गवाही कसूर के ग्रन्थी व पण्डितों से दिलायी गयी थी। यह चाल अंग्रेजों ने भारत की साम्प्रदायिकता की कमज़ोरी से लाभ उठाने के लिए खेली।
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