Diwakar pathak
केंद्रीय नेतृत्व अक्सर ऐसे चेहरों को प्राथमिकता देता है जो उनके प्रति वफादार हों। एक "स्वच्छ और प्रभावशाली" मुख्यमंत्री की अपनी एक स्वतंत्र जन-आधार (Mass Base) होती है। जब किसी नेता की ताकत जनता से आती है न कि आलाकमान की मेहरबानी से, तो उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।
*उत्तराधिकार की चुनौती
यदि कोई मुख्यमंत्री बहुत अधिक लोकप्रिय और सफल हो जाता है, तो वह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय राजनीति में एक दावेदार के रूप में उभरने लगता है। केंद्रीय नेतृत्व को डर रहता है कि भविष्य में वह व्यक्ति प्रधानमंत्री पद या पार्टी के शीर्ष पद के लिए चुनौती पेश कर सकता है।
*रबर स्टैम्प' की प्राथमिकता
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अक्सर होती है कि केंद्र ऐसे व्यक्तियों को चुनना पसंद करता है जो दिल्ली के निर्देशों का पालन करें। एक प्रभावशाली और ईमानदार नेता अपनी नीतियों पर अडिग रह सकता है, जिससे कभी-कभी केंद्र और राज्य के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
जनता के हितों के लिए लड़ने वाला विजय की तरह दरकिनार कर दिए जाते हैं ।
आज के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए एक कड़वी सच्चाई सामने आती है…
वर्षों से हम देखते आ रहे हैं कि जो नेता जितना जोर-शोर से भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं, अक्सर वही सत्ता में आकर उसी भ्रष्टाचार का हिस्सा बन जाते हैं। जो परिवारवाद के विरोध की बात करते हैं, वे भी उससे खुद को अलग नहीं रख पाते। जो दल के भीतर लोकतंत्र की बात करते हैं, वही आगे चलकर पार्टी को अपने नियंत्रण में लेकर अलोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी कर देते हैं।
“सबका साथ, सबका विकास” का नारा देने वाले भी समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटने से नहीं चूकते। महंगाई कम करने और आमदनी बढ़ाने के वादे करने वाले ही ऐसी नीतियाँ बना देते हैं, जिनसे आम जनता की कमर टूटती जाती है।
सवाल यह है कि क्या सच बोलने वाले, सिद्धांतों पर टिके रहने वाले नेता अब हमारे बीच बचे हैं?
या फिर हमें ही जागरूक होकर सच और दिखावे में फर्क करना सीखना होगा।
#सोचिए #जागरूक_बनिए
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